भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी)
भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की स्थापना जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 के तहत की गई थी और इसका उद्देश्य जीवन बीमा को कही अधिक व्यापक रूप से और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में फैलाना था जिससे उन्हें उचिता लागत पर पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा मुहैया कराई जा सके। एलआईसी ने देशभर में 2048 शाखाओं, 100 मंडलों और 7 आंचलिक कार्यालयों का विस्तृत नेटवर्क स्थापित कर लिया है। भारतीय जीवन बीमा निगम विदेशों में भी कारोबार करता है और फिजी, मॉरीशस और यूनाइटेड किंगडम में उसके कार्यालय है। शाखा प्रचालनों के अलावा, निगम में बहरीन, नेपाल और श्रीलंका में प्रतिष्ठित स्थानीय भागीदारों के साथ संयुक्त रूप से विदेशी अनुषंगी कम्पनियां स्थापित की हैं। भारतीय बीमा क्षेत्र के उदारीकृत परिदृश्य में भी एलआईसी अग्रणी जीवन बीमाकर्ता के स्थान पर है और अपने विगत रिकॉर्डों को तोड़ता हुआ नए विकास के पथ पर तेज़ी अग्रसर हो रहा है।
भारतीय साधारण बीमा निगम (जीआईसी)
भारतीध साधारण बीमा निगम (जीआईसी) की स्थापना साधारण बीमा कारोबार (राष्ट्रीकरण) अधिनियम, 1972 (गिना), के अनुसरण में साधारण बीमा या गैर जीवन बीमा कारोबार की देख-रेख, नियंत्रण तथा प्रचालन के प्रयोजनार्थ की गई थी। आरंभ में जीआईसी की चार अनुषंगी शाखाएं थी, अर्थात्:- नेशनल इंश्योरेंस कम्पनी लि.,न्यू इंडिया इंश्योरेंस कम्पनी लि., द ओरियन्टल कम्पनी लि. और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कम्पनी लि.। लेकिन वर्ष 2000 में इन शाखाओं को जीआईसी से अलग कर दिया गया और ''जिस्सा'' (जनरल इंश्योरेंस पब्लिक सैक्टर एसोसिएशन) नामक संघ बनाया गया।
अब जीआईसी को ''भारतीय पुनर्बीमाकर्ता'' के रूप में अनुमोदित कर दिया गया है और यह सरकारी एवं निजी क्षेत्र की विभिन्न साधारण बीमा कम्पनियों को पुनर्बीमा सहायता प्रदान करता है। जब बीमा कम्पनियां बीमा कारोबार की हामीदारी देने के दौरान हो सकने वाले नुकसान से स्वयं को बचाने के लिए अन्य हामीदारों या अन्य बीमा कम्पनियों के साथ व्यवस्था करके अपने जोखिम को कम करती हैं तो इसे पुनर्बीमा कहा जाता है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब कई बार कुल बीमा की राशि बहुत अधिक हो जाती है जिसके कारण बीमाकर्ता पर अत्यधिक देनदारी हो जाती है। इसलिए वे उस विषय का दोबारा बीमा कटाकर जोखिम का कुछ हिस्सा दूसरे बीमाकर्ता पर अन्तरित कर देते हैं। इस प्रकार यह दो बीमाकर्ताओं के बीच निष्पादित संविदा है और इसका बीमित मूल पक्षकार से कोई संबंध नहीं है।
बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए)
बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (अाईआरडीए अधिनियम) के अधिनियमन के साथ ही बीमा क्षेत्र को भारतीय निजी बीमा कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा के लिए खोल दिया गया। आईआरडीए अधिनियम, 1999 के प्रावधानों के अनुसार, 19 अप्रैल, 2000 को बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य बीमा पॉलिसीधारकों के हितों की रक्षा करना तथा बीमा उद्योग के व्यवस्थित विकास को विनियमित, संर्वधन तथा सुनिश्चित करना था। आईआरडीए अधिनियम 1999 बीमा बाजार में निजी क्षेत्र के निकायों के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया जिस पर अब तक सरकारी क्षेत्र की बीमा कम्पनियों/निगमों का विशेषधिकार था।
आईआरडीए पर बीमा पॉलिसी धारकों के हितों की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी है। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए, प्राधिकरण ने निम्नलिखित उपाय किए हैं :-
- आईआरडीए ने पॉलिसीधारक हित संरक्षण विनियम 2001 को अधिसूचित किया है ताकि इन बातों की व्यवस्था की जा सके :- पॉलिसी प्रस्ताव दस्तावेज़ आसानी से समझी जाने वाली भाषामें हो जीवन और गैर जीवन दोनों से संबंधी दावा-प्रक्रिया; शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना; दावों का शीघ्र निपटान; और पॉलिसीधारकों की सेवा आदि। इन विनियमों में दावों के निपटान में होने वाली देश के लिए बीमाकर्ता द्वारा ब्याज की अदायगी का भी प्रावधान किया गया है।
- बीमाकर्ताओं से शोधन-क्षमता मार्जिन रखने की अपेक्षा की जाती है ताकि वे दावों के भुगतान के संबंध में पॉलिसीधारकों के प्रति अपने दायित्व को पूरा करने की स्थिति में हो।
- बीमा कम्पनियों के लिए यह अनिवार्य है कि वे पॉलिसी के अंतर्गत लाभ, निबंधन एवं शर्तों का खुलासा करें। बीमाकर्ता द्वारा निकाले गए विज्ञापनों से बीमा कराने वाली जनता भ्रमित नहीं होनी चाहिए।
- सभी बीमाकर्ताओं को अपने मुख्य कार्यालयों में तथा अन्य कार्यालयों में उपयुक्त शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना चाहिए।
- प्राधिकरण बीमाकर्ताओं द्वारा बीमा संविदा के तहत प्रदान की गई सेवाओं के संबंध में पॉलिसीधारकों से प्राप्त किसी शिकायत का मामला बीमकर्ता के समक्ष रखता है।
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