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विवाचन और समाधान (देशीय और अंतरराष्‍ट्रीय दोनों) से संबंधित कानून Previous Page
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विवाचन और समाधान अधिनियम, 1996 देशीय विवाचन, अंतरराष्‍ट्रीय वाणिज्यिक विवाचन तथा विदेशी पंचाट के प्रवर्तन और समाधान से संबंधित कानून को परिभाषित करने एवं उससे जुड़े या अनुषंगी मामलों के संबंध में बनाया गया मुख्‍य कानून है। इसने विवाचन के तीन सांविधिक उपबंधों को निरस्‍त किया:- (i) विवाचन अधिनियम, 1940; (ii) विवाचन (प्रोटोकोल और परम्‍परा) अधिनियम, 1937 ; और (iii) विदेशी पंचाट (मान्‍यता और प्रवर्तन) अधिनियम, 1961

देशीय विवाचन को एक वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र के रूप में परिभाषित किया गया है जिसमें पक्षकार अपने विवादों को किसी तीसरे व्‍यक्ति के हस्‍तक्षेप की मदद से और अदालती कार्रवाई का सहारा लिए बिना सुलझाते हैं। यह एक ऐसी निधि है जिसमें विवाद को एक नामनिर्दिष्‍ट व्‍यक्ति को सौंप दिया जाता है जो दोनों पक्षों की सुनने के बाद अर्ध-न्‍यायिक तरीके से मुद्दे के संबंध में निर्णय करता है। आम तौर पर विवादकारी पक्ष अपने मामले के पंचाट न्‍यायाधिकरण को सौंप देते है और न्‍यायाधिकरण द्वारा किया गया निर्णय ''पंचाट'' कहलाता है।

जबकि ''अंतरराष्‍ट्रीय वाणिज्यिक विवाचन से तात्‍पर्य है'' विधिक सम्‍बंधों, जो भले ही संविदात्‍मक जो भारत में प्रवृत कानून के तहत वाणिज्यिक माना जाता हो और जहां कम से कम एक पक्ष:- (i) ऐसा व्‍यक्ति हो जो भारत से इतर किसी अन्‍य देश का राष्ट्रिक है या आदतन वहां रहता; (ii) एक निगमित निकाय जो भारत से इतर किसी अन्‍य देशों में निगमित किया गया हो; (iii) कोई कम्‍पनी या एसोसिएशन या व्‍यक्तियों का निकाय जिसका केन्‍द्रीय प्रबंधन और नियंत्रण भारत से इतर किसी अन्‍य देश में किया जाता हो; (iv) को विदेशी सरकार।

अधिनियम में विवाचन से संबंधित मुख्‍य उपबंध इस प्रकार है:-

  • मौजूदा विवाद के पक्षकार ''विवाचन करार'' नामक एक करार निष्‍पादित कर सकते हैं कि न्‍यायालय जाने के बजाए वे ऐसे विवाद को विवाचन को सौंपेंगे। करार के पक्षकार विवाचन को ऐसा विवाद सौंप सकते हैं जो :-

    • जो उनके बीच उत्‍पन्‍न हो चुका हो या हो सकता हो,

    • सुस्‍पष्‍ट विधिक संबंधों, भले ही संविदात्‍मक हों या न हों, के संदर्भ में उठा हो।

    इस तरह, सिविल स्‍वरूप के सभी मामले भले ही वे मौजूदा या भावी विवादों से सम्‍बद्ध हों, इस संदर्भ का विषय हो सकते हैं। बौद्धिक सम्‍पदा अधिकारों के उल्‍लंघन जैसे विवाद भी शामिल किए जा सकते हैं।

  • हालांकि कोई औपचारिक दस्‍तावेज़ निर्धारित नहीं किया गया है, विवाचन करार/खण्‍ड अवश्‍य ही लिखित रूप में होना चा‍हिए। यदि विवाचन करार/खण्‍ड किसी दस्‍तावेज में हैं तो दस्‍तावेज पर संबंधित पक्षकारों के हस्‍ताक्षर होना चाहिए। :- (i) पत्रों, टेलैक्‍स, तार या दूरसंचार के अन्‍य माध्‍यमों के आदान-प्रदान से; अथवा (ii) दावों और प्रतिवार के विवरण का आदान-प्रदान जिसमें एक पक्षकार कथित रूप से करार की बात कहना हो और दूसरे पक्ष ने खण्‍डन न किया हो।

