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मुख्‍य विनियम:
प्रतिस्‍पर्धा संरक्षण
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भारत में प्रतिस्‍पर्धा को शासित करने वाला मुख्‍य कानून है प्रतिस्‍पर्धा अधिनियम, 2002 जिसने एकाधिकार और अवरोधक व्‍यापार व्‍यवहार (एमआरटीपी) अधिनियम, 1969 को निरस्‍त किया और प्रतिस्‍पर्धा संरक्षण की आधुनिक संरचना की व्‍यवस्‍था की। इस अधिनियम के मुख्‍य उद्देश्‍य इस प्रकार हैं:- (i) प्रतिस्‍पर्धा पर प्रतिकूल असल डालने वाले व्‍यवहार को रोकने के लिए आयोग की स्‍थापना का प्रावधान; (ii) भारत में बाज़ारों में प्रतिस्‍पर्धा का संवर्धन करना एवं बनाए रखना ; (iii) उपभोक्‍ताओं के हितों की रक्षा करना; (iv) भारत में बाज़ारों में प्रतिभागियों द्वारा किए जा रहे व्‍यापार की स्‍वतंत्रता सुनिश्चित करना और संबंधित मामलों के लिए।

प्रतिस्‍पर्धा का अर्थ बाज़ार की एक स्थिति से है जिसमें विक्रेता लाभ, बिक्री या बाज़ार के हिस्‍से संबंधी कारोबारी उद्देश्‍यों को हासिल करने के लिए खरीदार का संरक्षण प्राप्‍त करने के लिए स्‍वतंत्र रूप से प्रयास करता है। दूसरे शब्‍दों में, यह बाज़ार में प्रभुत्‍व प्राप्‍त करने या प्रतिफल अथवा लक्ष्‍य हासिल करने के लिए एक उद्यम द्वारा दूसरे व्‍यापारिक उद्यम के विरुद्ध प्रतिस्‍पर्धा करने का रूप है। यही वह बुनियाद है जिस पर बाज़ार व्‍यवस्‍था काम करती है। बाज़ार अर्थव्‍यवस्‍था कारगार ढंग से काम करे, इसके लिए इस प्रतिस्‍पर्धा को मुक्‍त और निष्‍पक्ष होना होगा। ऐसी प्रतिस्‍पर्धा नवीन परिवर्तनों एवं उत्‍पादकता को प्रेरित करती है और इस तरह अर्थव्‍यवस्‍था के संसाधनों के इष्‍टतम आबंटन की ओर ले जाती है; उपभोक्‍ताओं के हितों की सुरक्षा की गारंटी देती है; लागत कम करती है एवं गुणवत्ता में सुधार लाती है; वृद्धि और विकास में तेज़ लाती है तथा आर्थिक एवं राजनीतिक लोकतंत्र को सुरक्षित रखती है।

पर्याप्‍त रक्षोपायों के अभाव में, कई उद्यम अपने अल्‍पकालिक लाभों के लिए अनुचित व्‍यवहार अपनाकर बाज़ार को कमज़ोर बना देते हैं। परिणामस्‍वरूप बाज़ार को विकृत करने वाले व्‍यवहार और प्रतिस्‍पर्धा-रोधी शक्तियां अर्थव्‍यवस्‍था में लाभप्रद प्रतिस्‍पर्धा के कार्यकरण में बाधा डालती हैं। इसलिए एक उपयुक्‍त विनियामक माहौल बनाने की ज़रूरत उठती है जो लाभप्रद प्रतिस्‍पर्धा सुनिश्चित कर सके ताकि सभी कारोबारी उद्यम विकास और विस्‍तार कर सकें और देश के आर्थिक विकास को प्रेरित कर सकें। तदनुसार, सरकार ने एक प्रतिस्‍पर्धा नीति बनाई है जो निष्‍पक्ष प्रतिस्‍पर्धा को बढ़ावा देकर एवं स्‍थायित्‍व प्रदान कर उपभोक्‍ताओं और उत्‍पादकों के हितों की रक्षा करती है। प्रतिस्‍पर्धा नीति के प्रावधानों के अनुसार, भारत सरकार ने प्रतिस्‍पर्धा अधिनियम अधिनियमित किया है।

इस अधिनियम के तहत, भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग (सीसीआई) नामक एक स्‍वायत्त निकाय गठित किया गया है जिसे विनियामक और अर्ध-न्‍यायिक शक्तियां प्राप्‍त है। इस आयोग के पदाधिकारियों की क्षमता को निर्मित करने एवं मज़बूत करने के लिए भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग ने एक प्रतिस्‍पर्धा मंच स्‍थापित किया है जिसमें कानून, अर्थशास्‍त्र, वित्त, लोक प्रशासन, प्रबंधन और अन्‍य क्षेत्रों से, जैसा भी उपयुक्‍त समझा जाए, प्रतिष्ठित व्‍यक्ति शामिल किए गए हैं।

अधिनियम के मुख्‍य प्रावधान निम्‍नानुसार है:-

  • केन्‍द्र सरकार अधिसूचना के ज़रिए ''भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग'' नामक आयोग स्‍थापित कर सकती है। आयोग का यह कर्त्तव्‍य होगा कि वह ऐसे व्‍यवहारों को समाप्‍त करे जिनका प्रतिस्‍पर्धा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, प्रतिस्‍पर्धा को बढ़ावा दे एवं स्‍थायित्‍व प्रदान करे, उपभोक्‍ताओं के हितों की रक्षा करे और भारत के बाज़ारों में अन्‍य प्रतिभागियों द्वारा किए जा रहे व्‍यापार की स्‍वतंत्रता सुनिश्चित करे।


