आयात और निर्यात एक विदेशी व्यापार के दो प्रमुख महत्वपूर्ण घटक हैं। विदेशी व्यापार दो देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान है जो उनकी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार होता है। आयात का अर्थ है एक कानूनी तरीके से किसी देश से एक देश में वस्तुओं का भौतिक रूप से आगमन। यह उन वस्तुओं के प्रति संदर्भित है जिनका उत्पादन विदेशी उत्पादकों द्वारा विदेश में किया गया और अब घरेलू उपभोक्ताओं की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए घरेलू अर्थव्यवस्था में उपयोग किया जा रहा है। इसी प्रकार निर्यात का अर्थ है एक कानूनी तरीके से देश से बाहर वस्तुओं का भौतिक गमन यह उन वस्तुओं के प्रति संदर्भित है जिनका उत्पादन एक देश में घरेलू रूप से किया जाता है और जिन्हें विदेशों में उपभोक्ताओं की जरूरतें पूरी करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इस प्रकार आयात और निर्यात ने विश्व को एक स्थानीय बाजार बना दिया है। एक देश जो वस्तु को खरीदता है उसे आयातक देश कहते हैं तथा बेचने वाले देश को निर्यातक देश कहा जाता है। उक्त लेन-देन में शामिल व्यापारी क्रमश- आयातक और निर्यातक कहलाते हैं।
भारत में निर्यात और आयात में विदेश व्यापार (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1992 द्वारा विनियमित होते हैं जो आयात और निर्यात (नियंत्रण) अधिनियम,1947 को प्रतिस्थापित किया हैं और भारत सरकार को इसे नियंत्रित करने के लिए अपार शक्ति प्रदान किया हैं। अधिनियम की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं :-
- इसने केन्द्र सरकार को आयात सुकर बनाने द्वारा और भारत से निर्यात बढ़ाने और इससे संबंधित एवं होने वाले सभी मामलों द्वारा विदेश व्यापार के विकास और विनियमन के लिए प्रावधान करने की शक्ति प्रदान की हैं।
- केन्द्र सरकार सभी या कुछ विशिष्ट मामलों में निर्यात और आयात प्रतिसिद्ध प्रतिबंधित और विनियमित कर सकती हैं और उनमें छूट दे सकती हैं।
- यह केन्द्र सरकार को निर्यात और आयात नीति (एक्जिम) नीति का निर्माण और घोषणा करने के लिए प्राधिकृत करता हैं और शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा समय-समय पर संशोधन करने के लिए भी प्राधिकृत करता हैं।
- यह अधिनियम के प्रयोजन के लिए केन्द्र सरकार द्वारा विदेश व्यापार महानिदेशक की नियुक्ति की व्यवस्था करता हैं। वह केन्द्र सरकार को निर्यात और आयात नीति का निर्माण करने और नीति को कार्यान्वित करने में सलाह देगा।
- अधिनियम के तहत प्रत्येक आयातक और निर्यातक को विदेश व्यापार महानिदेशक या इसके लिए प्राधिकृत अधिकारी से आयातक निर्यातक कोड संख्या (आईईसी) प्राप्त करना आवश्यक हैं।
- महानिदेशक या इसके लिए प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी अधिनियम के अनुसार माल निर्यात या आयात करने के लिए जारी किए गए लाइसेंस को निलंबित या निरस्त कर सकता हैं। परंतु वह लाइसेंस धारक को सुनवाई का समुचित समय देने के पश्चात ऐसा करता हैं।
- अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार भारत सरकार निर्यात और आयात (एक्जिम) नीति बनाती और इसकी घोषणा करती हैं और समय-समय पर इसमें संशोधन करती हैं। एक्जिम नीति का अभिप्राय: वैसी नीतिगत उपायों से हैं जो इसके निर्यात और आयात के संदर्भ में देश के द्वारा अपनाई जाती हैं। ऐसी नीति भारत जैसे देश में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती हैं। नीति के मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं :-
- देश के निर्यात में स्थायी वृद्धि सुकर बनाना ताकि वैश्विक पण्यवस्तुओं के शेयर में अधिक प्रतिशत हासिल किया जा सके।
- घरेलू उपभोक्ताओं को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी कीमत पर अच्छी गुणवत्ता की वस्तुएं और सेवाएं प्रदान करना और घरेलू उत्पादकों के लिए समस्तरीय कार्य क्षेत्र का सृजन करना हैं।
- अनिवार्य कच्ची सामग्री, मध्यस्थता, संघटक, उपभोज्य और पूंजी सामान जिनकी आवश्यकता उत्पादन बढ़ाने और सेवा प्रदान करने के लिए होती हैं, को मुहैया कराने द्वारा स्थायी आर्थिक विकास को अभिप्रेरित करना।
- प्रौद्योगिक क्षमता बढ़ाना और भारतीय कृषि उद्योग और सेवाओं की क्षमता में विकास करना तथा इसके द्वारा वैश्विक बाजारों की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए उसकी प्रतिस्पर्धा में सुधार लाना।
- नए रोजगार के अवसरों का सृजन करना और अंतरराष्ट्रीय रूप से स्वीकार्य गुणवत्ता मानक हासिल करने के लिए प्रोत्साहन देना।
इस अधिनियम के अतिरिक्त कुछ अन्य कानून हैं जो सामानों के निर्यात और आयातों को नियंत्रित करते हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं :-
केन्द्रीय स्तर पर वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय एक महत्वपूर्ण संगठन हैं जिसका संबंध भारत में विदेश व्यापार के संवर्धन और विनियमन से हैं। मंत्रालय के पास व्यापार के विभिन्न पहलुओं की देखरेख करने के लिए विस्तृत संगठनात्मक ढांचा हैं। मंत्रालय के भीतर वाणिज्य विभाग विदेश व्यापार नीति बनाने और क्रियान्वित करने के लिए जिम्मेदार हैं। विभाग को बहुपक्षीय और द्विपक्षीय वाणिज्यिक संबंध, राज्य सरकार, निर्यात संवर्धन के उपाय करने और कुछ निर्यातोन्मुखी उद्योगों और वस्तुओं के विकास और विनियमन का कार्य भी सौंपा गया हैं। विदेश व्यापार से संबंधित मामले विभाग के निम्नलिखित प्रभागों द्वारा निपटाए जाते हैं :-
1. प्रशासनिक और सामान्य प्रभाग
2. वित्त प्रभाग
3. आर्थिक प्रभाग
4. व्यापार नीति प्रभाग
5. विदेश व्यापार क्षेत्रीय प्रभाग
6. आयात उत्पाद प्रभाग
7.निर्यात उद्योग प्रभाग
8. निर्यात सेवा प्रभाग
9. आपूर्ति प्रभाग
विभाग का क्षेत्राधिकार निम्नलिखित में विस्तारित हैं :-
(क) दो सम्बद्ध कार्यालय :-
- विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) :- इसका मुख्यालय नई दिल्ली में हैं इसका अध्यक्ष विदेश व्यापार महानिदेशक होता हैं। यह विदेश व्यापार नीति/एक्जिम नीति का भारतीय निर्यात के संवर्धन के मुख्य उद्देश्य के साथ क्रियान्वित करने के लिए जिम्मेदार हैं। डीजीएफटी निर्यातकों को लाइसेंस भी जारी करता हैं और क्षेत्रीय कार्यालयों के नेटवर्क के जरिए उनकी पत्राचार संबंधी दायित्वों की निगरानी करता हैं। क्षेत्रीय कार्यालय 33 जगहों पर स्थित हैं।