  • जो‍ विवाद विवाचन को नहीं सौंपे जा सकते, इस प्रकार हैं :-

    • दीवालियापन संबंधी कार्रवाई।

    • पागलपन संबंधी कार्रवाई।

    • अयस्‍क के अभिभावक की नियुक्ति संबंधी कार्रवाई।

    • वसीयत की यथार्थता या अन्‍यथा का प्रश्‍न या सम्‍प्रमाण जारी करने से जुड़ा मामला।

    • आपराधिक स्‍वरूप का मामला।

    • सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्‍टों से जुड़े मामले।

    • गैर-कानूनी संविदा से उभरे या उन पर आधारित विवाद।

  • करार में अनिवार्यतया एक मध्‍यस्‍थ की नियुक्ति की अपेक्षा की गई है। मध्‍यस्‍थ ऐसा व्‍यक्ति होता है जो उसे सौंपे गए मतभेद या विवाद की जांच और निपटान के प्रयोजनार्थ, विवादकारी पक्षों की पारम्‍परिक सहमति से या उस सहमति के बिना नियुक्‍त किया जाता है। पंचाट न्‍यायाधिकरण में एक अधिक मध्‍यस्‍थ हो सकते हैं। पक्षकार करार के ज़रिए मध्‍यस्‍थों की संख्‍या नियत करने के लिए स्‍वतंत्र है। तदनुसार, मामला एक मध्‍यस्‍थ को अथवा मध्‍यस्‍थों की विषम संख्‍या (अर्थात् 3, 5, 7 इत्‍यादि) के पैनल को सौंपा जा सकता है। यदि कोई करार नहीं होता तो मामला एकमात्र मध्‍यस्‍थ को सौंपा जा सकता है।

  • जब तक पक्षकारों द्वारा अन्‍यथा सहमति न हो, मध्‍यस्‍थ किसी भी राष्‍ट्रीयता का हो सकता है। अंतरराष्‍ट्रीय वाणिज्यिक विवाचन के मामले में, जहां पक्षकार विभिन्‍न राष्‍ट्रीयताओं के होते हैं, वहां भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश पक्षकारों की राष्‍ट्रीयता से इतर किसी अन्‍य राष्‍ट्रीयता का मध्‍यस्‍थ नियुक्‍त कर सकते हैं।

  • पक्षकार मध्‍यस्‍थ या मध्‍यस्‍थों को नियुक्‍त करने की प्रक्रिया तय करने के लिए स्‍वतंत्र है। यदि ऐसा कोई करार किया जाता है तो नियुक्ति उसी के अनुसार की जानी होगी। करार में मध्‍यस्‍थों की संख्‍या मध्‍यस्‍थ की योग्‍यता, नियुक्ति की प्रक्रिया, नियुक्ति को चुनौती देने की प्रक्रिया, नियुक्ति का समापन, मध्‍यस्‍थों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया, विवाचन का स्‍थान, भाषा इत्‍यादि से संबंधित प्रावधान किए जाने चाहिए।

  • पंचाट न्‍यायाधिकरण के कर्तव्‍य इस प्रकार हैं :- (i) स्‍वतंत्र, और निष्‍पक्ष रूप से कार्य करना तथा पक्षकारों के साथ समान व्‍यवहार करना; (ii) प्रत्‍येक पक्षकार को अपना पक्ष प्रस्‍तुत करने का पूरा मौका देना।

  • पक्षकार पंचाट न्‍यायाधिकरण द्वारा कार्रवाई के संचालन के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सहमति हो सकते है। ऐसे करार के अभाव में, पंचाट न्‍यायाधिकरण ऐसे तरीके से कार्रवाई संचालित कर सकता है जिसे वह उपयुक्‍त समझे और उसे किसी साक्ष्‍य की अनुमेयता, प्रासंगिकता, मह‍त्‍व और प्रभाव का निर्धा‍रण करने की शक्ति प्राप्‍त होगी। न्‍यायाधिकरण यह निर्णय करेगा कि क्‍या साक्ष्‍य के प्रस्‍तुतीकरण के लिए अथवा मौखिक वाद-विवाद के लिए मौखिक सुनवाई की जाए अथवा कार्रवाइयां दस्‍तावेजों व अन्‍य सामग्री के आधार पर संचालित की जाए।

