भारत में संपूर्ण आर्थिक विकास गतिविधियों में नवाचार सामग्री के स्तर को बढ़ा कर देश भर में संपदा के सृजन हेतु व्यापक अदोहित संभाव्यता निहित है। यह एक लंबा आमंत्रण है, किन्तु अनिवार्य भी है, यदि वृद्धि की सकल घरेलू उत्पाद वर्तमान दर को अगले दो दशकों तक बनाए रखना है। यहां नवाचार स्थायित्व के लिए भी एक कुंजी होगा जो प्राकृतिक संसाधनों के स्थायी उपयोग को सुनिश्चित करते हुए विकास संबंधी उद्देश्यों को पूरा करने की क्षमता रखता हो।
नवाचार की चर्चाओं में आम तौर पर आजीविका या निर्धन व्यक्तियों के जीवन की गुणवत्ता में प्रत्यक्ष सुधार लाने के लिए नवाचार की भूमिका को छोड़ दिया जाता है। एक सामान्य अवधारणा यह है कि इसकी देखभाल बाजार की प्रक्रिया करेगी। जबकि नवाचार की भूमिका इसकी आपूर्ति और अभिगम्यता तथा सेवाओं में है जो जीवन की गुणवत्ता के लिए अनिवार्य है, चाहे यह साफ पानी, आधुनिक ऊर्जा या वहनीय स्वास्थ्य देखभाल की बात हो।
वैश्विक प्रतिस्पर्द्धी बाजार परिवेश में तीव्र वृद्धि द्वारा राष्ट्रीय नवाचार मूल संरचना की मांग होती है जो ज्ञान प्रणाली को दक्षता और प्रभावी रूप से संपत्ति सीजन के साथ जोड़ती है। भारत के सामाजिक संदर्भ में यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि नवाचारी वृद्धि को ऐसी प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए जो गरीबों को किनारे न कर दें और उन्हें विकास के विकल्पों से दूर न रखा जाए ताकि वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा के नवाचारों का लाभ उन्हें भी मिल सके। भारत की नवाचार मूल संरचना का लक्ष्य आंतरिक असमानता को दूर करना और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धा तथा समावेशी वृद्धि के साथ इसे जोड़ने का प्रयोजन पूरा करना होना चाहिए।
निर्धन उन्मुख और वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता के दोनों उद्देश्य नवाचार की खोज में संलग्न होने चाहिए। भारत के अनौपचारिकत क्षेत्र में बुनियादी स्तर के निवेशकों की संख्या काफी बड़ी है। जबकि बुनियादी स्तर के नवाचार पर्याप्त संसाधनों के अभाव में पर्याप्त आर्थिक लाभ पाने में सक्षम नही होते हैं। औपचारिक क्षेत्र में मूल संरचना दुर्बल है। इसके लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं और बाजार की मांगों के संदर्भ द्वारा गहराई लाने की आवश्यकता है। ऐसी नवाचारी मूल संरचना सशक्त रूप से अनुसंधान और विकास में गतिशीलत तथा लाभकारी लोक निजी भागीदारी पर निर्भर करेगी और साथ ही नवाचार के वाणिज्यीकरण का प्रभाव भी इस पर पड़ेगा।
स्थायी नवाचार की मूल संरचना की डिजाइन तथा विकास को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं, अनुसंधान और विकास धाराओं के अंदर आकर्षण, संलग्नता, धारणीयता और नवाचारी प्रतिभा, सार्वजनिक निजी भागीदारी, उद्यम और एंजल निधिकरण तथा क्षमता निर्माण को विचार में लिया जाना चाहिए। भारतीय दृष्टिकोण 2025 को साकार करना वैश्विक ज्ञान अर्थव्यवस्था में एक प्रमुख आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है जिसके लिए स्थायी नवाचार मूल संरचना की आवश्यकता होगी।
हमारे नवाचार की पूर्ण संभाव्यता के उपयोग हेतु हमें एक राष्ट्रीय नवाचार नीति बनाने की आवश्यकता है जो उद्यमों के बीच प्रतिस्पर्द्धा को प्रोत्साहन दें, ज्ञान का अधिक विस्तार कर सकें और आरंभिक अवस्था के प्रौद्योगिकी विकास की पहलों एवं बुनियादी स्तर के नवाचारियों को समर्थन में बढ़ावा दें। अनुसंधान और विकास संस्थानों, विश्व विद्यालयों और निजी क्षेत्र उद्यमों के बीच अधिक सहयोग की आवश्यकता है जो विभिन्न नवाचारी कार्यक्रमों की अधिकल्पना और कार्यान्वयन में अपनी संचयी शक्ति का सहयोग दे सकें। साथ ही इसमें सार्वजनिक निधीकृत अनुसंधान और विकास के वाणिज्यीकरण तथा निवेशकों को प्रोत्साहन देने के लिए एक उपयुक्त विधायी रूपरेखा की आवश्यकता है, जहां सरकार, निधि प्राप्त करने वाले, नवाचारी और सार्वजनिक लाभ को बौद्धिक संपदा के संरक्षण एवं वाणिज्यीकरण में उपयोग किया जा सके।
नवाचार की जड़ में आविष्कार होता है, जो एक अनिवार्य रचनात्मक कदम है जिसे वास्तव में निर्देशित या बल पूर्वक आगे नहीं चलाया जा सकता। जबकि ऐसा बहुत कुछ है जो इस आरंभिक कदम को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है तथा ऐसे अन्य अनेक कदम हैं जो आविष्कार से समाज को इसके अंतिम उत्पादक मूल्य प्रदान करेंगे। यह कदम आपस में एक दूसरे से अलग या विशिष्ट नहीं हैं अत: यह सूचना अधिक उपयुक्त होगा कि एक व्यापक नवाचार नीति बनाई जाए, बजाए इसके कि एक ऐसी नीति जो नवाचार प्रणाली के तत्वों या प्रक्रिया में एक मात्र कदम हैं। नवाचार नीति को व्यापक सामाजिक और आर्थिक संदर्भ के अंदर रखने की आवश्यकता है, जिसे लक्ष्यों द्वारा सूचित और विकास की अपेक्षाओं से अवगत बनाया जाए और इससे सार्वजनिक और निजी हितों, सामाजिक तथा आर्थिक लक्ष्यों और समावेशी बनाम तेजी के बीच एक निष्पक्ष और प्रभावी संतुलन बनाया जा सके।