"न्यास" एक दायित्व है जो संपत्ति के स्वामित्व के जुड़ा हुआ है और यह विश्वास रखने और स्वामी द्वारा दूसरों के लाभ या अन्य और स्वामी के लाभ हेतु स्वीकार किए जाने से या उसके द्वारा घोषणा करने और स्वीकार किए जाने के कारण उत्पन्न होता है:-
- न्यास का प्रवर्तक:- जो व्यक्ति अपना विश्वास रखता या घोषणा करता है वह "न्यास का प्रवर्तक" कहलाता है।
- न्यासी:- जो व्यक्ति विश्वास स्वीकार करता है, वह "न्यासी" कहलाता है।
- लाभानुभोगी:- जिस व्यक्ति के लाभ के लिए विश्वास स्वीकार किया जाता है वह "लाभानुभोगी" कहलाता है।
- न्यास की संपत्ति:- न्यास की विषय वस्तु "न्यास संपत्ति" या "न्यास मुद्रा" कहलाती है।
- न्यास की लिखत:- लिखत यदि कोई हो जिसके द्वारा न्यास की घोषणा की जाती है वह "न्यास की लिखत" कहलाती है।
सार्वजनिक या निजी न्यास
सार्वजनिक न्यास का गठन सामान्यत: धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजनों से किया जाता है और उनका लक्ष्य वाणिज्यिक कार्यकलाप करना नहीं होता हैं। सार्वजनिक धमार्थ न्यास वह है जो बड़ी संख्या में जनता को लाभ पहुँचाता है या इसके कुल उल्लेखनीय भाग को लाभ देता है। जबकि निजी न्यास से अन्य विशिष्ट लाभनुभोगियों को उपलब्ध होता है न कि जन सामान्य को।
धर्मार्थ न्यास की परिभाषा निर्धनों की राहत, शिक्षा चिकित्सा राहत और सामान्य जनता के उपयोग के अन्य किसी अन्य किसी वस्तु के विकास को शामिल करने के लिए दी गई है। खेलकूद और खेल का संवर्धन धर्मार्थ प्रयोजन का समझा जाता है।
सार्वजनिक या निजी न्यास अपने सृजन की प्रक्रिया में अलग-अलग होते हैं। धर्मार्थ या धार्मिक न्यास के सृजन में औपचारिक दस्तावेजीकरण या अन्य लिखित रूप की आवश्यकता नहीं होती है यद्यपि इसमें अचल संपत्ति शामिल रहती है। इसका सृजन शब्दों का उपयोग करके किया जाता है परन्तु जो आवश्यक है वह यह कि प्रवर्तक या न्यास के संस्थापक की ओर से संपत्ति का अधिकार हरण होता है और न्यासी तृतीय व्यक्ति को दिया जाना चाहिए।
निजी न्यास का सृजन और अभिशासन भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 , के उपबंधों द्वारा होता है जबकि धर्मार्थ न्यास इस अधिनियम के दायरे के बाहर रहते हैं। यह अधिनियम के दायरे के बाहर रहते हैं। यह अधिनियम जब किसीराज्य सरकार द्वारा विशिष्ट रूप से संशोधित किया जाए, को छोड़कर पूरे भारत में लागू होता है।
न्यास, चाहे सार्वजनिक हो या निजी, परन्तु इसका कराधान आयकर अधिनियम, 1961 के तहत होता है। यह आयकर संबंधी सभी मामलों के संबंध में मुख्य अधिनियम है और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को नियम बनाने
( आयकर नियमावली, 1962 ) अधिनियम के प्रावधानों को कार्यान्वित करने के लिए शक्ति प्रदान करता है। सीबीडीटी राजस्व विभाग, वित्त मंत्रालय का भाग है। इसे भारत में विभिन्न आयकर विभाग प्रत्यक्ष कर से संबंधित मामलों की जिम्मेदारी सौंपी गई है और यह द्वारा प्रत्यक्ष कर कानूनों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। आयकर अधिनियम का वित्त अधिनियम द्वारा वार्षिक संशोधन किया जाता है जिसमें आयकर की दरों और इसी वर्ष के लिए अन्य करों का उल्लेख किया जाता है।
अधिक जानकारी के लिए हमारे 'कराधान' खंड को देखें।
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