  • पंचाट लिखित में किया जाएगा और पंचाट न्‍यायाधिकरण के सदस्‍यों द्वारा इस पर हस्‍ताक्षर किए जाएंगे। पंचाट में विवाचन की तारीख और स्‍थान का उल्‍लेख होगा। जब तक कि पक्षकार इस पर सहमत न हुए हों कि पंचाट में कारण न बताए जाएं या उनके बीच समझौता हो जाने के मामले को छोड़कर, अन्‍य मामलों में पंचाट अपने निर्णय का आधार बताएगा। पंचाट की एक हस्‍ताक्षरित प्रति प्रत्‍येक पक्षकार को दी जाएगी।

  • पंचाट का निर्णय किसी न्‍यायालय के निर्णय के समान ही प्रवर्तनीय होता है, सामान्‍यतया पक्षकारों द्वारा इसे प्राप्‍त किए जाने की तारीख से तीन माह के भीतर बशर्ते कि इस पंचाट को रोकने के लिए कोई आवेदन न किया गया हो या यदि किया गया हो तो उसे अस्‍वीकृत कर दिया गया हो। पंचाट पक्षकारों और व्‍यक्तियों, जो उसके तहत दावा कर रहे थे, के लिए अंतिम और बाध्‍यकारी होगा।

  • पंचाट कार्रवाइयां समाप्‍त कर दी जाएगी यदि:-

    • अंतिम पंचाट कर दिया गया हो,

    • दावेदार ने दावा वापस ले लिया हो और प्रतिवादी ने आपत्ति न की हो,

    • पक्षकार कार्रवाई समापन पर सहमत हो,

    • किसी अन्‍य कारण से कार्रवाइयां जारी रखना अनावश्‍यक या असंभव हो गया हो।

विवाचन और समाधान अधिनियम, समाधान को विवाद निपटान के एक विशिष्‍ट तरीके के रूप में सांविधिक मान्‍यता प्रदान करता है। समाधान को एक मध्‍यस्‍थ की सहायता से पक्षकारों द्वारा विवादों के सौहार्दपूर्ण निपटान की प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है। यह विवाचन से इस अर्थ में भिन्‍न है कि विवाचन में पंचाट किसी तीसरे पक्ष या पंचाट न्‍यायाधिकरण का निर्णय होता है, जबकि समाधान के मामले में निर्णय पक्षकारों का होता है जो मध्‍यस्‍थ की मध्‍यस्‍थता से किया जाता है।

अधिनियम में समाधान से संबंधित मुख्‍य प्रावधान इस प्रकार है:-

  • समाधान शुरू करने वाला पक्ष दूसरे पक्ष को लिखित नोटिस भेजेगा जिसमें संक्षेप में विवाद के विषय का उल्‍लेख होगा और उसे समाधान के लिए आमंत्रित किया जाएगा। समाधान कार्रवाइयां दूसरे पक्ष द्वारा आमंत्रण की स्‍वीकृति के बाद शुरू की जाएंगी। यदि समाधान शुरू करने वाले पक्ष को आमं‍त्रण भेजने की तारीख से 30 दिन के भीतर या निर्धारित अवधि के भीतर उत्तर नहीं मिलता तो वह इसे अस्‍वीकृति मान सकता है और दूसरे पक्ष को यह सूचित कर सकता है। यदि वह समाधान को अस्‍वीकृत कर देता है तो कोई समाधान कार्यवाही नहीं होगी।

