विद्युत जीवन के सभी क्षेत्रों के लिए अनिवार्य आवश्यकता है और मूल मानवीय आवश्यकता के रूप में माना गया है। यह महत्वपूर्ण मूल संरचना है जिस पर देश का सामाजिक-आर्थिक विकास निर्भर करता है। प्रतिस्पर्धी दरों पर भरोसेमंद और गुणवत्ता विद्युत की उपलब्धता अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के विकास को बनाए रखने के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है अर्थात प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक। यह घरेलू बाजारों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने में सहायता करती है और इस प्रकार से लोगों का जीवन स्तर सुधारता है।
भारत के संविधान के अंतर्गत बिजली समवर्ती सूची का विषय है जिसकी सातवीं अनुसूची की सूची iii में प्रविष्टि संख्या 38 है। भारत विश्व का छठा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता है जो विश्व के कुल ऊर्जा खपत का 3.5 प्रतिशत उपभोग करता है। तापीय, जल बिजली और नाभिकीय ऊर्जा भारत में बिजली उत्पादन के मुख्य स्रोत हैं। कुल संस्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता 1,47,402.81 मेगावॉट (31 दिसम्बर, 2008 के अनुसार), रही है, जिसमें 93,392.64 मेगावॉट (थर्मल); 36,647.76 मेगावॉट (हाइड्रो); 4,120 मेगावॉट (न्यूक्लियर); और 13,242.41 मेगावॉट (अक्षय ऊर्जा स्रोत) शामिल हैं।
विनियामक ढांचा
भारत में, विद्युत मंत्रालय देश में वैद्युत ऊर्जा के समग्र विकास के लिए नोडल प्राधिकरण है। इसका कार्य संभावना योजना, नीति निर्माण, निवेश निर्णय के लिए परियोजनाओं का प्रक्रियान्वयन, विद्युत परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर नजर रखना, प्रशिक्षण और जनशक्ति विकास तथा विद्युत उत्पादन, पारेषण और वितरण के संबंध में कानून का प्रशासन और अधिनियमन करना है। यह विद्युत अधिनियम, 2003, उर्जा संरक्षण अधिनियम , 2001 और इन अधिनियों में ऐसे संशोधन करने के लिए जिम्मेदार है जैसाकि कि समय-समय पर आवश्यक हो जो सरकारी नीति के लक्ष्यों के अनुरूप होते हैं। मंत्रालय अनुसंधान, विकास और राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में पन बिजली और ताप विद्युत पारेषण और वितरण संबंधी तकनीकी सहायता प्रदान करता है तथा ऊर्जा संरक्षण से संबंधित सभी मामलों पर कार्य करता है।
मंत्रालय के पास इसके अधीन कार्यरत अनेकानेक उपक्रम/संगठन हैं। उनका निम्नानुसार वर्गीकरण किया जा सकता है:-
- सांविधिक निकाय, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:-
- केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) - यह मंत्रालय का संबद्ध कार्यालय है और सभी तकनीकी मामलों में इसकी सहायता करता है। सीईए संपूर्ण योजना बनाने और तकनीकी समन्वयन तथा देश के समस्त बिजली क्षेत्रक के मानक कार्यक्रमों के पर्यवेक्षण के लिए जिम्मेदार है। यह विद्युत मानकों और विद्युत लाइनों के निर्माण प्रचालन और रखरखाव के लिए तकनीकी और सुरक्षा संबंधी अपेक्षाएं विनिर्दिष्ट करता है। यह पांच वर्षों में एक बार राष्ट्रीय विद्युत नीति के अनुसार 'राष्ट्रीय विद्युत योजना', बनाने में भी शामिल होता है।
- केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (सीईआरसी) - इसका गठन:- (i) केंद्रीय सरकार द्वारा स्वामित्व या नियंत्रणाधीन उत्पादन कंपनियों के प्रशुल्क का विनियमन; (ii) केंद्र सरकार की स्वामित्व या नियंत्रणाधीन को छोड़कर उत्पादन कंपनियों के प्रशुल्क का विनियमन करना, यदि ऐसी कंपनी एक से अधिक राज्यों साथ करार करती हैं या उनकी विद्युत उत्पादन और बिक्री के लिए संयुक्त योजना है; (iii) पारेषण उपयोग के प्रशुल्क सहित ऊर्जा के अंतर राज्यीय पारेषण का विनियमन; (iv) अंतर राज्यीय पारेषण और व्यापार के लिए लाइसेंस देना; और (v) राष्ट्रीय विद्युत नीति और प्रशुल्क नीति तैयार करने के केंद्रीय सरकार को परामर्श देने के लिए किया गया है
- राज्य विद्युत विनियामक आयोग (एसईआरसी) - का गठन:- (i) बिजली उत्पादन आपूर्ति, पारेषण और संचालन, थोक बिक्री, खुदरा या फुटकर बिक्री राज्य के भीतर; (ii) अंतरराज्यीय पारेषण, संवितरण और व्यापार के लिए लाइसेंस जारी करना; और (iii) नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों आदि से विद्युत उत्पादन प्रोत्साहित करने के लिए किया गया है।
- विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण (एपीटीईएल) - का गठन विनियामक आयोग और अधिनिर्णयन अधिकारी के आदेशों के विरुद्ध मामलों की सुनवाई करने के प्रयोजन से किया गया है।
- दामोदर घाटी परियोजना (डीवीसी) -यह सरकार की पहली नदी घाटी परियोजना है जिसकी स्थापना पश्चिम बंगाल और झारखंड राज्यों में फैले दामोदर घाटी क्षेत्र का एकीकृत विकास करने के लिए गयी है। :इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं- (i) बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई; (ii)जलापूर्ति और जल मल निकासी; (iii)विद्युतीय ऊर्जा का उत्पादन, पारेषण और वितरण; (iv) वनरोपण और म़ृदा क्षय नियंत्रण; और (v) लोगों की औद्योगिक, आर्थिक सामान्य खुशहाली का संवर्धन करना।
- भाखड़ा व्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) -का गठन भाखड़ा नागल परियोजना के प्रशासन, रखरखाव और संचलान के लिए किया गया है। यह बीएसएल जल संवाहक प्रणाली के माध्यम से विचलित के अलावा भाखड़ा और पोंग में अवरोधित जल बढ़ाने के लिए स़ृजित सुविधाओं का प्रबंधन करता है। इसे राज्यों के देय/हक हिस्सों के अनुसार लाभानुभोगी राज्यों को जल और विद्युत परिदाय का कार्य भी सौंपा गया है।
- सरकारी क्षेत्र के उपक्रम, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:-
- पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि.. (पावर ग्रिड) - यह भारत का केंद्रीय पारेषण उपयोग है जिसके पास विश्व में सबसे बड़ा पारेषण नेटवर्क है। इसकी स्थापना सुदृढ़ वाणिज्यिक सिद्धांतों पर भरोसा, सुरक्षा और किफायत रूप से क्षेत्रों के भीतर और उनके बीच विद्युत अंतरण सुकर बनाने के लिए क्षेत्रीय और रार्ष्टीय पावर ग्रिडों की स्थापना और संचालन अनिवार्य रूप से करने के लिए की गई है। यह केंद्रीय क्षेत्रक में मौजूदा और भावी पारेषण परियोजनाओं के लिए जिम्मेदार है।
- नेशनल थर्मल पावर कॉर्पारेशन (एनटीपीसी) - भारत की सबसे बड़ी ताप विद्युत उत्पाद कंपनी है और इसकी पहचान एक नवरत्न के रूप में की गई है। इसकी स्थापना देश में ताप विद्युत का एकीकृत विकास की योजना बनाने, संवर्धित करने और आयोजित करने के उद्देश्यों के साथ की गई है।
