देश में उद्योगों के नियंत्रण के लिए भारत में भारत सरकार द्वारा कई अधिनियम और विधान बनाए गए है। ये अधिनियम देश की समुचित प्रगति और आर्थिक विकास में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। बदलती हुई परिस्थितियों और परिवेश के अनुरूप विधानों में समय समय पर संशोधन किया जाता है। सर्वाधिक महत्वपूर्ण अधिनियम है, कम्पनी अधिनियम, 1956 जो भारत में कम्पनियों की स्थापना और संचालन से संबंधित है। यह केन्द्र सरकार को कम्पनियों के गठन, वित्त प्रबंध, कार्यप्रणाली और समापन के नियंत्रण की शक्तियां प्रदान करता है। इसमें कम्पनी के संगठनात्मक, वित्तीय, प्रबंधकीय और अन्य सभी संगत पहलुओं से संबंधित व्यवस्था निहित है।
केन्द्र सरकार को अपनी नीतियों के कार्यान्वयन के लिए साधन मुहैया कराने के लिए कई विधान बनाए गए हैं। इनमें सबसे महत्वूपर्ण है औद्योगिक (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1951 (आईडीआरए)। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य केन्द्र सरकार को उद्योगों के विकास के लिए आवश्यक कदम उठाना; औद्योगिक विकास की पद्धति और दिशा को नियंत्रित करना; और जनहित में औद्योगिक उपक्रमों की गतिविधियों, कार्य निष्पादन और परिणामों को नियंत्रित करने के लिए शक्तियां प्रदान करना है।
व्यापार, वाणिज्य और उद्योग के अधिकतर लेन-देन संविदाओं पर आधारित होते हैं। भारत में, भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 संविदाओं का शासी विधान है, जिसमें संविदाओं के गठन, निष्पादन और प्रवर्तनीयता के सामान्य सिद्धांत और कुछ विशेष किस्म के संविदाओं जैसे कि क्षतिपूर्ति और गारंटी; उपनिधान और गिरवी; तथा एजेंसी के संबंध में नियम निर्धारित किए गए हैं।
विधान का अन्य महत्वपूर्ण पहलू औद्योगिक संबंध है, जिसमें नियोजक एवं कर्मचारियों के बीच; कर्मचारियों के बीच तथा नियोजकों के बीच परस्पर संवादों के कई पहलू शामिल हैं। ऐसे संबंधों में जब कभी भी हित को लेकर झगड़ा होता है उस दौरान इसमें शामिल किसी पक्ष में असंतोष पैदा हो जाता है और यहीं से औद्योगिक विवाद अथवा विरोध शुरू हो जाते हैं। सभी तरह के विवादों और विरोधों की जांच पड़ताल और उनका निपटान करने के लिए औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 मुख्य विधान है। इस अधिनियम में ऐसी संभावनाओं की कानूनी तौर पर हड़ताल अथवा तालाबंदी की जा सकती है, कब उन्हें अवैध अथवा गैर-कानूनी घोषित किया जा सकता है, कर्मचारी की जबरदस्ती कामबंदी, छंटनी, उसे सेवा मुक्त करने अथवा बर्खास्त करने की दशाओं शर्तों, उन परिस्थितियों जिनमें औद्योगिक इकाई को बंद किया जा सकता है और औद्योगिक कर्मचारियों और नियोजकों से संबंधित अन्य कई मामलों का उल्लेख किया जाता है।
व्यापार संघ की औद्योगिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण भाग है। इन व्यापार संघों को नियंत्रित करने वाला विधान भारतीय व्यापार संघ अधिनियम, 1926 है। इस अधिनियम का संबंध व्यापार संघों के पंजीकरण, उनके अधिकारों, उनकी दायित्वों और उत्तरदायित्वों और जो भी सुनिश्चित करता है कि उनकी निधियों का उपयोग सही ढंग से किया जाता है। यह पंजीकृत व्यापार संघों को वैध तथा कॉरपोरेट की हैसियत प्रदान करता है। ये उन्हें दीवानी अथवा आपराधिक मुकदमों से सुरक्षित रखते हैं ताकि वे कर्मचारी वर्ग के हितों के लिए अपनी उचित गतिविधियां जारी रख सकें।
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