कानूनी पहलू किसी भी देश में सफल व्यवसाय माहौल के लिए अपरिहार्य अंग हैं। वे देश की नीतिगत रचना और देश की सरकारी रूपरेखा के मनोभाव के द्योतक हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक कम्पनी देश की सांविधिक रचना के अनुसार कार्य करती है। प्रत्येक उद्यम को कम्पनी के मूल लक्ष्य और उद्देश्य तैयार करते समय इस कानूनी पहलू को ध्यान में रखना है। यह इसलिए क्योंकि यह संगठन के सक्षम और स्वास्थ्य संचालन के लिए अनिवार्य है और यह इसे आगे सामना करने वाले अधिकारों, उत्तरदायित्वों तथा चुनौतियों के बारे में जानने में सहायता करता है।
भारत में कम्पनी संबंधी सभी पहलुओं को विनियमित करने वाला अति महत्वपूर्ण कानून, कम्पनी अधिनियम, 1956 है। इसमें कम्पनी के गठन, निदेशकों और प्रबंधकों के अधिकार और उनकी जिम्मेदारियों, पूंजी जुटाना, कम्पनी की बैठक आयोजित करना, कम्पनी के पत्रों का रखरखाव और लेखापरीक्षा, कम्पनी के कार्यों का निरीक्षण और जांच करने का अधिकार, कम्पनी का पुनर्गठन और समामेलन और यहां तक कि कम्पनी को बंद करने संबंधी प्रावधान सन्निहित है।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 एक अन्य विधान है जो कम्पनी के सभी संव्यवहारों को विनियमित करता है। यह संविदाओं के निर्माण एवं प्रवर्तन क्षमता संबंधी सामान्य सिद्धांतों, करार और प्रदाय के प्रावधानों को शासित करने वाले नियमों विभिन्न प्रकार की संविदा जिनमें क्षतिपूर्ति और गारंटी, जमानत और शपथ एवं एजेंसी के सामान्य सिद्धांतों का निर्धारण करता है।
अन्य मुख्य विधान हैं :- उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951; व्यापार संघ अधिनियम, प्रतिस्पर्द्धा अधिनियम, 2002; विवाचन निर्णय और समझौता अधिनियम, 1996; विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), 1999; बौद्धिक सम्पत्ति अधिकार से संबंधित कानून तथा श्रम कल्याण से संबंधित कानून।
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