परियोजना द्वारा विस्थापित व्यक्तियों की मूल संरचना सहित सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए भूमि का अनिवार्य अधिग्रहण, उन्हें अपने घर, परिसंपत्तियां तथा आजीविका के साधन छोड़ने के लिए मजबूर कर देता है। उन्हें अपनी भूमि से वंचित होने के अलावा अपनी आजीविका और संसाधन आधार से भी वंचित होना पड़ता है, इस विस्थापन का एक गंभीर मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक - सांस्कृतिक परिणाम होते हैं।
भारत सरकार ने अधिकतम संभव सीमा तक बड़े स्तर पर विस्थापन को न्यूनतम बनाने की आवश्यकता को पहचाना है, जहां विस्थापन अपरिहार्य है, इसे अत्यंत सावधानी से निपटाने की जरूरत होती है और परियोजना प्रभावित परिवारों के पुन: स्थापन तथा पुनर्वास से संबंधित मुद्दों को दूर दृष्टि से सुलझाया जाता है।
तदनुसार भूमि संसाधन विभाग, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने परियोजना से प्रभावित लोगों के लिए 2003 में एक नई राष्ट्रीय पुन: स्थापना और पुनर्वास नीति निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ निर्धारित की है :
- विस्थापन को न्यूनतम करना तथा गैर विस्थापन या न्यूनतम विस्थापन विकल्पों को चुनना;
- जनजातियों तथा संवेदनशील वर्गों की विशेष आवश्यकताओं सहित परियोजना से प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुन:स्थापना की योजना बनाना;
- परियोजना से प्रभावित परिवारों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना; और
- अधिग्रहण करने वाले निकाय और परियोजना से प्रभावित परिवारों के बीच आपसी सहयोग के माध्यम से सौहार्द पूर्ण संबंध विकसित करना।
विभाग ने पुन:स्थापना और पुनर्वास नीति, 2003 के स्थान पर एक नई राष्ट्रीय पुनर्वास और पुन: स्थापना नीति, 2007 लागू की है, जिसकी घोषणा 2007 में की गई थी।
राष्ट्रीय पुन:स्थापना और पुनर्वास नीति
इस नीति का लक्ष्य विकास गतिविधियों के लिए भूमि की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाए रखना और इसी के साथ भूमि के स्वामियों, किराएदारों, भूमिहीन व्यक्तियों, कृषि तथा गैर कृषि श्रमिकों, दस्तकारों और उन अन्य व्यक्तियों के हितों की रक्षा करने पर केन्द्रित हैं जो भूमि पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर करते हैं। यह सिफारिश करती है कि परियोजना के प्रयोजन के अनुसार भूमि के न्यूनतम अनिवार्य क्षेत्र को लिया जाना चाहिए तथा कृषि भूमि को गैर कृषि प्रयोजनों के लिए न्यूनतम उपयोग किया जाना चाहिए। साथ ही बहु फसल वाली भूमि को टाला जाना चाहिए और सिंचित भूमि का न्यूनतम हिस्सा इन प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाए। इन परियोजनाओं की स्थापना वरीयत: बंजर भूमि या गैर सिंचित भूमि पर की जानी चाहिए।
राष्ट्रीय पुनर्वास और पुन:स्थापना नीति के उद्देश्य निम्नानुसार है:-
- विस्थापन को न्यूनतम करना तथा जहां तक संभव हो विस्थापन न करना या न्यूनतम विस्थापन के विकल्प अपनाना;
- प्रभावित परिवारों की सक्रिय भागीदारी के साथ पुनर्वास की प्रक्रिया का शीघ्र कार्यान्वयन करना एवं पर्याप्त पुनर्वास पैकेज सुनिश्चित करना;
- इस बात को सुनिश्चित करना कि समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की विशेष देखभाल की जाती है, विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य और उनकी चिंता तथा संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए उनकी बाध्यताओं का सृजन करना;
- प्रभावित परिवारों को स्थायी आय प्रदान करने के लिए संकेन्द्रित प्रयास करना, जीवन के बेहतर स्तर प्रदान करना;
- विकास आयोजना तथा कार्यान्वयन प्रक्रिया में पुनर्वास की चिंताओं को समेकित करना; और
