| अधिकतम अच्छा विश्वास
एक बीमा संविदा को एक ‘यूबेरिमेट फिडेल’ संविदा के रूप में अथवा ‘अधिकतम अच्छा विश्वास’ पर आधारित एक संविदा के रूप में ज्ञात है। इसका आशय दोनों पक्षों को सभी वस्तुगत तथ्यों प्रकट करने चाहिए। कोई तथ्य वह सामग्री है जो बीमा के संविदा की जड़ तक जाती है और अंतरराष्ट्रीय जोखिम को वहन करती है। यह केवल इस कारण से है जब बीमा कर्ता सम्पूर्ण सत्यता जानता है कि वह यह निर्णय करने की स्थिति में है :- (i) क्या उसे जोखिम को स्वीकार करना चाहिए, और (ii) क्या उसे प्रीमियम लेना चाहिए। किसी तथ्य को छिपाने को बीमाकर्ता संविदा के एश्योर्ड लाभों से वंचित करने का हकदार होगा। यह भी कि जैसे ही बीमा के जोखिम एक पक्ष से दूसरे पक्ष को अंतरित हो जाते हैं, यह आवश्यक है कि बीमाकृत और बीमाकर्ता के बीच अधिकतम अच्छा विश्वास और पारस्परिक विश्वास होना चाहिए।
क्षतिपूर्ति
किसी बीमा का संविदा किसी ‘क्षतिपूर्ति’ का एक संविदा है। इसका आशय यह है कि हानि के मामले में बीमा कृत जिसके खिलाफ पॉलिसी जारी की गई है, हानि की वास्तविक धनराशि संदत्त की जाएगी न कि पॉलिसी से अधिक धनराशि, अर्थात उसकी पूर्णतया क्षतिपूर्ति की जाएगी। बीमा की प्रत्येक संविदा का उद्देश्य बीमाकृत को जहां निकटतम संभव हो, हानि के बाद उसी वित्तीय स्थिति में रखना है मानो कि किसी प्रकार की हानि नहीं हुई हो। यह जीवन, व्यक्तिगत दुर्घटना और रूग्णता बीमा को छोड़कर सभी प्रकार की बीमों के लिए लागू है। बीमा संविदा क्षतिपूर्ति की संविदा नहीं रहती है यदि बीमाकर्ता द्वारा बीमाकृत को हुई घटना के विरूद्ध क्या उसे हानि हुई अथवा नहीं, परन्तु एक निश्चित धनराशि का भुगतान कर दिया जाता है। जीवन बीमा के मामले की तरह से बीमाकर्ता मृत्यु अथवा निश्चित अवधि की समाप्ति पर पॉलिसी में उल्लिखित राशि के भुगतान के लिए उत्तरदायी है।
बीमायोग्य हित
इसका आशय यह है कि बीमाकृत का बीमा के मामले में वास्तविक हित होना चाहिए। बिना बीमायोग्य हित प्रभावित बीमा की किसी संविदा से बचा जाता है। एक व्यक्ति को उन मामले में बीमायोग्य हित हो सकते है यदि वह उसके अस्वित्व से लाभान्वित होता है और इसके विनाश द्वारा प्रतिकूल प्रभावित होता है। उदाहरण के लिए :- एक व्यक्ति का अपने स्वयं के भवन में बीमायोग्य हित है; नियोक्ता अपने कर्मचारियों का जीवन बीमा करा सकता है क्योंकि उसमें उसका आर्थिक हित है; एक व्यापारी का अपने स्टॉक, संयंत्र और मशीनरी, भवन इत्यादि में बीमायोग्य हित हो सकते हैं। इस प्रकार ये सभी लोग स्टॉक में कुछ रखते हैं और उन सबका बीमायोग्य हित का अस्तित्व है जो उसे केवल करार को दांव पर लगाने से इसे अलग करता है।
जीवन बीमा के मामले में बीमा के प्रभावित होने के समय बीमायोग्य हित मौजूद होने चाहिए। यह आवश्यक नहीं है कि एश्योर्ड के परिपक्वता के समय भी बीमायोग्य हो। अग्नि बीमा के मामले में बीमा योग्य हित बीमा के समय और हानि के समय दोनों समय में मौजूद होने चाहिए। ये बीमा के समय मौजूद हो सकते हैं अथवा नहीं हो सकते हैं।
आसन्न कारण
