साझेदारी भारत में बहुत ही सामान्य कारोबारी संगठन का रूप है। साझेदारी फर्मों का अभिशासन भारतीय साझेदारी अधिनियम,1932 के प्रावधानों द्वारा होता है। यह अधिनियम साझेदारी का गठन, साझेदारों के अधिकार और कर्त्तव्य और साझेदारी भंग करने संबंधी नियम निर्धारित करता है। यह साझेदारी की परिभाषा व्यक्तियों के बीच संबंध के रूप में देता है जो सबकी ओर से एक या उनमें से किसी एक के द्वारा किए जाने वाले कारोबार के लाभों को आपस में बांटने के लिए सहमत हैं। इस परिभाषा में साझेदारी का गठन करने के लिए कम से कम तीन अपेक्षाएं दी जाती हैं :-
- व्यक्तियों द्वारा मौखिक या लिखित करार करना जो साझेदारी का गठन करना चाहते हैं।
- साझेदारी द्वारा किए जाने के लिए लक्षित कारोबार के लाभों का बंटवारा करार का उद्देश्य हो।
- कारोबार सभी साझेदारों द्वारा या सबके बदले कार्य करने वाला किसी एक के द्वारा किया जाए।
अधिनियम के तहत एक दूसरे के साथ साझेदारी का करार करने वाले व्यक्ति रूप से साझेदार कहलाते हैं और सामूहिक रूप से 'फर्म' और जिस नाम पर वे अपना कारोबार चलाते हैं वह 'फर्म का नाम' कहलाता है।
साझेदारी फर्मों के कराधान से संबंधित प्रावधान
साझेदारी फर्मों पर आयकर अधिनियम, 1961 के तहत कर लगाया जाता है। यह आयकर से संबंधित सभी विषयों के लिए मुख्य अधिनियम है
और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को इस अधिनियम के प्रावधानों के क्रियान्वयन के लिए नियम बनाने ( आयकर नियमावली, 1962 ) अधिनियम के प्रावधानों का क्रियान्वयन करने के लिए प्राधिकृत करता है। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग का एक भाग है। इसे भारत में विभिन्न प्रत्यक्ष करों से संबंधित सभी जिम्मेदारी सौंपी गई है और यह आयकर विभाग. के माध्यम से प्रत्यक्ष कर के कानूनों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। आयकर अधिनियम का वित्त अधिनियम द्वारा वार्षिंक संशोधन किया जाता है, जिसमें समतुल्य वर्ष के लिए आयकर और अन्य करों की दरों का उल्लेख किया जाता है।
आयकर अधिनियम के तहत साझेदारी फर्म पर अलग निकाय के रूप में कर लगाया जाता है जो साझेदारों से भिन्न होता है। अधिनियम में, पंजीकृत फर्मों और अपंजीकृत फर्मों के निर्धारण में भेदभाव नहीं किया जाता है। तथापि, साझेदारी को साझेदारी विलेख द्वारा प्रमाणित किया जाता है। साझेदारी विलेख साझेदारों के अधिकारों और कर्त्तव्य का ब्लू प्रिंट होता है जिसके अनुसार उनके पूंजी लाभ का बंटवारे का अनुपात, आहरण, पूंजी पर ब्याज, कमीशन, वेतन आदि निबंधनें और शर्तें कार्य प्रणाली, कार्य करना और साझेदारी कारोबार को समाप्त करना होता है।
अधिनियम के तहत, साझेदारी फर्म का निर्धारण या तो साझेदारी फर्म के रूप में या व्यक्तियों के संघ (एओपी) के रूप में किया जाता है। यदि फर्म निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है तो इसका निर्धारण साझेदारी फर्म के रूप में किया जाएगा अन्यथा इसका निर्धारण एओपी के रूप में होगा:-
- फर्म को लिखत द्वारा प्रमाणित किया जाता है अर्थात लिखित साझेदारी विलेख होता है।
- साझेदारों का अलग-अलग हिस्सा विलेख में अच्छी तरह विनिर्दिष्ट होता है।
- साझेदारी विलेख की प्रमाणित प्रति पिछले वर्ष की फर्म की विवरणी के साथ लगी हो जिस पर साझेदारी का गठन किया गया था।
- यदि पिछले वर्ष के दौरान फर्म के संगठन में परिवर्तन होता है या साझेदारों के लाभ बांटवारें के अनुपात में बदलाव होता है तो संशोधित साझेदारी विलेख की प्रमाणित प्रति पिछले वर्ष के विचाराधीन विवरणी के साथ प्रस्तुत की जाएगी।
- फर्म के निर्धारण को पूरा करने के लिए आयकर अधिकारी द्वारा दी गई सूचना का अनुपालन करते समय ुर्म की और से कोई चूक नहीं होनी चाहिए।
साझेदारी फर्म के रूप में निर्धारण करना एओपी से अधिक लाभदायक होता है चूंकि साझेदारी फर्म निम्नलिख कटौती का दावा कर सकता है जिसे एपीओ दावा नहीं कर सकता है:-
- साझेदान को भुगतान किया गया ब्याज बशर्ते कि ऐसा ब्याज साझेदारी विलेख द्वारा प्राधिकृत हो।
- साझेदार को किसी प्रकार का वेतन, बोनस, कमीशन या परिलब्धि (जो भी नाम हो) पर छूट अनुमत है यदि यह कार्यरत साझेदार को भुगतान किया जाता है जो एक व्यष्टि है।
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