| क्षतिपूर्ति तथा गारंटी की संविदाएं
क्षतिपूर्ति संविदा वह संविदा है जिसके द्वारा एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को उस हानि से बचाने का वचन देता है जो उसे स्वयं वचन देने वाले व्यक्ति या किसी तीसरे व्यक्ति के आचरण से हुई हो। उदाहरणार्थ, एक शेयरधारक कम्पनी के पक्ष में कोई क्षतिपूर्ति बांड निष्पादित करता है जिसमें वह कम्पनी को अपने स्वयं के कृत्य के परिणाम स्वरूप हुई किसी हानि के लिए क्षतिपूर्ति की सहमति देता है। क्षतिपूर्ति देने वाले व्यक्ति को ‘क्षतिपूर्तिकर्ता’ कहा जाता है तथा जिस व्यक्ति को सरंक्षण दिया गया है, उसे ‘क्षतिपूर्तिधारक’ अथवा ‘क्षतिपूरित’ कहा जाता है। क्षतिपूर्ति संविदा स्वयं वचन देने वाले व्यक्ति या किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा पहुंचाई गई हानि की पूर्ति तक सीमित है। क्षति किसी मानव अभिकरण द्वारा हुई होनी चाहिए। दुर्घटनाओं या समुद्र के खतरों से हुई हानि क्षतिपूर्ति संविदा के अंतर्गत शामिल नहीं है।
‘गारंटी’ की संविदा, चाहे वह मौखिक हो या लिखित हो, किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा चूक के मामले में उसकी देयता का निर्वहन करने अथवा वचन को पूरा करने के लिए की गई संविदा है। गारंटी की संविदा में तीन व्यक्ति शामिल हैं अर्थात गारंटी देने वाले व्यक्ति को ‘प्रतिभू’ कहा जाता है; जिस व्यक्ति की चूक के लिए गारंटी की गई हो, उसे ‘प्रधान ऋणी’ कहा जाता है तथा व्यक्ति जिसे गारंटी दी गई है, उसे ‘क्रेडिट’ कहा जाता है। गांरटी की संविदा प्रतिभू द्वारा दिया गया सशर्त वचन है कि यही प्रधान ऋणी चूक करता है तो वह ऋणदाता (क्रेडिटर) के प्रति दायी होगा।
क्षतिपूर्ति तथा गारंटी के बीच अंतर :-
- क्षतिपूर्ति संविदा में दो पक्षकार होते हैं अर्थात क्षतिपूर्तिकर्ता एवं क्षतिपूरित। गारंटी संविदा में तीन पक्षकार शामिल होते हैं अर्थात ऋणदाता, प्रधान ऋणी तथा प्रतिभू।
- क्षतिपूर्ति किसी हानि की प्रतिपूर्ति के लिए होती है जबकि गारंटी ऋणदाता की सुरक्षा के लिए है।
- क्षतिपूर्ति संविदा में, क्षतिपूरित व्यक्ति की देयता प्राथमिक है तथा यह आकस्मिक घटना के घटित होने पर उत्पन्न होती है। गारंटी की संविदा के मामले में, प्रतिभू की देयता गौण होती है तथा प्रधान ऋणदाता के चूक करने पर उत्पन्न होती है।
- वचन के अपने भाग का निष्पादन करने के पश्चात क्षतिपूर्तिकर्ता तृतीय पक्षकार के विरूद्ध कोई अधिकार शेष नहीं रहते तथा वह तृतीय पक्षकार पर तभी मुकदमा चल सकता है जब उसके पक्ष में कोई समनुदेशन हो। जबकि गारंटी संविदा में, प्रतिभू अपनी देयता का निर्वहन करने पर ऋणदाता का स्थान ले लेता है तथा वह प्रधान ऋणदाता पर मुकदमा चल सकता है।
उपनिधान (बेलमेंट) तथा गिरवी रखने की संविदा :-
उपनिधान ऐसी संविदा के अधीन एक व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति को किसी प्रयोजनार्थ किया गया। वस्तुओं का परिदाय है कि प्रयोजन पूरा हो जाने पर उन्हें उनका परिदाय करने वाले व्यक्ति के निदेशों के अनुसार लौटा दिया जाएगा अथवा उनका निपटान कर दिया जाएगा, वस्तुओं का परिदाय करने वाले व्यक्ति को उपनिधानकर्ता कहा जाता है तथा व्यक्ति जिसे वस्तुएं दी गई हैं, उसे ‘उपनिहिती’ कहा जाता है। उपनिधान की संविदा के कुछ उदाहरण हैं :- मरम्मत के लिए घड़ी या रेडियो देना; पार्किंग स्थल पर कार या स्कूटर छोड़ना; क्लोक कक्ष में सामान छोड़ना; आभूषण बनाने के लिए जौहरी को स्वर्ण देना; ड्राइक्लीनर के पास कपड़े छोड़ना, इत्यादि। उपनिधान का सार तत्व अधिकार का अंतरण है। स्वामित्व मालिक का ही रहता है। अचल सम्पत्ति का उपनिधान नहीं हो सकता।