- नेशनल हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (एनएचपीसी) - की स्थापना पनबिजली और ताप विद्युत संयंत्र संस्थापित करने द्वारा देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र की विशाल विद्युत क्षमता का विकास करने के उद्देश्य से की गई है ताकि शुरू की गई उत्पादन परियोनजाओं का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। इसका लक्ष्य पूर्वोत्तर क्षेत्र में विद्युत केंद्रों की योजना बनाना, डिजाइन करना, प्रचालन और रखरखाव करना है।
- नॉर्थ-इस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन (नीपको) - की स्थापना देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में हाइड्रो और तापीय बिजली संयंत्रों की संभाव्यता विकसित करने के उद्देश्य से की गई थी, ताकि कमीशन की गई उत्पादन परियोजनाओं का अनुकूलतम उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। यह पूर्वोत्तर क्षेत्र में बिलजी के स्टेशनों की डिज़ाइन, प्रचालन और रख रखाव पर लक्षित है।
- रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन (आरईसी) - इसकी स्थापना पूरे देश में ग्रामीण विद्युतीकरण परियोजनाओं का वित्त पोषण और संवर्धन करने के उद्देश्य से की गई है। परियोजनाओं में गांवों का विद्युतीकरण, जिसमें आदिवासी गांव और दलित बस्ती शामिल है, पम्प सेटों को सशक्त करना, लघु कृषि आधारित ग्रामीणी उद्योगों के लिए विद्युत की व्यवस्था करना ग्रामीण घरों में प्रकाश कीव्यवस्था और स्ट्रीट लाइन की व्यवस्था और स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था करना। आईसी राज्य विद्युत बौर्डों राज्य सरकार नके विभागें और ग्रामीण विद्युत सहकारिता/सेवाएं प्रदान करता है।
- पावर फाइनेंस कॉर्पारेशन (पीएफसी) - यह प्राथमिक विकास वित्त संस्था के रूप में कार्य करता है जो विद्युत क्षेत्रक की वृद्धि और समग्र विकास के लिए समर्पित है। यह परियोजना मियादी ऋण लीज फायनेंसिंग हुण्डियों का प्रत्यक्ष बट्टा अल्पावधिक ऋण, परामर्शदात्री सेवाआें आदि के रूप में विद्युत परियोजनाओं को वित्तीय सहायता/सेवाएं प्रदान करता है।
- स्वायत्तशासी निकाय, जिसमें निम्नलिखित शामिल हैं:-
- केंद्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान (सीपीआरआई) - यह इलेक्ट्रिक पावर इंजीनियरिंग में अनुप्रायोगिक अनुसंधान करने के लिए प्रयोगशाला का कार्य करता है, इसके अतिरिक्त विद्युतीय उपकरणों और संघटकों के लिए स्वतंत्र राष्ट्रीय परीक्षण और प्रमाणन प्राधिकरण के रूप में कार्य करता है ताकि भरोसा सुनिश्चित किया जा सके और नए उत्पाद का विकास किया जा सके।
- नेशनल पावर ट्रेनिंग इंस्टीटयूट (एनपीटीआई) - भारत में विद्युत क्षेत्रक कार्मिकों का मानव संसाधन विकास के लिए राष्ट्रीय शीर्ष निकाय के रूप में कार्य करता है। इसका मुख्यालय फरीदाबाद (हरियाणा) में स्थित है। यह अखिल भारतीय आधार पर अपने पांच क्षेत्रीय विद्युत प्रशिक्षण संस्थानों के माध्यम से प्रचालन करता है, जो नवेली (तमिलनाडु), दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल), बदरपुर (नई दिल्ली), नागपुर (महाराष्ट्र) और गुवाहाटी (असम) में स्थित है। वे पूर्ण रूप से आधुनिक तकनीकियों से युक्त हैं और लंबे वर्षों की व्यावसायिक एवं तकनीकीय पृष्ठभूमि वाले विशेषज्ञ संकाय इनके पास हैं।
