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श्रमिक संघ का तात्‍पर्य, अस्‍थाई या स्‍थाई ऐसे गठजोड़ से हैं, जिसका गठन मुख्‍य रूप से कामगारों और नियोजकों अथवा कामगारों और कामगारों अथवा नियोजकों और नियोजकों के बीच संबंधों को विनियमित करने अथवा किसी व्‍यापार या कारोबार के संचालन पर प्रतिबंधात्‍मक शर्तें लगाने के प्रयोजन हेतु किया जाता है और इसमें दो या अधिक श्रमिक संघों का कोई परिसंघ शामिल है। दूसरे शब्‍दों में, श्रमिक संघ श्रमिकों के स्‍वैच्छिक संगठन हैं जिनका गठन उनके अधिकारों, हितों की रक्षा और इस प्रकार सामूहिक कार्रवाई द्वारा उनके कल्याण में वृद्धि करने के लिए किया जाता है। आईएलओ (अंतरराष्‍ट्रीय श्रम संगठन),जिसका भारत एक संस्‍थापक सदस्‍य है, की स्‍थापना ने भारत में श्रमिक संघों की स्‍थापना को बढ़ाना दिया।

श्रमिक संघों की स्‍थापना केवल कामगारों की मांगों का ध्‍यान रखने के लिए ही नहीं किया जाता है, अपितु उनमें अनुशासन और उत्तरदायित्‍व की भावना भरने के लिए भी किया जाता है। राष्‍ट्रीय श्रम आयोग (एनसीएल),श्रमिकों संघों के निम्‍नलिखित महत्‍वपूर्ण कार्य हैं :-

  • कामगारों के लिए वाजिब पारिश्रमिक हासिल करना और पदोन्नति तथा प्रशिक्षण के लिए उनके अवसरों में सुधार लाना।
  • कार्यकाल की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उनकी सेवा की शर्तों में सुधार लाना
  • कामगारों की कामकाजी और जीवनयापन की दशाओं में सुधार लाना,
  • उन्हें शैक्षणिक, सांस्कृतिक और मनोरंजन संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराना
  • कामगारों की सूझबूझ को बढ़ाकर प्रौद्योगिकीय उन्नयन में सहयोग करना और इसे सुविधाजनक बनाना।
  • उत्पादन, उत्पादकता, अनुशासन और जीवन के उच्च स्तर के स्तरों में सुधार लाने में उनकी सहायता करना
  • वैयक्तिक और सामूहिक कल्याण को बढ़ावा देना और इस प्रकार कामगारों के हितों को उद्योग के हितों से संबंद्ध करना।

भारत में श्रमिक संघों का विनियमन करने के लिए शासी कानून भारतीय श्रमिक संघ अधिनियम,1926 है। यह अधिनियम श्रमिक संघों के पंजीकरण, उनके अधिकारों, उनकी देनदारियों और उत्तरदायित्‍वों से संबंधित है और यह सुनिश्‍चित करता है कि उनकी निधियों का उपयोग समुचित ढंग से हो। इस अधिनियम का प्रशासन संबंधित राज्‍य सरकारों द्वारा किया जाता है।

इस अधिनियम में विभिन्‍न राज्‍यों में गठित ‘श्रमिक संघ रजिस्‍ट्रारों’ के पास श्रमिक संघों के पंजीकरण का प्रावधान है। श्रमिक संघ के पंजीकरण के लिए संघ के सात या अधिक सदस्‍य श्रमिक संघ रजिस्‍ट्रार के पास निर्धारित प्रथम में अपने आवेदन प्रस्‍तुत कर सकते हैं जिसके साथ ‘श्रमिक संघ की नियमावली’ की एक प्रति और निम्‍नलिखित ब्‍यौरों सहित एक विवरण लगा हो :- (क) आवेदन करने वाले सदस्‍यों के नाम, व्‍यवसाय और पते (ख) श्रमिक संघ का नाम और इसके मुख्‍य कार्यालय का पता (ग) श्रमिक संघ अधिनियम, 1926 में दिए गए प्रारूप के अनुसार श्रमिक संघ के पदाधिकारियों के शीर्षक, नाम, आयु, पते और व्‍यवसाय, यह अधिनियम पंजीकृत श्रमिक संघों को कानूनी हैसियत प्रदान करता है।'.

