सामाजिक सुरक्षा को विकास प्रक्रिया के अभिन्न अंग के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यह वैश्विकरण की चुनौतियों और इसके परिणामस्वरूप ढांचागत एवं प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों के प्रति सकारात्मक रवैया सृजित करने में सहायता करती है। यह अभिकल्पित करती है कि कर्मचारियों को सभी प्रकार के सामाजिक जोखिमों से संरक्षण दिया जाए जा उनकी मूल आवश्यकताओं को पूरा करने में अनावश्यक बाधाएं उत्पन्न करते हैं। कर्मगारों के पास बीमारी, दुर्घटना, वृद्धावस्था, रोग, बेरोजगार आदि के कारण उत्पन्न जोखिमों का सामना करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं है और संकट के समय में उनकी सहायता करने के लिए जीविका का वैकल्पिक साधन भी उनके पास नहीं हैं। इसलिए कर्मगारों को सामाजिक सुरक्षा संबंधी बीमा देकर उनकी सहायता करना राज्य का दायित्व हो जाता है। यह तथ्य हमारे नीति निर्माताओं द्वारा पहचाना गया है और तदनुसार सामाजिक सुरक्षा से संबद्ध विषयों को राज्य के नीति निर्देशक तत्व और समवर्ती सूची में सूचीबद्ध किया गया है।
राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के तहत :-
- अनुच्छेद 41 में कार्य के अधिकार शिक्षा और कुछ मामलों में सार्वजनिक सहायता की व्यवस्था की गई है। इसका तात्पर्य है कि राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमा के भीतर कार्य के अधिकार, शिक्षा का अधिकार और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी एवं अक्षमता के मामले में और अन्य अभाव के मामले में सार्वजनिक सहायता प्राप्त करने की प्रभावी व्यवस्था करेगा।
- अनुच्छेद 42 में कार्य की उचित और मानवीय परिस्थिति और मातृत्व राहत की व्यवस्था की गई है। इसका तात्पर्य है कि राज्य उचित और मानवीय कार्य परिस्थिति और मातृत्व राहत प्राप्त करने की व्यवस्था करेगा।
भारत के संविधान की समवर्ती सूची मे उल्लिखित सामाजिक सुरक्षा के मुद्दे निम्नलिखित हैं :-
- सामाजिक सुरक्षा और बीमा, रोजगार और बेरोजगार
- कार्य परिस्थिति, भविष्य निधियां, नियोक्ताओं का दायित्व, कर्मगारों की क्षतिपूर्ति अवैधता, और वृद्धावस्था पेंशन और मातृत्व लाभ सहित श्रम कल्याण।
इस प्रकार से सामाजिक सुरक्षा का प्रावधान हमारी औद्योगिक ढांचा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। राज्य की मुख्य जिम्मेदारी अपने कार्य बल की रक्षा और सहायता के लिए उपयुक्त प्रणाली का विकास करना है। इस प्रणाली में विभिन्न विधान, नीतियां और योजनाएं, जो कर्मगारों को विभिन्न प्रकार की सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराती हैं, शामिल हैं। यह रोजगार के दौरान चोटग्रस्त होने पर कर्मचारियों को नियोक्ता द्वारा क्षतिपूर्ति का भुगतान भी शामिल है। इसलिए श्रम और रोजगार मंत्रालय ने एक सामाजिक सुरक्षा प्रभाग की स्थापना की है जो कर्मगार सामाजिक सुरक्षा से संबंधित सभी कानूनों के प्रशासन के लिए सामाजिक सुरक्षा नीति एवं योजनाएं बनाने और क्रियान्वित करने का कार्य करता है।