| कुछ वर्षों से, लोगों में यह जागरूकता पैदा हो रही है और वे यह अधिकाधिक महसूस कर रहे हैं कि पर्यावरणीय गुणवत्ता और आर्थिक विकास एक दूसरे के पूरक है न कि एक दूसरे से अलग। ऐसा इसलिए है कि प्रौद्योगिकीय प्रगति के साथ-साथ पर्यावरण संबंधी चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। इसके परिणाम स्वरूप, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और स्थायी उपयोग के लिए हमारी सामाजिक एवं विकास संबंधी प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए औ़द्योगिक और कृषि उत्पादन के पैटर्न, उपयोगी सेवाओं, उपभोक्ता व्यवहार तथा लोगों की जीवन शैली में परिवर्तन लाने की जरूरत है। इसलिए विश्व भर में पर्यावरणीय निकायों द्वारा पर्यावरणीय विनियम और मापदण्ड स्थापित किए गए हैं। भारतीय उद्योग जगत और व्यापार क्षेत्र पर भी इस पर्यावरणीय मापदण्डों एवं विनियमों पर खरा उतरने का अधिकाधिक दबाव पड़ता जा रहा है।
पर्यावरण के महत्व को समझते हुए इसके संरक्षण को सांविधानिक दर्जा दिया गया है। राज्य के नीति निर्देशिक सिद्धांतों में यह कहा गया है कि यह राज्य का कर्त्तव्य है कि ''वह पर्यावरण को सुधारे और देश के वनों एवं वन्य जीवन का संरक्षण करे। प्रत्येक नागरिक का भी यह मूल कर्त्तव्य है कि वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण एवं सुधार करे।
भारत में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एमओईएफ) इन कार्यों के लिए शीर्ष प्रशासनिक निकाय है, जिनमें :- (i) पर्यावरणीय संरक्षण को विनियमित एवं सुनिश्चित करना; (ii) देश में पर्यावरणीय नीति की संरचना तैयार करना; (iii) वनस्पति, वनों एवं वन्य जीवन का संरक्षण एवं सर्वेक्षण करना; और (iv) पर्यावरणीय एवं वानिकी कार्यक्रमों के कार्यान्वयन का योजना निर्माण, संवर्धन, कार्यक्रम (यूएनईपी) के लिए देश में केन्द्रक अभिकरण भी है। इन सभी उद्देश्यों को पूरा करने में मदद करने के लिए मंत्रालय के संगठनात्मक ढांचे में अनेक प्रभाग, निदेशालय, बोर्ड, अधीनस्थ कार्यालय, स्वायत्त संस्थाएं, और सरकारी क्षेत्र के उपक्रम शामिल हैं।
इसके अलावा, औद्योगिक प्रदूषण को रोकने एवं नियंत्रित करने की जिम्मेदारी राष्ट्रीय स्तर पर मुख्यतया केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा कार्यान्वित की जाती है जो पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के साथ संबद्ध एक सांविधिक प्राधिकरण है। राज्य पर्यावरण विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड राज्य स्तर पर इस कार्य को करने वाली विनिर्दिष्ट एजेंसियां हैं।
केन्द्र सरकार ने पर्यावरणीय सरंक्षण के लिए अनेक कानून अधिनियमित किए हैं। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 एक ऐसा व्यपक कानून है जो केन्द्र सरकार को पर्यावरण का स्तर ठीक रखने एवं उसमें सुधार करने, सभी स्रोतों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने एवं घटाने और किसी औद्योगिक केन्द्र की स्थापना और/अथवा प्रचालन को पर्यावरणीय आधार पर प्रतिबंधित करने एवं रोकने के लिए प्राधिकृत करता है। इस अधिनियम के अनुसार ''पर्यावरण'' में शामिल हैं जल, वायु और भूमि और वह अन्त: संबंध जो भूमि, वायु और भूमि, तथा मनुष्य, अन्य जीव जन्तुओं, पौधों, सूक्ष्म जीवों और सम्पदा में पाया जाता है।
इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान हैं :-
- केन्द्र सरकार के पास ऐसे सभी उपाय पर्यावरण के संरक्षण और उसकी गुणवत्ता में सुधार लाने तथा पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने, नियंत्रित करने या उपशमन करने के लिए जो वह आवश्यक या अनिवार्य समझती है, करने की शक्तियां होगी।
- कोई उद्योग, प्रचालन या प्रक्रिया चला रहा कोई व्यक्ति, यथा निर्धारित मानदंडों से अधिक पर्यावरणीय संदूषण उत्सर्जित या छोड़ेगा नहीं या न ही ऐसा करने की अनुमति देगा।
- यदि किसी पर्यावरणीय संदूषक का उत्सर्जन निर्धारित मानदंडों से अधिक हुआ है या किसी दुर्घटना या किसी अप्रत्याशित कार्य या घटना के कारण होने की आशंका हो, ऐसे उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार व्यक्ति अथवा उस स्थान का प्रभारी जहां ऐसा उत्सर्जन हुआ है या होने की आशंका हो, ऐसे उत्सर्जन के परिणाम स्वरूप होने वाले पर्यावरणीय प्रदूषण को रोकने या उसे शामिल करने के लिए बाध्य होगा और उसे तत्काल ऐसे उत्सर्जन या उत्सर्जन की आशंका के तथ्य सूचित करना होगा; और यदि उससे कहा जाए तो ऐसे प्राधिकरणों या एजेंसियों द्वारा यथानिर्धारित समस्त सहायता भी मुहैया कराने के लिए वह बाध्य होगा।
- कोई भी व्यक्ति किसी खतरनाक पदार्थ को हाथ नहीं लगाएगा, न ही किसी और को हाथ लगाने देना सिवाय तब जब ऐसा प्रक्रियाओं के अनुसार किया जाए और यथा निर्धारित ऐसे रक्षोपायों का पालन का पालन किया जाए।
- केन्द्र सरकार या इस संबंध में अधिकार प्राप्त किसी अधिकारी को किसी फैक्टरी, परिसर या किसी अन्य स्थान से यथा निर्धारित विधि से वायु, जल, मिट्टी या किसी अन्य पदार्थ का नमूना विश्लेषण के प्रयोजनार्थ लेने का अधिकार होगा।
- केन्द्र सरकार सरकारी राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित करके एक या अधिक पर्यावरणीय प्रयोगशालाएं स्थापित कर सकती है; और इस अधिनियम के तहत पर्यावरणीय प्रयोगशाला को सौंपे गए कार्य करने के लिए पर्यावरणीय प्रयोगशालाओं के रूप में एक या अधिक प्रयोगशालाओं या संस्थानों को मान्यता प्रदान कर सकती हैं।
- इस अधिनियम के प्रावधानों या उनके तहत बनाए गए नियमों या जारी किए गए आदेशों या निर्देशों को अनुपालन न करने या उनका उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को ऐसा अनुपालन न करने या उल्लंघन करने पर, कारावास या जुर्माना या दोनों सजाएं हो सकती हैं।
अन्य महत्वपूर्ण पर्यावरणीय कानून निम्नानुसार वर्गीकृत किए जा सकते हैं :-
कानूनी प्रावधानों की अनुपूर्ति करने के लिए एक व्यापक नीतिगत संरचना भी तैयार की गई है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है राष्ट्रीय पर्यावरण नीति - 2006। यह नीति संविधान में अधिदेशित स्वच्छ पर्यावरण के प्रति हमारी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता की प्रतिक्रिया स्वरूप हैं। इसमें सभी विकास कार्यों में पर्यावरणीय सरोकारों को जोड़ने का आशय व्यक्त किया गया है। इसमें संक्षेप में इस समय और भविष्य में सामने आने वाली मुख्य पर्यावरणीय चुनौतियों, नीति के उद्देश्य, नीतिगत कार्रवाई के मूल में निहित बुनियादी सिद्धांतों, अनुकूल कार्यों को पूरा करने के लिए जरूरत कानूनी और संस्थागत विकास के मुख्य संकेतक, कार्यान्वयन एवं समीक्षा के लिए तंत्रों का वर्णन किया गया है। इसमें विभिन्न हितधारकों नामत: सरकारी एजेंसियों, स्थानीय समुदायों, शैक्षिक और वैज्ञानिक संस्थाओं, निवेश समुदायों और अंतरराष्ट्रीय विकास भागीदारों की पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए अपने संसाधन एवं शक्तियों का लाभ उठाने के लिए सहभागिता को प्रेरित करने का भी प्रयास किया गया है।