- आपूर्ति और संवितरण महानिदेशालय (डीजीएसएंडडी) :- इसका मुख्यालय नई दिल्ली में हैं, इसका अध्यक्ष महानिदेशक होता हैं। यह आम प्रयोक्ता मदों के लिए भंडार की खरीद, भंडारों का निरीक्षण, नौभरण और आयातित भंडार/कार्गो की निकासी के लिए दर निविदाओं का निष्कर्ष के लिए वाणिज्य विभाग के आपूर्ति प्रभाग का कार्यकारी हाथ हैं। इसके तीन क्षेत्रीय कार्यालय हैं जो चेन्नई, मुंबई और कोलकाता में स्थित हैं।
(ख) पाँच अधीनस्थ कार्यालय :-
- वाणिज्यिक आसूचना और सांख्यिकी महानिदेशालय (डीजीसीआईएंडएस) :- इसका कार्यालय कोलकाता में स्थित हैं इसका प्रमुख महानिदेशक होता हैं। इसे व्यापार सांख्यिकी और विभिन्न प्रकार की सांख्यिकी सूचना का संग्रहण, संकलन और प्रकाशन/एवं प्रचार करने का कार्य सौंपा गया हैं जिनकी आवश्यकता नीति निर्माताओं, अनुसंधानकर्ताओं, निर्यातकों, आयातकों, व्यापारियों तथा प्रवाही क्रेताओं को होती हैं।
- विशेष आर्थिक क्षेत्र के विकास आयुक्त का कार्यालय :- विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) भौगोलिक रूप से विशिष्ट एन्क्लेव हैं जो घरेलू प्रशुल्क क्षेत्रों से अलग हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्र का मुख्य उद्देश्य कुछ सामान्य सुविधाएं प्रदान करना और निर्यातकों के लिए नि:शुल्क वातावरण मुहैया कराना हैं। प्रत्येक जोन का प्रमुख विकास आयुक्त होता हैं और 31 मार्च, 2000 को घोषित विशेष आर्थिक क्षेत्र योजना के अनुसार प्रशासित होता हैं।
- शत्रु संपत्ति अभिरक्षक का कार्यालय (सीईपी) :- यह मुंबई में स्थित हैं जिसका शाखा कार्यालय कोलकाता में हैं। यह कार्यालय शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 के अधीन कार्य कर रहा हैं। सभी अचल (जैसे भूमि, भवन आदि) और चल संपत्तियां (जैसे प्रतिभूतियां, शेयर प्रेषण, बैंक बचत अर्थात नियत जमा और अन्य राशियां जो शत्रु राष्ट्रिक के बैंक खाते में हैं, भविष्य निधि शेष आदि) पूरे भारत में 10;9;1965 और 26;9;1977 की अवधि के बीच पाकिस्तान राष्ट्रिकों की या उनके द्वारा धारित या प्रबंध की जाने वाली संपत्तियां भारत के लिए शत्रु संपत्ति के रक्षक के पास हैं
- वेतन और लेखा कार्यालय (आपूर्ति) :- आपूर्ति प्रभाग का वेतन और लेखाकरण कार्य डीजीएस एंड डी के कार्य सहित मुख्य लेखा नियंत्रक (सीसीए) द्वारा विभागीकृत लेखाकरण प्रणाली के तहत किया जाता हैं। पूरे देश में आपूर्तिकर्ताओं को भुगतान इस संगठन के माध्यम से किया जाता है
(ग) दस स्वायत्तशासी निकाय :-
- कॉफी बोर्ड :- भारतीय कॉफी बोर्ड एक स्वायत्तशासी निकाय हैं, जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कार्य करता हैं। बोर्ड भारत में कॉफी उद्योग के मार्गदर्शक के रूप में कार्य करता हैं। बोर्ड का संकेन्द्रण भारतीय कॉफी के अनुसंधान, विकास, विस्तार, गुणवत्ता उन्नयन, बाजार सूचना और घरेलू और विदेशी संवर्धन की और हैं।
- रबर बोर्ड :- बोर्ड रबर उद्योग के विकास में लगा हुआ हैं। यह वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक अनुसंधान को सहायता करके एवं प्रोत्साहन देकर, रबर उत्पादकों को तकनीकी सलाह देने रोपण एवं उत्पादन में प्रशिक्षण देने के द्वारा किया जाता हैं।
