मूल संरचना क्षेत्र किसी अर्थव्यवस्था का आधार स्तंभ है। किसी राष्ट्र की मूल संरचना के विकास और प्रगति का गहरा संबंध है। इसका आशय यह है कि किसी देश की वृद्धि को न केवल आगे बढ़ाया जाना चाहिए बल्कि समुचित मूल संरचना की सेवाओं की सतत उपलब्धता और उन्नयन द्वारा संयोजित और अनुसरण भी किया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में मूल संरचना किसी देश भी समग्र समृद्धि को बढ़ाने की एक पूर्व शर्त है। साथ ही उनके पिछले और अग्रिम संपर्कों के माध्यम से सुदृढ़ और सक्षम मूल संरचना सुविधाओं की मौजदूगी ने जीवन के स्तर पर अत्यधिक प्रभाव डाला है।
भारत में छ: मुख्य मूल संरचना उद्योग जो मूल संरचना क्षेत्र पर सीधा प्रभाव डालते हैं, वे कच्चा पेट्रोलियम; रिफाइनरी; उत्पाद; विद्युत उत्पादन; कोयला; सीमेंट; और तैयार इस्पात हैं। इन मूल संरचना उद्योगों का सूचक (औद्योगिक उत्पादन के सूचक में संयुक्त भार 26.7 प्रतिशत होने के कारण) 219.9 (अनंतिम) है और इसने फरवरी 2007 में 7.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है।
सक्षम निम्न लागत, अच्छी मूल संरचना के विकास में अत्यधिक लागत और लंबी निर्माण अवधि निहित है। इससे इस क्षेत्र में निजी निवेश का समुचित प्रवाह एक आवश्यकता बन गया है। तद्नुसार सरकार द्वारा नीतिगत उपायों के रूप में विभिन्न सुधार किए गए है। इसमें उदारीकृत नियम और विनियम; कर - प्रोत्साहनों और रियायतों की श्रृंखला; सरलीकृत प्रक्रियाएं आदि शमिल हैं ताकि निजी भागीदारी के लिए प्रेरक वातावरण प्रदान करने में समर्थ हो सकें। मूल संरचना समिति (सीओआई) की स्थापना करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें निम्नलिखित उद्देश्य शामिल हैं :-
- वे नीतियां आरंभ करना जो विश्व स्तरीय मूल संरचना का समयबद्ध सृजन सुनिश्चित करें;
- वह मूल संरचना विकसित करना जो मूल संरचना के क्षेत्र में सार्वजनिक निजी सहभागिता की भूमिका अधिकतम करें;
- यह सुनिश्चित करने के लिए मुख्य मूल संरचना परियोजनाओं की प्रगति की निगरानी करना जिनसे स्थापित लक्ष्य प्राप्त किए जा सकें।
निजी क्षेत्र संसाधनों और प्रौद्योगिकी प्रबंधन कुशलता लाने के लिए और इस प्रकार देश में मूल संरचना की कमी को दूर करने के लिए सरकार 'सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी)' को भी बढ़ावा दे रही है। सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजनाओं में सरकार और निजी पक्षों के बीच दोनों संविदाकारी पक्षों में अधिकारों और दायित्वों का दीर्घकालिक विस्तृत संविदाएं शामिल हैं। ऐसी सार्वजनिक-निजी भागीदारी बेहतर जोखिम बंटवारा, उत्तरदायित्व, लागत वसूली और मूल संरचना का प्रबंध शामिल है।
इन मूल संरचना सुविधाओं में मोटे तौर पर परिवहन सेवाएं (रेलवे, सड़क, परिवहन, पत्तन, विमानन); विद्युत उत्पादन, पारेषण और वितरण; दूरसंचार आदि शामिल हैं।
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