  • जब तक अन्‍यथा सहमति न हो, मध्‍यस्‍थ एक ही होगा। तथापि, यदि पक्षकार सहमत हों तो दो या तीन मध्‍यस्‍थ हो सकते हैं जो संयुक्‍त रूप से काम करेंगे। एकमात्र मध्‍यस्‍थ दोनों पक्षों की परस्‍पर सहमति से नियुक्ति किया जाएगा। दो मध्‍यस्‍थों के मामले में, प्रत्‍येक पक्ष एक मध्‍यस्‍थ नियुक्‍त करेगा। तीन मध्‍यस्‍थों के मामले में, प्रत्‍येक पक्ष एक मध्‍यस्‍थ नियुक्‍त करेगा और तीसरा मध्‍यस्‍थ पक्षकारों की परस्‍पर सहमति से नियुक्‍त किया जाएगा जो अध्‍यक्ष मध्‍यस्‍थ होगा। तथापि, पक्षकार इस बात पर सहमत हो सकते हैं कि मध्‍यस्‍थ किसी संस्‍था या व्‍यक्ति द्वारा नियुक्‍त या अनुशंसित किया जाए।

  • प्रत्‍येक पक्ष मध्‍यस्‍थ को एक संक्षिप्‍त लिखित वक्‍तव्‍य प्रस्‍तुत करेगा जिसमें विवाद का सामान्‍य स्‍वरूप और विवादग्रस्‍त मुद्दे शामिल हों। उसकी एक प्रति दूसरे पक्ष को भी भेजी जाएगी। मध्‍यस्‍थ प्रत्‍येक पक्ष से अपेक्षा कर सकता है कि उसे दस्‍तावेजों एवं अन्‍य साक्ष्‍यों द्वारा समर्थित विस्‍तृत विवरण भेजा जाए। मध्‍यस्‍थ को पक्षकार से प्राप्‍त विवाद से जुड़ी कोई तथ्‍यात्‍मक सूचना दूसरे पक्ष को भी बताई जाएगी ताकि उसे स्‍पष्‍टीकरण प्रस्‍तुत करने का मौका दिया जा सके, सिवाय तब जब कोई पक्ष इस शर्त के अध्‍यधीन सूचना देता है कि उसे गोपनीय रखा जाए।

  • संबंधित पक्षकार सद्भाव से मध्‍यस्‍थ के साथ सहयोग करेंगे, लिखित सामग्री प्रस्‍तुत करने, साक्ष्‍य मुहैया कराने एवं बैठक में हाजिर होने के अनुरोधों का पालन करेंगे। कोई भी पक्षकार विवाद के निपटान के लिए मध्‍यस्‍थ को सुझाव दे सकता है।

  • मध्‍यस्‍थ के कार्य इस प्रकार है:-

    • पक्षकारों की उनके विवाद का सदभावपूर्ण निपटान करने के लिए स्‍वतंत्र एवं निष्‍पक्ष तरीके से मदद करना।


    • वस्‍तुपरक, उचित और न्‍यायोचित सिद्धांतों का पालन करना।


    • पक्षकारों के अधिकारों एवं कर्त्तव्‍यों, व्‍यवसाय प्रयोगों, विवाद को परिस्थितियों और पक्षकारों के बीच पूर्ववर्ती कारोबारी पद्धतियों पर विचार करना।


    • मामले की परिस्थितियों और पक्षकारों की इच्‍छाओं को ध्‍यान में रखते हुए उपयुक्‍त विधि से समाधान कार्रवाइयों का संचालन करना।


    • विवाद के निपटान के लिए प्रस्‍ताव रखना।


    • जब तक पक्षकारों द्वारा अन्‍यथा सहमति न हो, उसी विवाद के संबंध में किसी पंचाट या न्‍यायिक कार्रवाई में किसी एक पक्ष के मध्‍यस्‍थ या प्रतिनिधि के रूप में कार्य नहीं करना।