- ऊर्जा कार्य कुशलता ब्यूरो (बीईई) - की स्थापना ऊर्जा संरक्षण अधिनियम 2001 के संपूर्ण ढांचे के अंतर्गत नीतियां और कार्यनीति विकसित करने के लिए की गई है। इसका लक्ष्य ऊर्जा बचत उपायों का वंर्धन करना और ऊर्जा गहनता कम करना है (अर्थात भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रति यूनिट/उत्पाद/सेवा ऊर्जा खपत, व्यवहार और प्रक्रिया)
- संयुक्त उद्यम निगम, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं :-
- सतलुज जल विद्युत निगम लिमिटेड (एसजेवीएन) - यह भारत सरकार और हिमाचल प्रदेश की सरकार का सुंयक्त उद्यम है, जिसकी स्थापना हिमाचल प्रदेश के सतलुज नदी के बेसीन में पनबिजली परियोजना की योजना बनाना, संवर्धन करना संगठित करना और कार्य निष्पादन करने के उद्देश्य से की गई है।
- टेहरी पनबिजली विकास निगम (टीएचडीसी) - यह भारत सरकार और उत्तर प्रदेश की सरकार का संयुक्त उद्यम है जिसकी स्थापना उत्तर प्रदेश में भागीरथी-भीलांगना घाटी में पनबिजली परियोजनाओं की योजना बनाने, संवर्धन करने, संगठित करने, निष्पादन संचालन और रखरखाव करने के उद्देश्य से की गई है।
नीतिगत पहलें और अवसर
विद्युत क्षेत्रक निजी क्षेत्रक निवेश के लिए खुलने वाला पहला क्षेत्रक है। यद्यपि आरंभिक बल विद्युत उत्पादन परियोजनाओं में निवेश करना था बाद में इसको वितरण और पारेषण परियोजनाओं में अनुमति दी गई है। देश में विद्युत उत्पादन क्षमता बढ़ाने और ऊर्जा क्षमता का संवर्धन करने के लिए निजी निवेश आकर्षित करने के लिए मंत्रालय ने अनेकानेक सुधार के उपाय किए हैं। उदाहरण के लिए 'विद्युत अधिनियम 2003' अधिनियमन विद्युत क्षेत्रक के संपूर्ण विकास के लिए समर्थकारी ढांचा मुहैया करने के लिए किया गया है। यह अधिनियम विद्युत के उत्पादन पारेषण वितरण, व्यापार और उपयोग, ऐसे उपाय संबंधित कानूनों का संकलन करने, विद्युत उद्योग के लिए अनुकूल उपाय करने, इसमें प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने, और सभी क्षेत्रों को विद्युत की आपूर्ति करने के संबंध में कानूनों का संकलन करना है। विद्युत अधिनियम का लक्ष्य विद्युत प्रशुल्क को यौक्तिक बनाना, क्षमता का संवर्धन और पर्यावरण के अनुकूल नीतियां बनाना, सीईए का गठन और विनियामक आयोग का गठन, चोरी आदि के मामले में उल्लंघन करने पर दंड की व्यवस्था करना भी है।
विद्युत अधिनियम 2003, के तहत केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों और सीईए के परामर्श से 'राष्ट्रीय विद्युत नीति’ बनाई है। नीति की घोषणा ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता, प्रौद्योगिकी, उत्पादन की मिव्ययिता और ऊर्जा सुरक्षा मुद्दों के मद्देनजर विद्युत क्षेत्रक का विकास ओर सभी क्षेत्रों में विद्युत की आपूर्ति के विकास को त्वरित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के लिए की गई है। इसका उद्देश्य निम्नलिखित लक्ष्यों को हासिल करना है :-
- विद्युत की पहुंच, अर्थात आगामी पांच वर्षों में सभी घरों के लिए उपलब्ध कराना;
- मांग 2012 तक पूरी तरह पूरी की जाए और ऊर्जा की कमी से निजात मिले;