  • अधिनियम प्रतिस्‍पर्धा-रोधी करारों को निषिद्ध करता है। यह किसी उच्‍च या उद्यमों के संघ द्वारा ऐसे किसी भी करार को निरस्‍त करता है जो वस्‍तुओं के उत्‍पादन, आपूर्ति, वितरण, अधिग्रहण या नियंत्रण अथवा सेवाओं की व्‍यवस्‍था में रोक लगाए। यह अनुप्रस्‍थ और ऊर्ध्‍वस्‍थ करारों को अर्थव्‍यवस्‍था में प्रतिस्‍पर्धा बाधित करने की क्षमता वाले करारों के रूप में स्‍वीकारता है।

अनुप्रस्‍थ करार उन उद्यमों के बीच निष्‍पादित करार होते हैं जो उत्‍पादन, सेवाओं इत्‍यादि के समान स्‍तर पर होते हैं। इसमें कपटपूर्ण करार शामिल होते हैं जो :-

  • प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खरीद या बिक्री मूल्य निर्धारित करते हैं;
  • उत्पादन, आपूर्ति, बाज़ारों, तकनीकी विकास, निवेश या सेवाओं की व्‍यवस्‍था को सीमित या नियंत्रित करते हैं;
  • बाज़ार के भौगोलिक क्षेत्र के आबंटन अथवा माल या सेवाओं की किस्म या बाज़ार में उपभोक्‍ताओं की संख्‍या या ऐसे ही किसी तरीके से बाज़ार या उत्‍पादन के स्रोत या सेवाओं की व्‍यवस्‍था में हिस्‍सा लेता हो;
  • प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बोली में हेराफेरी या कपटपूर्ण बोली में परिणति होती हो।

ऊर्ध्‍वस्‍थ करार ऐसे उद्यमों के बीच ऐसे करार होते हैं जो उत्‍पादन, विवरण इत्‍यादि के विभिन्‍न चरणों पर होते हैं। इनमें निम्‍नलिखित शामिल हैं:-

  • सहबद्धता करार;
  • विशिष्ट आपूर्ति करार;
  • विशिष्ट वितरण करार;
  • व्यापार करने से इंकार;
  • पुन:बिक्री मूल्य संपोषण;
  • इस अधिनियम में किसी भी उद्यम द्वारा
  • प्रभुत्‍व की स्थिति का दुरुपयोग निषिद्ध किया गया है। प्रभुत्‍व की स्थि‍ति का अर्थ है भारत में संबंधित संगत बाज़ार में किसी उद्यम को प्राप्‍त शक्तिशाली स्थिति। ऐसी स्थिति से फर्म:- (i) संबंधित बाज़ार में प्रचलित प्रतिस्‍पर्धी ताकतों से स्‍वतंत्र रहकर कार्य कर सकती है; अथवा (ii) अपने प्रतिस्‍पर्धियों या उपभोक्‍ताओं या संबंधित बाज़ार को अपने पक्ष में प्रभावित कर सकती है।

इस अधिनियम के अनुसार, किसी उद्यम द्वारा प्रभुत्‍वशाली स्थिति के दुरुपयोग में निम्‍नलिखित व्‍यवहार शामिल होंगे :-

  • माल एवं सेवाओं की खरीद या बिक्री पर प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से अनुचित या भेदभावपूर्ण शर्तें लगाना;
  • उपभोक्ता के हितों के प्रतिकूल माल या सेवाओं से संबंधित तकनीकी या वैज्ञानिक विकास में बाधा पहुंचाना;
  • बाज़ार तक पहुंच को रोकने वाले व्‍यवहार अपनाना;
  • संविदा-निष्‍पादन पर अन्‍य पक्षकारों द्वारा स्‍वीकृत किए जाने की शर्त लगाना, जिनका ऐसी संविदाओं के विषय से कोई संबंध न हो;
  • संबंधित बाज़ार में प्रभुत्‍वशाली स्थिति को दूसरे बाज़ार में प्रवेश करने के लिए उपयोग करना।
  • यह अधिनियम कारोबारी संगठनों के विभिन्‍न रूपों को विनियमित करता है और उनके निर्माण पर प्रतिबंध नहीं लगाता। इसके अंतर्गत, कोई व्‍यक्ति या उद्यम अधिग्रहण, विलयन या समामेलन के रूप में ऐसा संगठन नहीं बनाएगा जिससे संबंधित बाज़ार में प्रतिस्‍पर्धा पर बड़ा प्रभाव पड़ा हो या पड़ने की संभावना हो ओर ऐसा या पड़ने की संभावना हो और ऐसा संगठन अमान्‍य हो जाएगा। लेकिन सभी संगठनें के लिए संवीक्षा की ज़रूरत नहीं होती जब तक कि परिणामी संगठन भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग (सीसीआई) द्वारा विनिर्दिष्‍ट परिसम्‍पत्तियों या कुल कारोबार के संदर्भ में आरंभिक सीमाएं पार न कर लें। इस तरह, यह अधिनियम संगठनों को नहीं बल्कि उनके हानिकर प्रभावों को समाप्‍त करने का प्रयास करता है।


  • यदि कोई व्‍यक्ति आयोग के किसी आदेश या किसी शर्त अथवा प्रतिबंध का, जिसके अध्‍यधीन इस अधिनियम के तहत किसी मामले से संबंधित कोई अनुमोदन, मंजूरी, निदेशन या छूट दी गई हो, या इस अधिनियम के अधीन किसी दण्‍ड का भुगतान नहीं करता है तो वह सिविल कारावास में दण्‍ड का भागी हो सकता है।

^ ऊपर

प्रतिस्‍पर्धा अधिनियम, 2002
भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग द्वारा अक्‍सर पूछे जाने वाले प्रश्‍न
 
 
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