अनिश्चितता, जोखिम और असुरक्षा व्यापार के किसी रूप के लिए प्रासंगिक हैं। यह किसी व्यापारी संगठन के लिए बीमा को अपरिहार्य बना देता है। बीमा को एक लिखित संविदा को रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके अंतर्गत एक पक्ष ‘प्रीमियम’ के नाम से पुकारे जाने वाले प्रतिफल के बदले किसी अनिश्चित भविष्य के कारण इसको हुई हानि अथवा क्षति के विरुद्ध दूसरे पक्ष को क्षतिपूर्ति करने के लिए सहमत होता है। वह व्यक्ति/व्यापार जो अपने जीवन/संपत्ति की बीमा कराता है को ‘इंशोर्ड/एश्योर्ड’ कहा जाता है। वह एजेंसी जो किसी बीमा व्यवस्था करने में मदद करती है, को ‘इंसुरर’ अथवा ‘बीमा कंपनी’ कहा जाता है। लिखित में किए गए करार अथवा संविदा को ‘पॉलिसी’ कहा जाता है। एक बीमा कंपनी किसी व्यापार कंपनी को निम्नलिखित लाभ प्रदान करती हैं :-
- संरक्षण :- यह हानि के जोखिम के खिलाफ संरक्षण और व्यापारी को सुरक्षा की भावना प्रदान करती है।
- जोखिमों को कम करना :- क्योंकि हानि का भार बहुत से लोगों तक फैला है।
- क्रेडिट स्टैंडिंग :- फर्म को बढ़ाया जाता है क्योंकि व्यापारी अपने कुछ जोखिम किसी बीमा कंपनी को आसानी से हस्तान्तरित कर सकती है।
- व्यापार की सततता और सुनिश्चितता :- यदि सभी जोखिमों को व्यापारी अपने आप वहन करता है तो व्यापार संकार्य अनिश्चित और रुकावट की प्रकृति के हो जाएंगे।
- फर्मों की पूंजी का बेहतर उपयोग :- चूंकि बीमा कंपनियां जोखिम को ले लेती है, यह व्यापारी फर्म को निवेश करने और इसकी पूंजी का अधिकतम उपयोग करने में समर्थ बनाता है।
इस प्रकार बीमा का उद्देश्य विभिन्न प्रकार के जोखिमों, जो वह अपने जीवन, संपत्ति और व्यापार को महसूस करता है, से प्रोदभूत हानि के खिलाफ मालिक की प्रतिपूर्ति करना है। यह जोखिमों से बाहर निकालने के अभिप्रेता है जो लोगों का समूह जो किसी बीमायोग्य जोखिम के अध्यधीन हैं किसी कोष में नियमित रूप से योगदान देते हैं। ऐसा सृजित कोष समूह के उन सदस्यों की प्रतिपूर्ति के लिए उपयोग में लिया जाता है जो वास्तव में कुछ अप्रत्याशित आपदा के कारण हानि उठाते हैं। अत: कुछेक की हानि को साम्य आधार पर सभी सदस्यों द्वारा बांटा जाता है।
भारत में बीमा मुख्यत: दो प्रकार की हैं अर्थात जीवन बीमा और साधारण बीमा। दोनों प्रकार की बीमा पॉलिसियों से संबंधित सभी मामले वित्त मंत्रालय में बीमा प्रभाग की व्यवस्था के अंदर आते हैं। बीमा पॉलिसी धारक के हितों की रक्षा के लिए और बीमा उद्योग को विनियमित करने, बढ़ावा देने और नियमित वृद्धि सुनिश्चित करने भारत सरकार बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) का गठन किया है। उक्त प्राधिकरण विनियमों को जारी कर रही है जिसमें बीमा एजेंटों, विलेयता लाभ, पुन: बीमा, बीमाकर्ताओं का पंजीकरण, ग्रामीण और सामाजिक क्षेत्र के बीमाकर्ताओं के दायित्व, लेखांकन की प्रक्रियाओं आदि सहित बीमा उद्योग को लगभग सम्पूर्ण भाग शामिल है।
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