मणिपुर का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषणों की भूमि’ है। राज्य में प्राकृतिक संसाधनों का प्रचुर भंडार है। यहां की प्राकृतिक छटा देखने योग्य है। यहां तरोताजा करने वाले जल-प्रपात है; रंग-बिरंगे फूलों वाले पौधे हैं, दुर्लभ वनस्पतियां व जीव जंतु हैं, पवित्र जंगल हैं, हमेशा बहने वाली नदियां हैं, पर्वतों-पहाड़ियों पर बिखरी हरी विभा है और टेढ़े-मेढ़े गिरने वाले झरने हैं। लोकटक झील इसका महत्वपूर्ण भौगोलिक लक्षण है। भौतिक आधार पर राज्य को दो भागों में बांट सकते हैं पहाड़ियां व घाटियां। चारों ओर पहाड़ियां हैं और बीच में घाटी है। इस प्रकार प्रकृति की प्राचीन गौरव है। राज्य की कला व संस्कृति समृद्ध है जो इस विश्व मानचित्र पर समृद्धि को दर्शाता है।
यहां जनजातियों की तीन प्रमुख जातियां निवास करती हैं। घाटी में मीटाइस जनजाति रहती है तो नागा और कूकी-चिन जनजातियां पहाड़ियों पर रहती हैं। प्रत्येक जनजाति वर्ग की खास संस्कृति है और रीति रिवाज हैं जो इसके नृत्य संगीत व पारंपरिक प्रथाओं में काफी अंतर निहित है। मणिपुर के लोग कलाकार होते हैं साथ ही सृजनशील होते हैं जो उनके द्वारा तैयार खादी व दस्तकारी के अन्य उत्पादों में झलकती है, ये उत्पाद विश्व भर में अपनी डिज़ाइन, कौशल व उपयोगिता के लिए विश्व भर में जाने जाते हैं।
भारत के पूर्वी सीमा पर स्थित यह राज्य 23.83 डिग्री उत्तर और 25.68 डिग्री उत्तरी अक्षांश व 94.78 डिग्री पूर्वी देशांतर के बीच पड़ता है। एक ओर तो पूर्व में म्यांमार है तो नागालैंड उत्तर दिशा में हैं, असम पश्चिम में तो मिज़ोरम दक्षिण में है। यह पूरे 22,327 किलोमीटर में फैला है।
मणिपुर की भौगोलिक स्थिति यहां हुए अत्याधुनिक औद्योगिकीकरण को दर्शाता है। कृषि व अन्य सहायक कार्य अर्थव्यवस्था का आधार हैं, राज्य जानकारी आधारित सघन औद्योगिकीकरण के लिए उपयुक्त स्थान है, यहां उच्च शिक्षा की भी व्यवस्था है, यहां निवेश की कई संभावनाएं है खासकर कृषि व खाद प्रसंस्करण के क्षेत्र में हथकरघा, दस्तकारी, पर्यटन व सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी कई संभावनाएं है। इन क्षेत्रों में निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने कई नीतियां तैयार की हैं साथ ही निवेशकों को आकर्षित करने के कई प्रोत्साहन देने की भी घोषणा की है
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