संपत्तियों का अधिग्रहण और मांग समवर्ती सूची में आता है, अत: केन्द्रीय और राज्य सरकारों द्वारा इस मामले पर कानून बनाए जा सकते हैं। ऐसे अनेक स्थानीय और विशिष्ट कानून है, जो उन्हें भूमि के अधिग्रहण की सुविधा देते हैं, किन्तु भूमि के अधिग्रहण से संबंधित मुख्य कानून
भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 है।
यह ग्रामीण विकास मंत्रालय है जो संघ सरकार में भूमि अधिग्रहण पर केन्द्रीय विधान का प्रशासन करने वाला मंत्रालय है और केन्द्र द्वारा अधिनियम के संशोधन से संबंधित किसी प्रस्ताव को मंत्रालय के अधीन भूमि संसाधन विभाग द्वारा उठाया जाता है। भूमि संसाधन विभाग भूमि संसाधन के प्रबंधन तथा भूमि आधारित विकास कार्यक्रमों के लिए एक नोडल अभिकरण के रूप में कार्य करता है, जिन्हें इस विभाग के अधीन लाया गया है। भूमि अधिग्रहण और संपत्ति की मांग के विषय में शामिल सभी राज्य विधायी प्रस्ताव या अन्य किसी राज्य विधान, जिसका प्रभाव भूमि के अधिग्रहण और मांग पर है, की जांच विभाग द्वारा की जाती है।
इसी प्रकार भारतीय संविधान द्वारा राज्य सरकारों को शहरी और आवास विकास से संबंधित मामले सौंपे जाते हैं। संविधान के (74वां संशोधन) अधिनियम में शहरी स्थानीय निकायों को ये अनेक कार्य सौंपे गए हैं।
शहरी विकास मंत्रालय केन्द्रीय स्तर पर नोडल मंत्रालय है और इसका संवैधानिक और कानूनी प्राधिकार दिल्ली तथा अन्य संघ राज्य क्षेत्रों और उन विषयों तक सीमित है, जिन्हें राज्य विधान द्वारा संघीय संसद को विधान बनाने हेतु प्राधिकृत किया जाता है।
शहरी विकास मंत्रालय द्वारा शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 और शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 का प्रशासन किया जाता है जो शहरी व्यवस्थाओं में रिक्त भूमि के स्वामित्व और ग्रहण करने पर अधिकतम सीमा लागू करता है।
^ ऊपर