- चाय बोर्ड :- चाय बोर्ड के मुख्य कार्यों में चाय के उत्पादन, विनिर्माण, विपणन के लिए वित्तपोषण और तकनीकी सहायता प्रदान करना, चाय के निर्यात का संवर्धन करना, चाय उत्पादन और चाय की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए और बढ़ाने के लिए अनुसंधान और विकासात्मक क्रियाकलापों की सहायता करना तथा वित्तीय और तकनीकीय रूप से छोटे उत्पादक क्षेत्रकों को प्रोत्साहन एवं सहायता करना हैं।
- तम्बाकू बोर्ड :- भारत सरकार ने तम्बाकू बोर्ड अधिनियम, 1975 के अधीन उत्पादन, विदेशी विपणन के संवर्धन को विनियमित करने और आपूर्ति और मांग के असंतुलन की पुनरावृत्ति रोकने के लिए जो बाजार समस्या खड़ा करता हैं, तम्बाकू निर्यात संवर्धन परिषद की जगह तम्बाकू बोर्ड की स्थापना की हैं। तम्बाकू बोर्ड अधिनियम का लक्ष्य देश में तम्बाकू उद्योग का योजनाबद्ध विकास करना हैं। बोर्ड के क्रियाकलापों में उत्पादन का विनियमन और भारत और विदेशों में मांग के संबंध में वार्जिनिया तम्बाकू की पकाई करना हैं।
- मसाला बोर्ड :- मसाला बोर्ड का गठन 26 फरवरी, 1986 को मसाला बोर्ड अधिनियम, 1986 के तहत किया गया था। यह एक वस्तु बोर्ड हैं जो वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अधीन कार्य करता हैं। यह स्वायत्तशासी निकाय हैं जो अनुसूचित मसालों के निर्यात संवर्धन और उत्पादन या उनमें से कुछ के विकास के लिए जिम्मेदार हैं जैसे इलायची और वनिला।
- निर्यात निरीक्षण परिषद (नि नि प) नई दिल्ली :- निर्यात निरीक्षण परिषद निर्यात के लिए बनाए गए और निर्यात (गुणवत्ता नियंत्रण और निरीक्षण) अधिनियम, 1963 के तहत अधिसूचित विभिन्न्ा वस्तुओं के गुणवत्ता नियंत्रण और अनिवार्य रूप से नौभरण पूर्ण निरीक्षण के प्रवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं।
- भारतीय विदेश व्यापार संस्थान (आईआईएफटी), नई दिल्ली :- निम्नलिखित कार्यकलापों में रत हैं :-
- अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के आधुनिक तकनीक में कार्मिकों का प्रशिक्षण
- विदेश व्यापार की समस्याओं में अनुसंधान का आयोजन
- विपणन अनुसंधान, क्षेत्र सर्वेक्षण, वस्तु सर्वेक्षण, बाजार सर्वेक्षण का आयोजन ।
- अनुसंधान और बाजार अध्ययनों से संबंधित इसके कार्यकलापों से उत्पन्न होने वाली सूचना का प्रचार-प्रसार।
- भारतीय पैकेजिंग संस्थान (आईआईपी), मुंबई :- इसका पंजीकरण सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत किया गया हैं। इस संस्थान का मुख्य लक्ष्य पैकेजिंग उद्योग के लिए कच्ची सामग्री का अनुसंधान करना, पैकेजिंग प्रौद्योगिकी संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन करना और अच्छी पैकेजिंग की आवश्यकता के प्रति जागरूकता बढ़ाना हैं।
- समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए), कोचि :- यह वाणिज्य मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कार्य करता हैं और मत्स्य उत्पादन और संबद्ध कार्यकलापों में लगे हुए विभिन्न केन्द्रीय और राज्य सरकार के प्रतिष्ठानों के बीच समन्वयन एजेंसी के रूप में कार्य करता हैं। प्राधिकरण समुद्री उत्पाद उद्योग के विकास के लिए जिम्मेदार हैं जिसका मुख्य संकेन्द्रण समुद्री निर्यात पर हैं। एमपीईडीए के लिए परिकल्पित भूमिका व्यापक हैं जिसमें सभी प्रकार की मत्स्यिकी, निर्यात बढ़ाना, मानक विनिर्दिष्ट करना, प्रक्रियान्वयन, विपणन, विस्तार, समुद्री उद्योग के विभिन्न पहुलओं में प्रशिक्षण शामिल हैं।
- कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपेडा), नई दिल्ली :- यह 1986 में अस्तित्व में आया जिससे कि यह और अधिक कृषि उत्पाद और प्रसंस्कृत खाद्य का विकास कर सके और उनके निर्यात का संवर्धन किया जा सके। इसका लक्ष्य वर्धित कृषि वस्तु के निर्यात के जरिए विदेशी मुद्रा अर्जन को बढ़ाना उच्चतर यूनिट मूल्य वसूली के जरिए किसानों को बेहतर आय मुहैया करना और फार्म उत्पादों का मूल्य वर्धित निर्यात को प्रोत्साहित करने के द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का सृजन करना हैं।
(घ) निर्यात संवर्धन परिषद (ईपीसी) :-
वर्तमान में वाणिज्य मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रणाधीन बारह ईपीसी हैं। इन परिषदों का पंजीकरण कंपनी अधिनियम के तहत गैर-लाभकारी संगठनों के रूप में किया गया हैं। परिषद परामर्शी और कार्यकारी दोनों कार्य करती हैं। यह परिषद पंजीकृत निर्यातकों के लिए आयात नीति के तहत पंजीकरण प्राधिकरण भी हैं।
(ड.) अन्य संगठन
- भारतीय निर्यात संगठन संघ (एफआईईओ) :- यह विभिन्न निर्यात संवर्धन संगठनों और संस्थाओं का एक शीर्ष निकाय हैं इसके मुख्य क्षेत्रीय कार्यालय दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता में हैं। यह भारत के वैश्विक निर्यात प्रयास के तत्व, निदेशन और बल प्रदान करता हैं।
- भारतीय मध्यस्थम परिषद (आईसीए), नई दिल्ली :- इसकी स्थापना सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत की गई हैं और यह वाणिज्यिक विवादों के निपटान के लिए मध्यस्थम के रूप में कार्य करता हैं और कारोबारियों के बीच मध्यस्थता के अवबोधन को लोकप्रिय बनाता हैं विशेषकर वे जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में लगे हुए हैं।
- भारतीय हीरा संस्थान (आईडीआई), सूरत :- भारतीय जेवरातों की गुणवत्ता, डिजाइन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय हीरा संस्थान की स्थापना जेमोलॉजी और जेवरात विनिर्माण के क्षेत्र में जेम्स और जेवरात उद्योग के लिए तकनीकी कौशल संबंधी प्रधान संस्थान के रूप में की गई हैं।
(च) परामर्शी निकाय :-
- व्यापार बोर्ड (बीओटी) :- इसका गठन 5 मई, 1989 को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में मुख्य विकास के संबंध में व्यापार और उद्योग के साथ लगातार बातचीत करना जारी रखने के लिए प्रभावी प्रक्रम प्रदान करने की दृष्टि से किया गया था।
- निर्यात संवर्धन बोर्ड (ईपीबी) :- निर्यात का विकास बढ़ाने के लिए संबंधित मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वयन के जरिए नीति और मूल संरचनात्मक सहायता प्रदान करता हैं।
- डम्पिंग और संबद्ध कर्त्तव्य महानिदेशालय (डीजीएडी) :- यह महानिदेशालय जांच-पड़ताल करने तथा जहां आवश्यक हो सीमाशुल्क अधिनियम के तहत उन अभिचिन्हांकित मदों पर डम्पिंग शुल्क/प्रतिकारी शुल्क की राशि की सिफारिश करने के लिए उत्तरदायी हैं जो घरेलू उद्योग को हानि पहुंचाने से रोकने में पर्याप्त होगी।
(छ) सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम :-
निम्नलिखित व्यापार/सेवा निगम वाणिज्य विभाग के प्रशासनात्मक नियंत्रण के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं :-
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