भूमि विश्व का सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। इसके बिना पृथ्वी पर जीवन संभव नहीं है। इस प्रकार मानव जाति का अंतिम लक्ष्य है कि जितनी अधिक संभव हो भूमि का अधिग्रहण किया जाए, बंजर पड़ी भूमि को दोबारा जीवित किया जाए और इन्हें आगे बंजर होने से रोका जाए। केन्द्र और राज्य / संघ राज्य क्षेत्र सरकारों द्वारा अनेक प्रकार के उपाय तथा पहलें की जा रही है, ताकि देश में भूमि संसाधनों की क्रमिक वृद्धि को प्रोत्साहन दिया जा सके और साथ ही बंजर भूमि / अनुपजाऊ भूमि के विकास की गति में तेजी लाई जा सके।
केन्द्रीय स्तर पर दो मंत्रालय हैं, नामत: 'ग्रामीण विकास मंत्रालय' और 'शहरी विकास मंत्रालय'। ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि के मामलों की देखभाल की जाती है, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 का प्रशासन किया जाता है तथा भूमि / संपत्ति के अधिग्रहण तथा मांग के विषय में सभी राज्य सरकार के विधायी प्रस्तावों की जांच की जाती है। 'भूमि संसाधन विभाग' मुख्य प्राधिकरण मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, जहां भूमि सुधारों, भूमि के कार्यकालों, भूमि के अभिलेखों, गैर कृषि भूमि के अधिग्रहण या भवन आदि के मामले निपटाए जाते हैं। जबकि दूसरा मंत्रालय मुख्य रूप से शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 और शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 जैसे कानूनों को लागू करने के लिए उत्तरदायी है, अर्थात जो शहरी व्यवस्थाओं में भूमि के विभिन्न पक्षों से संबंधित हैं।
राज्य / संघ राज्य क्षेत्र स्तर पर ऐसे अनेक विभाग हैं जो भूमि अधिग्रहण, आवास, मूल संरचना, शहर की योजना आदि के मामलों पर कार्य करते हैं। इनमें ग्रामीण विकास विभाग, योजना विभाग, लोक निर्माण विभाग, भूमि विभाग और अन्य समान विभाग शामिल हैं। ये सभी देश में शहरीकरण को प्रोत्साहन देने के लिए अपना अधिकतम योगदान देने पर लक्षित हैं और ये ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में भूमि से संबंधित सभी मामलों की देखभाल करते हैं। पुन: ऐसे अनेक शहरी विकास प्राधिकरण राज्यों में शहरी संपदाओं के विकास में शीघ्रता प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं।
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