‘गिरवी रखना’ वस्तुओं का उपनिधान है जिसमें किसी ऋण के भुगतान या वचन के निष्पादन के लिए प्रतिभूति के रूप में वस्तुओं का परिदाय किया जाता है। उपनिधान को ‘गिरवीकर्ता’ कहा जाता है तथा उपनिहिति को ‘गिरवीग्राही’ कहा जाता है। इस प्रकार, गिरवी रखना एक विशेष प्रकार का उपनिधान है। गिरवी केवल चल सम्पत्तियों को रखा जा सकता है। गिरवी के कानूनी रूप से वैध बनाने के लिए यह अनिवार्य है कि गिरवीकर्ता के पास वस्तुओं को प्रतिधारित रखने का हक या कानूनी अधिकार हो।
उपनिधान तथा गिरवी रखने के बीच अंतर :-
- प्रयोजन :- गिरवी किसी विशिष्ट प्रयोजन के लिए रखा जाता है जबकि उपनिधान किसी भी प्रयोजन के लिए किया जा सकता है।
- सम्पत्ति :- उपनिधान में, उपनिहिती को केवल उपनिधान की गई वस्तुओं का अधिकार मिलता है। स्वामित्व उपनिधानकर्ता के पास ही रहता है। गिरवी रखने के मामले में, गिरवीग्राही को गिरवी रखी गई वस्तुओं में विशेष हक मिल जाता है जिसके द्वारा उसे चूक की स्थिति में बिक्री के अधिकार के साथ स्वामित्व प्राप्त हो जाता है।
- बिक्री का अधिकार :- उपनिहिती उपनिधान की गई वस्तुओं पर ग्राहक के अधिकार का प्रयोग कर सकता है। उसे बिक्री का कोई अधिकार नहीं है। किन्तु गिरवी के मामले में, गिरवीग्राही गिरवी रखने वाले को यथेष्ट सूचना देने के पश्चात वस्तुओं को बेच सकता है।
अभिकरण की संविदाएं
‘अभिकर्ता’ किन्हीं तीसरे व्यक्तियों के साथ संव्यवहार में किसी अन्य का प्रतिनिधित्व करने का कोई कृत्य करने के लिए नियोजित व्यक्ति है। व्यक्ति, जो अभिकर्ता की नियुक्ति करता है तथा जिसके लिए ऐसा कार्य किया जाता है, अथवा जिसका इस प्रकार प्रतिनिधित्व किया जाता है, ‘मालिक’ कहलाता है। अभिकर्ता तथा मालिक के बीच संबंध को ‘अभिकरण’ कहा जाता है। जब कोई व्यक्ति संविदात्मक देयताओं के सृजन, आशोधन या समापन में किसी व्यक्ति तथा तृतीय व्यक्तियों के बीच उस व्यक्ति के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है तो वह व्यक्ति अभिकर्ता होता है। अभिकरण की संविदा का सार तत्व तृतीय व्यक्तियों के साथ मालिक के कानूनी संबधों को प्रभावित करने की शक्ति सहित अभिकर्ताओं की प्रतिनिधिक क्षमता है।
अभिकरण की संविदाएं दो महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर आधारित हैं :-
- जो कुछ भी कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कर सकता है उसका निष्पादन किसी अभिकर्ता के माध्यम से भी किया जाना अनुमत किया जाएगा सिवाय उन संविदाओं के मामले में जिनमें वैयक्तिक सेवाएं जैसे पेंटिंग, विवाह, गाना इत्यादि शामिल हैं।
- जो व्यक्ति विधिवत अधिकृत अभिकर्ता के माध्यम से कोई कार्य करता है, वह उसे स्वयं करता है अर्थात अभिकर्ता के कार्यों को मालिक के कार्य माना जाता है।
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