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Investment Opportunities and Incentives
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Investment Opportunities and Incentives राष्‍ट्रीय स्‍तर का निवेश
Investment Opportunities and Incentives राज्‍य स्‍तरीय निवेश
   
 
Investment Opportunities and Incentives
अवसर, नीतियां तथा प्रोत्‍साहन:
ऑटोमोटिव
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ऑटोमोटिव उद्योग अर्थव्‍यवस्‍था के सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक है। यह देश के अनेक प्रमुख खंडों के साथ अपने सशक्‍त अग्रगामी तथा पश्‍चगामी संबंधनों के कारण समग्र आर्थिक अभिवृद्धि का चालक है। ऑटोमोटिव उद्योग में दो उपक्षेत्रक हैं नामत: ऑटोमोबाइल तथा ऑटो संघटक क्षेत्र। भारत में, ऑटोमोटिव उद्योग सुविकसित है तथा यात्री कार; हल्‍के, मध्‍यम तथा भारी वाणिज्यिक वाहन; बहु प्रयोजन वाहन; दो पहिए; तिपहिए; ट्रैक्‍टर इत्‍यादि जैसे विविध प्रकार के वाहनों का उत्‍पादन करके एक ठोस परिहवन प्रणाली की व्‍यवस्‍था करता है।

वर्ष 1991 में इस क्षेत्रक के लाइसेंस मुक्‍त होने तथा खुलने (विस्‍तारित) होने से उद्योग प्रभावपूर्ण अभिवृद्धि दर्शा रहा है। प्रगामी उदारीकरण उपायों ने नवीनतर प्रौद्योगिकियों की पुनर्संरचना, समावेशन के साथ साथ इसे वैश्विक घटनाक्रमों के साथ संरेखित करने में सहायता की है। इसने देश की समग्र अभिवृद्धि क्षेत्र का योगदान वर्ष 1992-93 सकल घरेलू उत्‍पाद के 2.7 प्रतिशत की तुलना में बढ़ाकर वर्ष 2005-06 में 5 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, क्षेत्रक की अभिवृद्धि दर भी वर्ष 2005-06 में 15.06 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2006 -07 ( अप्रैल - नवम्‍बर 2006 तक) में 16.07 प्रतिशत हो गई है।

आज भारत के ऑटोमोटिव उद्योग ने विश्‍वव्‍यापी स्‍थान बना लिया है जिससे भारत विश्‍व में दुपहियों वाहनों का दूसरा बड़ा विनिर्माता; वाणिज्यिक वाहनों का पांचवा सब से बड़ा विनिर्माता तथा एशिया में चौथा सबसे बड़ा यात्री कार बाज़ार बन गया है। यह विश्‍व भर में ट्रैक्‍टरों की सर्वाधिक संख्‍या का विनिर्माण भी करता है।

भार उद्योग तथा लोक उद्यम मंत्रालय में भारी उद्योग विभाग (डीएचआई) ऑटोमोटिव क्षेत्र के विकास तथा अभिवृद्धि का संवर्धन करने के लिए भारत का नोडल प्राधिकरण है। यह विभाग भारत इंजीनियरी उद्योग, मशीन औजार उद्योग, भारी वैद्युत उद्योग, औद्योगिक मशीनरी इत्‍यादि के विकास से भी संबंधित है।

निवेशों (घरेलू तथा विदेशी दोनों) को इस क्षेत्र में आकृष्‍ट करने के उद्देश्‍य से विभाग समय समय पर अनेक नीतिगत घोषणाएं (प्रोत्‍साहनों सहित) करता है। इनमें से प्रमुख 2002 की 'ऑटो नीति' है जिसका उद्देश्‍य भारतीय ऑटोमोटिव उद्योग की अखंड, चरणबद्ध, सतत तथा आत्‍मनिर्भर अभिवृद्धि का संवर्धन करने के साथ साथ 2010 तक अर्थव्‍यवस्‍था में इसके योगदानों को दोगुना करना है। इसके उद्देश्‍य निम्‍नलिखित हैं :-

  • इस क्षेत्र को औद्योगिक अभिवृद्धि तथा रोज़गार के उत्‍तोजक के रूप में अभिवर्धित करना;

  • ऑटो संघटकों के लिए एक वैश्विक स्रोत के रूप में उदीयमान होना;

  • छोटी, वहनीय यात्री कारों के विनिर्माण के लिए विश्‍व में एक अंतरराष्‍ट्रीय केंद्र तथा ट्रैक्‍टरों एवं दोपहियों के विनिर्माण के लिए एक प्रमुख केंद्र की स्‍थापना करना;

  • भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था तथा स्‍थानीय उद्योग को न्‍यूनतम जोखिम पर मुक्‍त व्‍यापार की ओर संतुलित संक्रमण सुनिश्चित करना;

  • उद्योग का सतत् आधुनिकीकरण अभिप्रेरित करना तथा स्‍वदेशी अभिकल्‍प, अनुसंधान एवं विकास को सुसाध्‍य बनाना;

  • वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों द्वारा प्रणोदित वाहनों के विकास में सहायता करना;

  • अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के समतुल्‍य घरेलू सुरक्षा तथा पर्यावरणीय मानकों का विकास करना, इत्‍यादि।

ऐसी सभी पहलों के परिणामस्‍वरूप, क्षेत्रक में विदेशी निवेश तथा प्रौद्योगिकी के आयात के मानदंडों को प्रगामी रूप से उदार बनाया गया है तथा वर्तमान में 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्‍यक्ष निवेश (एफडीआई) स्‍वत: मार्ग के तहत अनुमत है। उद्योग ने वर्ष 2002-03 में 50,000 करोड़ रुपए से अधिक का निवेश आकृष्‍ट किया है जिसके बढ़कर वर्ष 2007 तक 80,000 करोड़ रुपए हो जाना निर्धारित है।

निम्न लागत तथा उच्‍च कुशल जनशक्ति; सुविकसित तथा वैश्विक रूप से प्रतिस्‍पर्धी ऑटो सहायक; स्‍थापित ऑटो मोबाइल परीक्षण तथा अनुसंधान एवं विकास केंद्रों; निम्‍नतम लागत पर स्‍टील के उत्‍पादन इत्‍यादि जैसे फायदों के साथ मिलकर ये नीतिगत उपाय तथा प्रोत्‍साहन क्षेत्र में आकर्षक निवेश अवसर उपलब्‍ध कराते हैं।

 

^ ऊपर

भारी उद्योग विभाग (डीएचआई)
भारी उद्योग विभाग की नवीनतम नीतिगत पहलें तथा महत्‍वपूर्ण कार्यकलाप
भारी उद्योग तथा लोक उद्यम मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्टे
 
 
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