| बीमा की परिभाषा एक लिखित संविदा के रूप में की जा सकती है। जिसके अंतर्गत एक पक्ष दूसरे पक्ष को एक राशि जिसे ‘प्रीमियम’ कहा जाता है, के प्रतिफल में, अनिश्चित भविष्य के कारण होने वाले नुकसान या क्षति के बदले में क्षतिपूर्ति पर सहमत होता है। वह व्यक्ति/व्यवसाय जो अपने जीवन/संपत्ति का बीमा करवाता है ‘बीमित’ कहलाता है। वह एजेंसी जो बीमा करार करवाने में सहायता करती है। ‘बीमाकर्ता’ अथवा ‘बीमा कंपनी’ कहलाती है। लिखित में किया जाने वाला करार या संविदा ‘पॉलिसी’ कहलाती है।
किसी कंपनी के कर्मचारियों के लिए बीमा कवर सामाजिक सुरक्षा लाभ पैकेज का एक महत्वपूर्ण पहलू है। इसमें चिकित्सा लाभों से संबंधित बीमा पॉलिसियां, कर्मकारों को मुआवजा तथा भविष्य निधियां शामिल हैं। तदनुसार अनेक बीमा कंपनियों ने कुछ पॉलिसियां तैयार की हैं जिनमें कर्मचारियों को ऐसे बीमा कवर का प्रावधान है। उदाहरणार्थ :-
- यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा कर्मकार मुआवजा बीमा :- इसके अंतर्गत किसी नियोजक को उसके कर्मकारों को उनके काम के दौरान लगने वाली चोटों अथवा व्यवसाय संबंधी बीमारियों के संक्रमण में आने पर मुआवजे का भुगतान करना अपेक्षित है। यह मुआवजा मुआवजा कर्मकार मुआवजा अधिनियम के अंतर्गत दिया जाता है। नियोजक ऐसी किसी देयता को कवर करने के लिए बीमा पॉलिसी प्राप्त कर सकता है। प्रीमियमों का भुगतान सामान्यतया वेतनों के आधार पर किया जाता है। इसे ‘नियोजक’ देयता बीमा’ के नाम से भी जाना जाता है। यह पॉलिसी निम्नलिखित जोखिमों के लिए बीमा प्रदान करती है :-
- बीमित व्यक्ति को एक ‘नियोजक’ के रूप में – उसके कर्मकार को काम करते हुए पहुंची दुर्घटनात्मक चोटों (जिनमें घातक चोट शामिल है) के लिए उसकी देयता के एवज में क्षतिपूर्ति ।
- अतिरिक्त प्रीमियम पर - काम करते हुए दुर्घटनात्मक चोटों के लिए अस्पताल तक परिवहन की लागत सहित चिकित्सा, शल्प चिकित्सा और अस्पताल संबंधी खर्चें ।
- अतिरिक्त प्रीमियम पर, नौकरी के दौरान उत्पन्न होने वाली कर्मकार मुआवजा अधिनियम , के अंतर्गत उल्लिखित बीमारियों के संबंध में देयता।
इसी प्रकार, न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड द्वारा नियोजक देयता पॉलिसी उपलब्ध कराई जाती है। उनकी पॉलिसी में नियोजक को कर्मचारियों की मृत्यु के एवज में अथवा उन्हें नौकरी से उत्पन्न होने वाली तथा नौकरी के दौरान लगने वाली चोटों या व्यावसायात्मक बीमारियों के लिए सांविधिक देयता शामिल है।
भारत सरकार ने कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (ईएसआई अधिनियम) है जो कर्मचारी बीमा से संबंधित है। इस अधिनियम में एक एकीकृत जरुरत आधारित सामाजिक बीमा योजना परिकल्पित है जो बीमारी, मातृत्व, अस्थाई शारीरिक विकलांगता, नौकरी के कारण लगी चोट की वजह से मृत्यु जिसके परिणामस्वरूप वेतन अथवा अर्जन क्षमता की हानि होती है, जैसी आकस्मिकताओं में कर्मचारियों की हितों की संरक्षा करेगा। इस अधिनियम में कर्मचारियों और उनके निकटतम आश्रितों को पर्याप्त रूप से अच्छी चिकित्सा परिचर्या की गारंटी भी दी गई है। इस अधिनियम में कई सामाजिक सुरक्षा लाभों का भी उपबंध है जिनमें चिकित्सा लाभ, मातृत्व लाभ आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त अधिनियम नियोजकों को मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और कर्मकार मुआवजा अधिनियम,1923 के अंतर्गत उनके दायित्वों से भी मुक्त करता है। अधिनियम के अंतर्गत बीमा योजना कर्मचारियों के स्वास्थ्य बीमा आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार की गई है जिसमें बीमित व्यक्तियों और उनके आश्रितों को पूर्ण चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं।
केंद्र सरकार ने कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम के अंतर्गत योजनाओं को प्रशासित करने के लिए कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) की स्थापना की है। यह देश में प्रमुख सामाजिक सुरक्षा संगठन हैं, इस निगम में केंद्रीय और राज्य सरकारों, नियोजकों, कर्मचारियों, संसद और चिकित्सा व्यवसाय का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य शामिल हैं। निगम के कार्य कर्मचारियों को चिकित्सा उपचार, रुग्णता, मातृत्व और नौकरी के कारण घायलावस्था के दौरान नकद लाभ उपलब्ध कराना तथा नौकरी के दौरान लगी चोटों के कारण कर्मचारियों की मृत्यु पर आश्रितों को पेंशन उपलब्ध कराना है।
एक महत्वपूर्ण केन्द्रीय सरकार कर्मचारी समूह बीमा योजना (सीजीईजीआईएस) भी है जिसमें केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए दो तरफा लाभ हैं : (i) उनके परिवारों को सहायता के लिए बीमा कवर और (ii) सेवानिवृत्ति पर उनके संसाधनों में वृद्धि के लिए एक मुश्त भुगतान। 1 नवम्बर 1980 के बाद केन्द्र सरकार की सेवा में आने वाले सभी कर्मचारियों को योजना के अंतर्गत इसके प्रवृत्त होने की तारीख अर्थात 1 जनवरी, 1982 से अनिवार्य रूप से कवर किया गया है।
‘बीमा’ उपखण्ड में और अधिक ब्यौरे निहित होंगे। |