‘आसन्न कारण’ का आशय है कि हानि का कारण आसन्न अथवा तत्काल होना चाहिए न कि दूरस्थ। यदि हानि का आसन्न कारण बीमाकृत जोखिम के लिए है तो बीमाकृत की प्रतिपूर्ति की जा सकती है जब दो अथवा उससे अधिक कारणों के कारण हानि होती है तो वास्तविक अथवा निकटस्थ कारण आसन्न कारण होगा, हालांकि दूरस्थ कारण के बिना परिणाम नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यदि बीमाकृत के गलत आचरण के किसी कारण के कारण हानि होती है, तो बीमाकर्ता जिम्मेदार है।
जोखिम
बीमा की किसी संविदा में बीमाकर्ता किसी विनिर्दिष्ट हानि से बीमाकृत की रक्षा करता है और बीमाकर्ता ऐसी हानि के जोखिम चलाने के लिए प्रीमियम प्राप्त करता है। अत: किसी पॉलिसी से जोखिम जुड़ा होना चाहिए।
हानि की प्रतिपूर्ति
बीमाकृत संपत्ति के साथ कुछ दुर्घटना की स्थिति में बीमाकृत को हानि की प्रतिपूर्ति अथवा कम करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने चाहिए। जैसा कि कोई बुद्धिमान अपनी लापरवाही के कारण हुई हानि के लिए करता है। लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि हालांकि बीमाकृत अपने बीमाकर्ता के लिए अपना सर्वोत्तम करने से बंधे है, वह अपने जीवन के जोखिम पर ऐसा करने के लिए वह बाध्य नहीं है।
प्रतिनिवेशन
प्रतिनिवेशन का सिद्धांत प्रतिपूर्ति के सिद्धांत का स्वाभाविक परिणाम है और केवल अग्नि एवं समुद्री बीमा के लिए लागू होता है। इसके अनुसार जब कोई बीमाकृत अपनी हानि के संबंध में पूर्ण प्रतिपूर्ति प्राप्त करता है, सभी अधिकार और उपचार जो उसके पास तीसरे व्यक्ति के विरूद्ध हैं, बीमाकर्ता के पास चले जाएंगे और उसके लाभ के लिए प्रयोग में लिए जाएगे जब तक वह (बीमाकर्ता) उस राशि जो उसको पॉलिसी के अंतर्गत संदेत की गई है, कि क्षतिपूर्ति नहीं कर देता है। बीमाकर्ता का प्रतिनिवेशन का अधिकार केवल तभी उदभव होता है जब उसे उस हानि के लिए भुगतान किया जाता है जिसके लिए वह पॉलिसी के अंतर्गत जिम्मेदार है और इस अधिकार का विस्तार केवल बीमाकृत को उस वस्तु के संबंध में उपलब्ध अधिकारों और उपचारों तक ही है जिसके लिए बीमा के संबंधित संविदा है।
अंशदान
जब एक जोखिम पर दो अथवा अधिक बीमा हैं तो अंशदान का सिद्धांत लागू होता है। अंशदान का उद्देश्य हानि की वास्तविक धनराशि को विभिन्न बीमाकर्ताओं जो उसी विषय वस्तु के संबंध में विभिन्न पॉलिसियों के अंतर्गत उसी जोखिम के लिए उत्तरदायी हैं, के बीच बांटना है। कोई बीमाकर्ता बीमाकृत को पॉलिसी द्वारा कवर हानि की पूर्ण धनराशि के अनुपात में अपने सह बीमाकर्ताओं से अंशदान के लिए हकदार हो जाता है जो उसी विषय वस्तु की हानि के मामले में प्रत्येक को संदत्त करनी है। दूसरे शब्दों में अंशदान का अधिकारी उस वक्त उदभूत होता है जब :-
- विभिन्न पॉलिसियां जो उसी विषय वस्तु से संबंधित हों।
- पॉलिसियां उसी जोखिम को कवर करती है जिसके कारण हानि हुई।
- सभी पॉलिसियां हानि के समय प्रवृत हों।
- बीमाकर्ताओं में से एक ने हानि के अपने हिस्से से अधिक बीमाकृत को भुगतान कर दिया हो।
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