बिक्री करना विपणन का सार तत्व है। इसे उस प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया गया है जिसके द्वारा वस्तुएं तथा सेवाएं अंतत: ग्राहकों तक पहुंचती हैं। इस का संबंध फर्म द्वारा उत्पादित वस्तु के क्रय वस्तुत: पूरा करने के लिए संभावी क्रेतओं को ढूंढने में हैं। इसमें मूल्य या धन के बदले उत्पादक से क्रेता तक वस्तुओं के स्वामित्व का अंतरण शामिल्त है। बिक्री के कार्य में अनेक गतिविधियां शामिल हैं :-
- आवश्यकता आधारित वस्तुओं के उत्पादन की योजना बनाना;
- इस प्रकार उत्पादित वस्तुओं के लिए बाजार का तथा क्रेताओं का अन्वेषण;
- उन वस्तुओं के लिए मांग का सृजन करने के लिए विभिन्न संवर्धनात्मक तकनीकों का प्रयोग;
- उनके लिए बिक्री तथा कीमत, प्रमात्रा, गुणता, पैकेजिंग के स्वरूप, परिदाय की शर्तों का निर्धारण करना;
- वस्तुओं की हकदारिता तथा स्वामित्व का उपभोक्ताओं को अंतरण;
ग्राहकों को प्रदान की जाने वाली पश्च बिक्री सेवाओं के संबंध में निर्णय करना।
पारम्परिक रूप से, बिक्री की संकल्पना में उत्पादों के उत्पादन पर तथा बिक्री की प्रमात्रा को बढ़ाने तथा उच्चतर लाभ अर्जित करने के उद्देश्य से सशक्त प्रेरक माध्यमों का प्रयोग करने पर महत्व दिया जाता था। उपभोक्ताओं की आवश्यकताओं तथा इच्छाओं के निर्धारण का कोई प्रयास नहीं किया जाता था। किंतु विगत वर्षों में बिक्री की संकल्पना संगठनों की सोच में परिवर्तन के साथ - साथ वर्धित प्रतिस्पर्द्धा है। बिक्री की आधुनिक संकल्पना में ग्राहकों को कोई उत्पाद बेचने के बजाए उन्हें संतुष्ट करने पर अधिक बल दिया जाता है। इस प्रकार पद बिक्री को सामान्यत: विपणन के साथ अंतर विनिमयकारी रूप से प्रयुक्त किया जाता है। किंतु दोनों पदों में कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। उनके बीच कुछ बुनियादी अंतर है :-
विपणन की संकल्पना एक व्यापक पद है, जिसमें बिक्री शामिल है। 'विपणन' के दीर्घावधिक लक्ष्य हासिल करने के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण है। यह एक सुपरिभाषित बाजार से आरंभ होती है तथा ग्राहकों की आवश्यकता पर संकेन्द्रित है। यह उन सभी विपणन कार्यकलापों को समन्वित करती है जो ग्राहकों को संतुष्ट करने वाले उत्पादों का उत्पादन करती है। इसका लक्ष्य ग्राहक संतुष्टि द्वारा लाभार्जन है। जबकि 'बिक्री' एक अपेक्षाकृत संकीर्ण तथा खंडमय दृष्टिकोण है। यह कारखाने से आरंभ होता है तथा कम्पनी विद्यमान उत्पादों (विक्रेता की आवश्यकताओं) पर संकेन्द्रित है। इसमें विभिन्न संवर्धनात्मक तकनीकें यथा वैयक्तिक बिक्री, विज्ञापन, प्रचार तथा बिक्री संवर्धन के प्रयोग द्वारा इसका लक्ष्य बिक्री की प्रमात्रा द्वारा लाभार्जित करना है। संक्षेप में, विपणन ग्राहकोन्मुखी है जबकि बिक्री उत्पादनोन्मुखी है।
अत: बिक्री में प्रभावात्मकता तथा दक्षता कम्पनी के लाभ तथा लाभप्रदता की प्रमात्रा का निर्धारण करती है। अत: अपने लाभों को अधिकतम करने के लिए कम्पनी के पास एक सुपरिभाषित बिक्री कार्यनीति होनी चाहिए। |