- सक्षम तरीके से उचित दरों पर विशिष्ट स्तर की भरोसेमंद और गुणवत्ता पूर्ण विद्युत की आपूर्ति;
- वर्ष 2012 तक विद्युत की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 1000 यूनिट से अधिक बढ़ाना;
- वर्ष 2012 तक न्यूनतम लाइफ लाइम खपत 1 यूनिट/घर/दिन गुणवत्ता माल के रूप में;
- उपभोक्ता के हितों की रक्षा आदि।
इसके अलावा विद्युत (संशोधन) अधिनियम, 2007 में विद्युत अधिनियम, 2003 के कुछ विशिष्ट प्रावधानों को संशोधित करने की घोषणा की गई है, जो है केन्द्रीय सरकार के साथ संयुक्त रूप से राज्य सरकारें ग्रामीण विद्युतीकरण, मूल संरचना के माध्यम से गांवों और छोटे कस्बों सहित सभी घरों में बिजली की पहुंच प्रदान करें और सभी घरों का विद्युतीकरण करें।
विद्युत मंत्रालय, ने एक महत्वाकांक्षी मिशन '2012 तक सभी के लिए बिजली' शुरू किया है, जो विद्युत क्षेत्रक के विकास के लिए व्यापक ब्लू प्रिंट है। मिशन के लिए अपेक्षा है कि वर्ष 2012 तक संस्थापित विद्युत उत्पादन क्षमता कम से कम 2,00,000 मेगावॉट होना चाहिए। इसका लक्ष्य कम से कम लागत पर सभी क्षेत्रों को भरोसेमंद पर्याप्त और गुणवत्ता पूर्ण विद्युत की आपूर्ति करना और विद्युत उद्योग की वाणिज्यिक व्यवहार्यता को बढ़ाना है। ऐसे लक्ष्यों को हासिल करने में समर्थ होने के लिए, निम्नलिखित कार्यनीतियां अपनाई जा रही है:-
- कम लागत का उत्पादन, क्षमता उपयोग का अनुकूलन, निवेश लागत का नियंत्रण, ईंधन मिश्रण का अनुकूलन, प्रौद्योगिकी उन्यन और अपारम्परिक ऊर्जा स्रोतों के उपयोग पर बल देते हुए विद्युत उत्पादन कार्यप्रणाली;
- अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन सहित नेशनल ग्रिड का विकास प्रौद्योगिकी उन्नयन और पारेषण लागत को अनुकूल बनाने पर जोर देते हुए पारेषण कार्यप्रणाली;
- प्रणाली उन्नयन, क्षय की कटौती, चोरी पर नियंत्रण, उपभोक्ता सेवा अभिमुखीकरण गुणवत्ता विद्युत आपूर्ति वाणिज्यीकरण विकेंद्रीकृत वितरित उत्पादन और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आपूर्ति पर जोर देते हुए वितरण कार्यप्रणाली;
- विद्युत क्षेत्रक का अपेक्षित विकास के लिए संसाधनों का सृजन करने हेतु वित्त पोषण कार्यप्रणाली; आदि
इसके अलावा देश में वर्ष 2012 तक चरण गत रूप से लगभग 37,700 मेगावॉट की विद्युत अंतरण अंतर क्षेत्रीय क्षमता सहित समेकित 'राष्ट्रीय पावर ग्रिड' की स्थापना की जानी है। पहला चरण वर्ष 2002 में पूरा किया गया है जहां क्षेत्रीय ग्रिडों को मुख्यतया एचवीडीसी बैक टू बैक द्वारा जोड़ा गया है और अंतरक्षेत्रीय विद्युत अंतरण क्षमता 5050 मेगावॉट स्थापित की गई है। दूसरे चरण का क्रियान्वयन पहले ही शुरू हो चुका है और तालचर कोलार एचवीडीपी बाइपोल, रायपुर, राउरकेला 400 कि.वा. डी/सी ट्रांसमिशन प्रणाली का श्रृंखला कंपन्सेशन और गाजुवाका में द्वितीय बैक टू बैक सिस्टम के साथ शुरू होने से अंतर क्षेत्रीय विद्युत अंतरण क्षमता 9450 मेगावॉट बढ़ गई है। इसने अरुणाचल प्रदेश से गोवा तक 2500 कि.मी. विस्तृत समक्रमिक ग्रिड का सृजन किया है जिसमें 16 लाख वर्ग कि.मी. का क्षेत्र शामिल है जिसकी संस्थापित क्षमता 50,000 मेगावॉट से अधिक है। अन्य संबंधों के साथ कार्यान्वयन / योजना के अधीन संचित अंतर क्षेत्रीय विद्युत अंतरण क्षमता 2012 तक 37,150 मेगावॉट हो जाने की आशा है।