- जहां विस्थापन भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया पर की जानी है, वहां आपसी सहयोग के माध्यम से भूमि की आवश्यकता वाले निकाय और प्रभावित परिवारों के बीच सौहार्द पूर्ण संबंध विकसित करना।
राष्ट्रीय पुनर्वास और पुन: स्थापना नीति, 2007 की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं :
- अनैच्छिक विस्थापन के सभी मामलों को नीति में शामिल किया गया है;
- मैदानी / जनजातीय, पहाड़ी, अनुसूचित क्षेत्रों आदि में 400 /200 या इसे अधिक परिवारों के विस्थापन के लिए सामाजिक प्रभाव आकलन आरंभ किया गया है;
- 200 से अधिक अनुसूचित जनजाति के परिवारों के विस्थापन के मामले में जनजातीय विकास योजना;
- ग्राम सभा के साथ परामर्श या सार्वजनिक सुनवाई को अनिवार्य बनाना;
- विस्थापन से पहले पुनर्वास का सिद्धांत;
- यदि संभव हो तो मुआवज़े के तौर पर भूमि के लिए भूमि देना;
- कौशल विकास सहायता और परियोजना कार्यों में वरीयता (केन्द्रीय परिवार में एक व्यकित);
- भूमि / कार्य के बदले पुनर्वास अनुदान;
- प्रभावित परिवारों को परियोजना कार्यान्वित करने वाले कंपनियों में शेयर पाने का विकल्प;
- भूमि हीन व्यक्तियों सहित सभी प्रभावित परिवारों को आवासीय लाभ;
- संवेदनशील व्यक्तियों को मासिक पेंशन, जैसे कि विकलांग, बेसहारा, अनाथ, विधवाएं, अविवाहित लड़कियां आदि;
- उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के साथ जुड़े मौद्रिक लाभ; जिन्हें आवधिक अंतरालों पर उपयुक्त रूप से संशोधित भी किया जाए।
- पुन: स्थापना क्षेत्रों में मूल संरचनात्मक अनिवार्य सुविधाएं और उपयोगिताएं;
- परियोजना प्राधिकारियों द्वारा आस पास के क्षेत्रों का विकास;
- येक परियोजना के लिए पुनर्वास और पुन: स्थापना समिति, पुनर्वास और पुन: स्थापना के लिए प्रशासक द्वारा नेतृत्वृ;
- शिकायत निपटान के लिए लोकपाल; और
- राष्ट्रीय पुनर्वास आयोग।
नीति के तहत यह लाभ सभी प्रभावित व्यक्तियों और परिवारों के लिए उपलब्ध हैं, जिनकी भूमि, संपत्ति या आजीविका भूमि अधिग्रहण द्वारा प्रतिकूल रूप से प्रभावित है या एक स्थायी प्रकार के अनैच्छिक विस्थापन द्वारा, जिसका कारण कोई अन्य हो, जैसे कि प्राकृतिक आपदाएं आदि। यह नीति इसमें शामिल व्यक्तियों की संख्या को मद्देनजर न रखते हुए सभी मामलों पर लागू होगी।
प्रभावित परिवारों को नीति के तहत प्रस्तावित किए जाने वाले लाभों में निम्नलिखित शामिल है :
- भूमि के लिए भूमि, जिस सीमा तक पुन: स्थापना क्षेत्रों में सरकारी भूमि उपलब्ध होगी;
- परियोजना में प्रत्येक केन्द्रीय परिवार के कम से कम एक व्यक्ति को रोजगार की वरीयता प्रभावित परिवार की परिभाषा के अंदर देना, जो प्रभावित व्यक्ति की उपयुक्तता और रिक्त स्थानों की उपलब्धता के अधीन है;
- उपयुक्त कार्यों और स्व रोजगार के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण;
- प्रभावित परिवारों के पात्र व्यक्तियों को शिक्षा के लिए छात्रवृत्तियां;
- संविदाओं के आबंटन में प्रभावित व्यक्तियों की सहकारिताओं के समूहों को प्राथमिकता देना और परियोजना स्थल में या इसके आस पास आर्थिक अवसर प्रदान करना;
- परियोजना में संविदात्मक कार्यों में इच्छुक प्रभावित व्यक्तियों को पारिश्रमिक रोजगार;
- ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में भूमिहीन प्रभावित परिवारों के घरों सहित आवासीय लाभ एवं अन्य लाभ प्रदान करना।
पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विस्थापन, पुनर्वास और पुन:स्थापना पर सूचना के अनिवार्य प्रसार के प्रावधान प्रभावित व्यक्तियों और पुनर्वास पैकेजों सहित बनाए गए हैं। यह सूचना इंटरनेट पर सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कराई जाएगी, साथ ही इसे परियोजना प्राधिकारियों द्वारा संबंधित ग्राम सभाओं और पंचायतों के साथ बांटा जाएगाा