| कम से कम दो पक्षकार :- संविदा निष्पादित करने के लिए कम से कम दो पक्षकारों की जरूरत होती है। एक पक्षकार पेशकश करता है और दूसरा उसे स्वीकारता है। प्रस्ताव या पेशकश करने वाला ‘’प्रतिज्ञाता’’ या पेशकशकर्ता कहलाता है। जबकि जिसे पेशकश की जाती है, पेशकश लेने वाला (ऑफरी) कहा जाता है और उसे व्यक्ति पेशकश को स्वीकारता है ‘’स्वीकर्ता’’ कहलाता है।
पेशकश की स्वीकृति :- ‘’पेशकश’’ और पेशकश की ‘’स्वीकृति’’ होनी चाहिए जिसकी परिणति करार में होती है। पेशकश और स्वीकृति दोनों विधिसम्मत होनी चाहिए।
कानून दायित्व :- पक्षकारों का उद्देश्य विधिक बाहयता सृजित करना होना चाहिए। प्रवर्तित किए जाने वाले करार में पक्षकारों के बीच कानूनी संबंधों पर विचार किया जाना चाहिए।
विधिसम्मत प्रतिफल :- संविदा मूलत: दो पक्षकारों के बीच एक सौदा होता है जिनमें प्रत्येक पक्षकार को उनके लिए ‘’कुछ’’ मूल्यवान या लाभकर प्राप्त होता है। इस ''कुछ’’ को कानून में ‘’प्रतिफल’’ कहा जाता है। ‘’प्रतिफल’’ एक मान्य संविदा का अनिवार्य घटक है। यह प्रतिफल धन, प्रदत्त सेवाओं, आदान-प्रदान किए गए माल या त्याग के रूप में हो सकता है जो दूसरे पक्षकार के लिए मूल्य रखता हो। यह प्रतिफल अतीत, वर्तमान या भविष्य में हो सकता है लेकिन यह अवश्य विधिसम्मत होना चाहिए।
सक्षम पक्षकार :- संविदा निष्पादित करने वाले पक्षकार इस अर्थ में कानूनी दृष्टि से सक्षम होने चाहिए कि प्रत्येक पक्षकार वयस्क हो चुका हो, दिमागी दृष्टि से स्वस्थ हो और संविदा करने के लिए स्पष्ट रूप से अयोग्य घोषित न किया गया हो। अक्षम पक्षकारों द्वारा किया गया करार कानूनी दृष्टि से निरस्त हो जाएगा।
स्वेच्छा से सहमति देना :- संविदाकारी पक्षों को अपनी सहमति स्वेच्छा से देनी चाहिए। ‘’सहमति’’ से अभिप्राय है कि पक्षकारों की करार के विषय के बारे में एक ही समय में और एक ही राय हो। सहमति तभी ‘स्वेच्छा से’ कही जाती है यदि वह बिना दबाव के, अनुचित असर डालकर, धोखाधड़ी से समस्त सूचना देकर या भूल वश न दी गई है। स्वेच्छा से सहमति न होने से संविदा के कानूनी दृष्टि से प्रवर्तन किए जाने पर असर पड़ेगा।
विधिसम्मत उद्देश्य :- करार का उद्देश्य विधिसम्मत होना चाहिए। करार अवैध होगा यदि :- (i) यह गैर-कानूनी (ii) अनैतिक (iii) धोखाधड़ी से पूर्ण होना (iv) ऐसे स्वरूप का होगा कि यदि संभव हुआ तो यह किसी कानून के उपबंधों के विरुद्ध जाएगा (v) किसी व्यक्ति को चोट पहुंचाए या सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाए (vi) सरकारी नीति के विरुद्ध हो।
स्पष्ट रूप से अमान्य घोषित न किया गया हो :- संविदा अधिनियम या किसी अन्य कानून के तहत स्पष्ट रूप से अमान्य घोषित करार का प्रवर्तन नहीं किया जा सकता और इसलिए वह संविदा नहीं होती। संविदा अधिनियम कुछ विशेष करारों को अमान्य घोषित करता है जैसे विवाह, अथवा व्यापार या कानूनी कार्यवाहियों तथा पण करारों में रोक।
कार्य निष्पादन की निश्चितता तथा संभावना :- संविदा की शर्तें अस्पष्ट अथवा अनिश्चित नहीं होनी चाहिए। यदि कोई करार अस्पष्ट है तथा इसका अर्थ सुनिश्चित नहीं किया जा सकता, संविदा की शर्तें इस प्रकार की होनी चाहिए कि उन्हें निष्पादित किया जा सके। किसी असंभव कार्य को करने का करार अवैध है तथा उसे कानून द्वारा प्रवर्तित नहीं किया जा सकता।
कानूनी औपचारिकताएं :- सामान्यत: संविदा मौखिक अथवा लिखित होती है। तथापि, कुछ संविदाओं का लिखित में होना आवश्यक हैं तथा इसके लिए पंजीकरण करवाया जाना भी अपेक्षित हो सकता है। इसलिए, जहां कानून के अंतर्गत किसी करार का लिखित में होना या पंजीकृत कराया जाना अपेक्षित है तो उसका अनुपालन किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ, भारतीय न्यास अधिनियम में यह अपेक्षित है कि न्यास का सृजन लिखित रूप में हो। |