    • किसी पंचाट या न्‍यायिक कार्रवाइयों की साक्षी के रूप में कार्य नहीं करना।

  • यदि मध्‍यस्‍थ को यह प्रतीत होता है कि समझौता संभव है तो वह संभावित समझौते की शर्तों को तैयार करेगा और पक्षकारों के समक्ष उनकी टिप्‍पणियों के लिए प्रस्‍तुत करेगा। इसके बाद पक्षकारों से प्राप्‍त टिप्‍पणियों के आधार पर मध्‍यस्‍थ संभावित समझौते को पुन:तैयार करेगा। यदि पक्षकार समझौते कर लेते हैं तो वे मध्‍यस्‍थ की मदद से एक लिखित करार तैयार और हस्‍ताक्षरित कर सकते हैं। मध्‍यस्‍थ निपटान-करार को अधिप्रमाणित करेगा और उसकी एक-एक प्रति दोनों पक्षों को सौंपेगा। यहि निपटान करार पक्षकारों के लिए अंतिम और बाध्‍यकारी होगा तथा इसका वही प्रभाव होगा जो पंचाट का होता है।

  • समाधान कार्रवाइयां समाप्‍त हो जाएंगी यदि:-

    • पक्षकारों ने निपटान करार पर हस्‍ताक्षर कर दिए हों,


    • पक्षकारों के साथ परामर्श करके मध्‍यस्‍थों ने यह लिखित घोषणा की हो कि समाधान के लिए और प्रयास किए जाने का औचित्‍य नहीं है,


    • पक्षकारों द्वारा कार्रवाइयों के खर्च से संबंधित जमाराशियां प्राप्‍त न होने पर मध्‍यस्‍थ द्वारा लिखित घोषणा की गई हो कि कार्रवाइयां समाप्‍त कर दी गई हैं,


    • पक्षकारों द्वारा मध्‍यस्‍थ के समक्ष लिखित घोषणा की गई हो कि समाधान कार्रवाइयां समाप्‍त कर दी गई हैं,


    • एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को और मध्‍यस्‍थ को लिखित घोषणा भेजी गई हो कि समाधान कार्रवाइयां समाप्‍त कर दी गई है।


''विदेशी पंचाट'' का अर्थ है विधिक संबंधों, भले ही संविदात्‍मक हो या न हों, और जिन्‍हें भारत में प्रवृत्त कानून के अनुसार वाणिज्यिक माना गया हो, से व्‍यक्तियों के बीच उभरे मतभेदों के संबंध में पंचाट जो अधिसूचित दूसरे देश के भू-भाग में न्‍यूयॉर्क समझौते या जेनेवा समझौते द्वारा शासित किए जाने के लिए विवाचन हेतु लिखित करार के अनुसरण में किया गया हो। अधिनियम में विदेशी पंचाट से संबंधित कुछ उपबंध निम्‍नानुसार हैं :-

  • यदि कोई वाणिज्यिक विवाद जो ऐसे विवाचन करार, जिस पर कोई एक अभिसमय लागू होता है, भारत में न्‍यायिक प्राधिकरण के समक्ष उभरता है तो इसे पक्षकार के अनुरोध पर विवाचन को सौंपा जाएगा।


  • विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए आवेदन करने वाला पक्षकार यह प्रमाणित करने के लिए कि वह पंचाट विदेशी पंचाट है, मूल पंचाट अथवा उसकी विधिवत अधिप्रमाणित प्रति, मूल विवाचन करार या उसकी अधिप्रमाणित प्रति और साक्ष्‍य प्रस्‍तुत करेगा।


  • यदि न्‍यायालय इस बात से सन्‍तुष्‍ट है कि विदेशी पंचाट प्रवर्तनीय है, तो यह पंचाट न्‍यायालय का निर्णय माना जाएगा। पक्षकारों को विवाचन को सौंपने से इंकार अथवा विदेशी पंचाट का प्रवर्तन करने से इंकार की अपील न्‍यायालय के आदेश के विरुद्ध होगी।


  • अधिनियम के अंतर्गत प्रवर्तनीय कोई भी विदेशी पंचाट बाध्‍यकारी होगा और पक्षकारों द्वारा भारत में किन्‍हीं कानूनी कार्रवाइयों में प्रतिवाद, स्‍पष्‍टीकरण या अन्‍यथा किसी स्थिति में विश्‍वास योग्‍य होगा।
 

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विवाचन के क्षेत्र में नवीनतम घटनाक्रम
विधि एवं न्‍याय मंत्रालय
विवाचन और समाधान अधिनियम, 1996
 
 
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