साथ ही, क्षेत्र विशिष्ट अनेक नीतियां भी बनाई गई है, जिसमें प्रमुख निम्नानुसार है :-
साथ ही, पर्यावरणीय सूचना संग्रहण, मिलान, भण्डारण, सूचना प्राप्ति और विभिन्न प्रयोक्ताओं को सूचना देने के लिए एक योजना कार्यक्रम एवं व्यापक नेटवर्क के रूप में पर्यावरणीय सूचना प्रणाली (ईएनवीआईएस-इनविस) स्थापित की गई है। एनविस की स्थापना से ही इसका मुख्य बल देश भर में निर्णय लेने वालों, नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों, अनुसंधान कर्मियों इत्यादि को पर्यावरणीय सूचना मुहैया कराने पर रहा है। एनविस ने सहभागी संस्थाओं/संगठनों का स्वयं एक नेटवर्क स्थापित किया है। एनविस केन्द्र के रूप में ज्ञात नोडों की बड़ी संख्या इस नेटवर्क में स्थापित की गई है ताकि पर्यावरण के मुख्य विषय को कवर किया जा सके जहां मुख्य केन्द्र बिन्दु पर्यावरण और वन मंत्रालय में होगा। ये केन्द्र प्रदूषण नियंत्रण, विषैले रसायनों, केन्द्रीय एवं अपतटीय पारिस्थितिकी, पर्यावरणीय दृष्टि से मजबूत एवं उपयुक्त प्रौद्योगिकी, अपशिष्ट पदार्थों का जैव अपरदन तथा पर्यावरण प्रबंधन इत्यादि के क्षेत्र में स्थापित किए गए हैं।
एनविस केन्द्रों और नोडों की जिम्मेदारी निम्नानुसार है :-
- सभी सूचना स्रोतों से सम्पर्क स्थापित करना और सौंपे गए चुनिन्दा विषय क्षेत्र पर डाटा बैंक का सृजन।
- सूचना अंतरालों की पहचान
- सूचना एवं बुलेटिन प्रकाशित
- पुस्तकालय सुविधा विकसित करना और विषय क्षेत्र के केन्द्र बिन्दु को सहायता प्रदान करना।.
- सौंपे गए विषय पर प्रयोक्ताओं के लिए इंटरफेस के रूप में कार्य करना।
पर्यावरणीय मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और करार
भारत ने अनेक बहुपक्षीय पर्यावरण करारों और समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वहनीय विकास प्रभाग (आईसी एण्ड एसडी) पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में समस्त अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सहयोग और वहनीय विकास के मुद्दों में समन्वय लाने वाला केन्द्रक बिन्दु है। यह संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनएमपी), नैरोबी; दक्षिण एशिया सहकारी पर्यावरण कार्यक्रम (एसएसीईपी), कोलम्बो के लिए भी केन्द्रक प्रभाग है। यह प्रभाग द्विपक्षीय मुद्दों तथा अनेक द्विपक्षीय निकायों से संबंधित मामलों का कार्य भी देखता है जो इस प्रकार हैं, वहनीय विकास आयोग; देशगत सहयोग संरचना-1 के अंतर्गत यूएनडीपी का पर्यावरण सहायता कार्यक्रम; वैश्विक पर्यावरण सुविधा (जीईएफ) और क्षेत्रीय निकाय जैसे एशिया एवं प्रशांत क्षेत्र के लिए आर्थिक और सामाजिक आयोग (एस्कैप); दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क); यूरोपीय यूनियन (ईयू) और भारत, कनाडा, पर्यावरण, सुविधा/मुख्य करार और समझौते निम्नानुसार हैं :-
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