यूएलसीआरए, 1976 के उद्देश्य पूरे नहीं किए जा रहे थ अत: इस बात के सुझाव थे कि अधिनियम में संशोधन किया जाए। अत: राष्ट्रीय आवास और अधिवास नीति, 1998 के तहत आवास को प्रोत्साहन देने के लिए इसके निरसन का निर्णय लिया गया था। शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) निरसन विधेयक, 1999 को पारित करने के साथ कुछ राज्यों में यूएलसीआरए का निरसन किया गया था।
शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1999 द्वारा शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) निरसन अधिनियम, 1976 का निसरन किया गया। इसे पहले चरण में हरियाणा और पंजाब राज्यों में लागू किया गया और इसके साथ सभी संघ राज्य क्षेत्रों में भी लागू किया गया। यह उन अन्य राज्यों पर भी लागू किया जाएगा जो संविधान की धारा 252 की उप धारा (2) के अंतर्गत एक संकल्प द्वारा इस अधिनियम को अंगीकार करेंगे।
निरसन अधिनियम हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिशा और सभी संघ राज्य क्षेत्रों में प्रभावी है। शहरी भूमि (उच्चतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 अब भी आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में प्रभावी है।
सरकार की ओर से आवास गतिविधि हेतु भूमि की अधिक उपलब्धता की सुविधा प्रदान करने के लिए यूएलसीआरए, 1976 का निरसन किया गया है। सरकार ने स्टाम्प ड्यूटी और पंजीकरण प्रभारों के यौक्तीकरण का सुझाव भी दिया है। जबकि इस विषय में यूएलसीआरए के प्रावधानों के तहत निरसन अधिनियम रिक्त भूमि के अधिकार सौंपने पर प्रभाव नहीं डालेगा, जिसने राज्य सरकार से पहले ही स्वामित्व ले लिया है या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति।
यूएलसीआरए का निरसन शहरी भूमि के बाजारों में सुधार के प्रति एक महत्वपूर्ण कदम है। ऐसा माना जाता है कि निरसन से बड़ी मात्रा में भूमि के बड़े हिस्से बाजार में उपलब्ध हुए हैं। जबकि अधिनियम का निरसन सभी राज्यों में लागू नहीं किया गया है।
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