| उपदान एकमुश्त भुगतान है जो कर्मचरियों को उनकी कुल सेवा की अवधि के आधार पर किया जाता है। उपदान लाभ का भुगतान रोजगार की समाप्ति पर देय होता है (इस्तीफा, मृत्यु, सेवानिवृत्ति या बर्खास्तगी आदि द्वारा) अंतिम आहरित वेतन को आधार मानकर परिकलन किया जाता है। तथापि, कर्मचारी की मृत्यु हो जाने पर उसके परिवार के सदस्यों को यह राशि दी जाती है। यह कर्मचारी को उसकी सेवा संगठन को दिए जाने के लिए मौद्रिक रूप में आभार का एक रूप है और यह सामाजिक सुरक्षा लाभ का एक महत्वपूर्ण रूप है। नियोक्ता का उपदान भुगतान दायित्व वेतन और रोजगार समय में वृद्धि होने के साथ साथ बढ़ता है। नियोक्ता अपने वर्तमान राजस्व से उपदान लाभ का भुगतान कर सकता है। कुछ संगठनों ने अपनी वित्तीय योजना के एक भाग के रूप में उपदान निधि की भी स्थापना की है। और बहुत सी बीमा कम्पनियों ने विशेष योजनाएं तैयार की हैं जो उपदान से संबंधित हैं। उदाहरण के लिए एलआईसी (भारतीय जीवन बीमा निगम) की सामूहिक उपदान (नकद संचय) योजना हैं जो उपदान भुगतान अधिनियम के अधीन नियोक्ता के सांविधिक दायित्व के निधियन के रूप में सहूलियत मुहैया कराती है।
भारत में उपदान नियंत्रित करने वाला कानून उपदान भुगतान अधिनियम, 1972 (पीजी एक्ट) है। यह अधिनियम फैक्टरियों खानों, तेल क्षेत्र, बागवानी, पत्तनों, रेल, मोटर परिवहन उपक्रमों, कम्पनियों, दुकानों या अन्य प्रतिष्ठानों के लिए लागू होता है। इस अधिनियम के अंतर्गत प्रावधान निम्नलिखित हैं:-
- नियोक्ताओं का सांविधिक दायित्व अंतिम आहरित वेतन के 15 दिन के वेतन के बराबर राशि भुगतान करने का होता है। यह उन कर्मचारियों के लिए भुगतान योग्य होता है जिन्होंने पांच वर्ष की अबाधित सेवाएं पूरी की हैं। पांच वर्षों के बाद यदि कामगार छ: माह से अधिक परन्तु एक वर्ष से कम कार्य करता है तब यह एक और वर्ष के रूप में परिकलित किया जाता है। परन्तु यदि पांच वर्ष के बाद वे छ: माह से कम कार्य करते हैं तब यह एक और वर्ष के रूप में नहीं माना जाएगा। उपदान अभिकल्पित करने के लिए माह में कार्य दिवसों की संख्या 26 मानी जाती है। यह कर्मचारी को लाभ पहुंचाने के लिए किया जाता है चूंकि यह उपदान के भुगतान में वृद्धि करता है। अंतिम आहरित मूल वेतन को 26 से भाग दिया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त राशि को 15 से गुना किया जाता है ताकि प्रतिवर्ष उपदान की राशि पूरी की जा सके।
- 3,50,000 रुपए तक प्राप्त उपदान को आयकर अधिनियम के तहत कर में छूट दी जाती है। तथापि, यह छूट उपदान भुगतान के लिए उपलब्ध नहीं होती जब कर्मचारी सेवा में ही रहता है। पिछले नियोक्ता से प्राप्त उपदान को छूट सीमा की गणना के लिए वर्तमान नियोक्ता से प्राप्त उपदान के साथ जोड़ा जाता है।
- किसी अन्य नियोक्ता के मामले में जो अधिनियम के तहत शामिल नहीं है सेवानिवृत्ति, मृत्यु, बर्खास्तगी, स्तीफा या सेवानिवृत्ति के पहले उसके अक्षम होने पर प्राप्त उपदान को कर से छूट दी जाती है जो निम्न सीमा तक दी जाती है :-
(i) 3,50,000 रुपए
(ii) वास्तविक प्राप्त उपदान
(iii) प्रत्येक सेवापूर्ण वर्ष के लिए आधा महीने के वेतन/औसत वेतन का परिकलन कर्मचारी के सेवानिवृत्ति होने के तुरन्त पहले के 10 महीनों के औसत वेतन के आधार पर किया जाता है। इस प्रयोजन के लिए वेतन का परिकलन मूल वेतन जमा महंगाई भत्ता जमा नियत लाभ प्रतिशत पर कमीशन के रूप में किया जाता है।
- चूंकि उपदान सांविधिक सेवा शर्त है अधिनियम में नियोक्ता के लिए दंड की व्यवस्था है जो कर्मचारी को इसका भुगतान नहीं करता है। इसके अलावा नियोक्ता की बद्सलूकी के मामले में जिससे प्रबंधन को वित्तीय घाटा होता है, हानि के बराबर राशि जो नियोक्ता को सीधे उठानी पड़ती है जो पैसे बद्सलूकी के कारण होता है, को कर्मचारी को देय उपदान से जब्त किया जा सकता है।
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