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राष्‍ट्रीय स्‍तर की मूल संरचना : समुद्री परिवहन :
नौवहन
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नौवहन देश की समग्र परिवहन श्रृंखला में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह भारी मात्रा में कार्गो के परिवहन के लिए अनुकूल कम लागत वाला विकल्‍प है। व्‍यापार बढ़ाने, रोजगार का सृजन करने और विदेशी मुद्रा का अर्जन करने में दृष्टि से इसका विशाल बहुआयामी प्रभाव है। यह अन्‍य सहायक क्षेत्रकों को भी शक्ति प्रदान करता है जैसे जहाज निर्माण, शिपब्रेकिंग, जहाज मरम्‍मत, समुद्री परिवहन प्रशिक्षण आदि।

भारतीय नौवहन उद्योग का वर्षों से देश के तटीय व्‍यापार में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसने भौतिक और वित्‍तीय परिसंपत्तियों की धरोहर विकसित की है, उत्‍कृष्‍ट जनशक्ति संसाधन, विस्‍तृत ज्ञानाधार और विश्‍वसनीय मूल संरचना विकसित किया है। विकासशील देशों के बीच भारत में सबसे बड़ा व्‍यापार नौवहन बेड़ा है और नौवहन टन भार में विश्‍व में इसका 17वाँ स्‍थान है। जहाजरानी टनेज, जो स्‍वतंत्रता के समय केवल 1.92 लाख सकल पंजीकृत टनेज (जीआरटी) था, अब 850 जहाजों के साथ (31 दिसम्‍बर, 2007 के अनुसार) 9.02 मिलियन जीआरटी है। वर्ष 2007 के दौरान कुल विदेशी कारोबार में भारतीय जहाजों की हिस्‍सेदारी 12.2 प्रतिशत थी। इसके अतिरिक्‍त देश भर में 28 शिपयार्ड हैं जो पोत बनाने के लिए मनपसंद जगह के रूप में वैश्विक मंच पर उभर रहे हैं। भारत, अंतरराष्‍ट्रीय समुद्री परिवहन संगठन (आईएमओ), यूएनसीटीएडी, जैसे विभिन्‍न अंतरराष्‍ट्रीय निकायों के क्रियाकलापों में भाग लेने के द्वारा समुद्री नौवहन में अंतरराष्‍ट्रीय सहयोग के लिए भी सहयोग कर रहा है।

भारत की महत्‍वपूर्ण स्थिति को देखते हुए जहाजरानी उद्योग में आगे विकास की अपार संभावना है। सरकार द्वारा इस क्षेत्र की वृद्धि को प्रोत्‍साहन देने के लिए अनेक नीतिगत उपाय तथा प्रोत्‍साहन दिए जाते हैं। इसमें कॉर्पोरेट के स्‍थान पर वित्तीय वर्ष 2005-06 से टनेज कर प्रणाली लाई गई है ताकि भारतीय जहाजरानी उद्योग को एक स्‍तरीय क्षेत्र बनाने के साथ अंतराष्‍ट्रीय जहाजरानी कंपनियों के स्‍तर पर लाया जा सके और साथ ही भारतीय टनेज की वृद्धि की सुविधा प्रदान करने के लिए राजकोषीय कार्यनीति का यौक्तिकरण किया गया है। वर्ष 2006-07 से टनेज कर कार्य व्‍यवस्‍था में ड्रेजर्स को भी शामिल किया गया है। राष्‍ट्रीय जहाजरानी बोर्ड की स्‍थापना मर्चेंट जहाजरानी अधिनियम, 1958 के तहत एक स्‍थायी संवैधानिक निकाय के रूप में की गई है, जो इसके विकास सहित जहाजरानी से संबंधित मामालों में सरकार को सलाह देता है।

नौवहन महानिदेशालय, जो नौवहन मंत्रालय, का संबद्ध कार्यालय है, नौवहन नीति और कानून, सुरक्षा संबंधी विभिन्‍न अंतरराष्‍ट्रीय संगोष्ठियों का क्रियान्‍वयन, प्रदूषण की रोकथाम और अंतरराष्‍ट्रीय समुद्री परिवहन संगठनों के अन्‍य सांविधिक विनियमों से संबंधित मामलों के संबंध में व्‍यापार नौवहन अधिनियम, 1958 को प्रवृत्‍त करने के लिए स्‍थापित किया गया है। यह देश के मर्चेन्‍ट नेवी बेड़ा के लिए अपेक्षित प्रशिक्षित जनशक्ति के सृजन के लिए भी उत्‍तरदायी है। इस आवश्‍यकता को पूरा करने के लिए महानिदेशालय सरकारी और निजी क्षेत्र की अनेक प्रशिक्षण संस्‍थाओं के माध्‍यम से विभिन्‍न विद्या में प्री सी और पोस्‍ट सी प्रशिक्षण चलाता है।

सरकारी क्षेत्र में इंडियन इंस्‍टीट्यूट ऑफ मेरीन (आईआईएमएस), मुंबई के अधीन चार प्रशिक्षण संस्‍थान हैं:-
  1. ट्रेनिंग शिप 'चाणक्‍य'
  2. समुद्री अभियांत्रिकी और अनुसंधान संस्‍थान (एमईआरआई), कोलकाता
  3. मेरीन इंजीनियरिंग एंड रिसर्च इंस्‍टीटद्ययूट (एमईआरआई),मुंबई
  4. लाल बहादुर शास्‍त्री कॉलेज ऑफ एडवांस मेरीटाइम स्‍टडीज़ एंड रिसर्च, मुंबई

शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. (एससीआई),जिसका गठन ईस्‍टर्न शिपिंग कॉर्पोरेशन लि. (ईएससी) और वेस्‍टन शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लि. (डब्‍ल्‍यूएससी) को मिलाकर किया गया है, भारत में सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी है। यह विश्‍व की एक सबसे विविधीकृत कंपनी भी है। केवल 19 जहाजों के साथ एक छोटी सी जहाजरानी कंपनी के रूप में आरंभ करते हुए एससीआई 79 जहाजों के साथ (30.11.2007 के अनुसार) अब कुल सकल टनेज 27.30 लाख [47.59 लाख डैड वेट टनेज (डीडब्‍ल्‍यूटी)] का स्‍वामित्‍व और प्रचालन करता है। इसके बेड़े में सामान्‍य कार्गो पोत, सेल्‍युलर कंटनेर पोत, कच्‍च तेल टैंकर, उत्‍पाद टैंकर भारी वहन, एलपीजी/अमोनिया कैरीयर, सवारी पोत और विदेशी आपूर्ति पोत हैं। यह आज भारत की एक मात्र भारतीय शिपिंग कंपनी है जो ब्रेक बल्‍क सेवा, अंतरराष्‍ट्रीय कंटेनर सेवा, द्रवित/सूखा सेवा, विदेशी सेवा, सवारी सेवा प्रबंधन/विभिन्‍न सरकारी विभागों और संगठनों की ओर से प्रबंधन के अलावा करती है।

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