इसके अतिरिक्त ग्रामीण विद्युतीकरण ग्रामीण क्षेत्रों के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण कार्यक्रम समझा जाता है। इसके लक्ष्य हैं :- आर्थिक विकास तेज करना और कृषि और ग्रामीण उद्योगों में उत्पादकता उपयोगों के लिए निवेश के रूप में विद्युत मुहैया कराने द्वारा रोजगार का सृजन करना तथा घरों, दुकानों, सामुदायिक केंद्रों और सभी गांवों में सार्वजनिक स्थानों में प्रकाश व्यवस्था के लिए बिजली की आपूर्ति करने द्वारा ग्रामीण जनता के जीवन स्तर में सुधार लाना है।
भारत सरकार ने समय-समय पर देश में ग्रामीण क्षेत्रों के विद्युतीकरण के लिए अनेकानेक कार्यक्रम शुरू किया है। उदाहरण के लिए 'रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन सप्लाई टेक्नोलॉजी (आरईएसटी)' मिशन की शुरूआत वर्ष 2012 तक स्थानीय नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों, विकेंद्रीकृत प्रौद्योगिकियों तथा पारम्परिक ग्रिड कनेक्शन द्वारा निरन्तर सभी गांवों और घरों के विद्युतीकरण को त्वरित करने की दृष्टि से की गई है। इसका लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों को खरीद सकने लायक और भरोसेमंद विद्युत आपूर्ति मुहैया कराना और जहां कहीं भी व्यावहार्य हो संवितरित उत्पादन योजनाओं के द्वारा क्रियान्वयन करना है।
इसके अतिरिक्त 'राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना (आरजीजीवीवाई) नाम योजना ग्रामीण विद्युतीकरण मूल संरचना और घरेलू विद्युतीकरण' के लिए अप्रैल 2005 में शुरू की गई है, यह राष्ट्रीय साझा न्यूनतम कार्यक्रम लक्ष्य चार वर्षों की अवधि तक सभी ग्रामीण घरों को बिजली की पहुंच उपलब्ध कराने के लिए है। ग्रामीण विद्युतीकरण निगम (आरईसी) योजना के क्रियान्वयन के लिए नोडल एजेंसी है। इस योजना के तहत 90 प्रतिशत पूंजी आर्थिक सहायता ग्रामीण विद्युतीकरण मूल संरचना परियोजनाओं के लिए निम्नलिखित के माध्यम से मुहैया करायी जाएगी:-
- प्रत्येक ऐसे ब्लॉक के एक 33/11 केवी (या 66/11 केवी) वाले सबस्टेशन में सहित ग्रामीण विद्युत वितरण आधार (आरईडीबी) का सृजन, जहां यह नहीं है।
- सभी अविद्युतीकृत गांवों/अधिवास के विद्युतीकरण के लिए और प्रत्येक गांव/अधिवास में उपयुक्त क्षमता की वितरण ट्रांसफार्मर की व्यवस्था करने के लिए ग्रामीण विद्युत मूल संरचना का सृजन,
- गांवों/अधिवास के लिए जहां ग्रिड आपूर्ति किफायती नहीं है और जहां अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय अपने कार्यक्रमों के माध्यम से विद्युत मुहैया नहीं कराने वाला है, के लिए पारम्परिक स्रोतों से विकेंद्रीकृत संवितरित उत्पादन (डी डी जी) और आपूर्ति प्रणाली।
यह योजना सभी अविद्युतीकृत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले घरों को विद्युतीकरण के लिए शत प्रतिशत पूंजी सबसिडी भी प्रदान करती है।
यह योजना अन्य बातों के साथ-साथ सभी अविद्युतीकृत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले घरों को 100 प्रतिशत पूंजी आर्थिक सहायता सहित विद्युतीकरण के लिए वित्तीय सहायता मुहैया कराती है।
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