पंजीकृत श्रमिक संघों (कामगार और नियोजक) को उनकी सदस्‍यता, सामान्‍य निधियों, आय के स्रोत और व्‍यय की मदों तथा उनकी परिसम्‍पत्तियों और देनदारियों के बारे में रजिस्‍ट्रार को वार्षिक सांविधिक विवरणियां प्रस्‍तुत करती अपेक्षित है जो आगे अपने राज्‍य की समेकित विवरणी निर्धारित प्रोफार्मा में श्रम ब्‍यूरो, श्रम और रोजगार मंत्रालय श्रम ब्‍यूरो को प्रस्‍तुत करते हैं। श्रम ब्‍यूरो‍ विभिन्‍न राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों में वार्षिक विवरणियों प्राप्‍त होने पर, अखिल भारतीय आंकड़े समेकित करता है और प्रकाशन अपने नाम भारत में श्रमिक संघ' तथा इसके अन्‍य नियमित प्रकाशनों के माध्‍यम से इनका प्रसार करता है।

तथापि अधिक पारदर्शिता लाने और भारत में श्रमिक संघवाद को अधिक समर्थन प्रदान करने के उद्देश्‍य से इस अधिनियम में श्रमिक संघ (संशोधन) अधिनियम, 2001 द्वारा संशोधन किया हैं। श्रमिक संघ (संशोधन अधिनियम, 2001 की कुछ प्रमुख विशेषताएं निम्‍नलिखित हैं :-

  • कागमारों की किसी श्रमिक संघ का पंजीकरण तब तक नहीं किया जाएग, जब तक कि पंजीकरण के लिए आवेदन करने की तारीख को उस प्रतिष्‍ठान या उद्योग जिससे यह संबंधित है, में नियुक्‍त या नियोजित कामगारों का कम से कम 10 प्रतिशत या 100, जो भी कम हो, जो न्‍यूनतम 7 कामगार हों, इस श्रमिक संघ के सदस्‍य न हों।
  • एक पंजीकृत श्रमिक संघ में सदैव उस प्रतिष्‍ठान या उद्योग जिससे यह संबंधित है, में नियुक्‍त या नियोजित कामगारों का कम से कम 10 प्रतिशत या 100, जो भी कम हो, जिसकी संख्‍या न्‍यूनतम 7 कामगार हों, इस श्रमिक संघ सदस्‍य बने रहेंगे।
  • अपंजीकरण/पंजीकरण की बहाली के मामले में औद्योगिक न्‍यायधिकरण/न्‍यायालय के समक्ष अपील दायर करने का उपबंध किया गया है।
  • पदाधिकारियों की कुल संख्या का एक तिहाई अथवा पांच, जो भी कम हो, के अतिरिक्‍त पंजीकृत श्रमिक संघ के सभी पदाधिकारी उस प्रतिष्‍ठान या उद्योग जिससे श्रमिक संघ जुड़ा है, में वास्‍तविक रूप से नियुक्‍त या नियोजित व्‍यक्ति होगें।
  • श्रमिक संघ के सदस्‍यों द्वारा चन्‍दे की न्‍यूनतम दर ग्रामीण कामगारों के लिए एक रुपया प्रतिवर्ष, अन्‍य असंगठित क्षेत्रों में कामगारों के लिए तीन रुपया प्रतिवर्ष तथा अन्‍य सभी मामलों में 12 रुपए प्रतिवर्ष होगी।
  • इसके सदस्‍यों के नागरिक और राजैनतिक हितों के संवर्धन के लिए संघों को पृथक राजनीतिक निधियां स्‍थापित करने के लिए प्राधिकृत किया गया है।

श्रमिक संघों का निर्माण इस तरीके से किया जाएगा कि वे आर्थिक विकास के लिए राष्‍ट्रीय योजनाओं को सफल बनाने में सहायता करें, यद्यपि श्रमिक संघों का लक्ष्‍य उनके वैध अधिकारों के लिए लड़ना है, पर उन्‍हें इनका दुरुपयोग अपने स्‍वयं के प्रयोजन को पूरा करने तथा इस प्रक्रिया में असं‍गठित निर्दोष जनता को उनके अधिकारों से वंचित करने में नहीं करना चाहिए। संघों को प्रत्‍येक कामगार को यह समझाना चाहिए कि उसके कर्तव्‍य और जिम्‍मेदारियां उसके अधिकारों और विशेषाधिकारों से पहले आते हैं। इसके अलावा उन्‍हें अपने आप‍को बदलती सामाजिक जरुरतों के अनुरूप ढालने, जाति, धर्म और अन्‍य संकीर्णताओं से ऊपर उठने की आवश्‍यकता है, श्रमिक संघों के सामजिक उत्‍तरदायित्‍वों का वर्णन निम्‍न प्रकार किया जा सकता हैं :-

  • उन्‍हें राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की आवश्‍यकता है;
  • उन्‍हें विभिन्‍न स्‍तरों पर सामाजिक – आर्थिक नीतियों के निर्माण में सक्रिय भागीदारी करके इन नीतियों को प्रभावित करना चाहिए।
  • उन्‍हें अपने सदस्‍यों में संगठन और समाज आदि के प्रति उत्तरदायित्‍व की भावना भरनी चाहिए।

^ऊपर

 
संबंधित लिंक्‍स :
श्रमिक संघ अधिनियम 1926
श्रमिक संघ (संशोधन) अधिनियम, 2001
अखिल भारतीय राज्‍य सरकारी कर्मचारी परिसंघ
सार्वजनिक और संबद्ध कर्मचारियों का ट्रेड यूनियन इंटरनेशनल
 
 
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