भारत में विदेशी भारतीयों के महत्व को समझते हुए भारत सरकार द्वारा उन्हें भारत वापस लाने, उनकी शिकायतों के निपटान, उन्हें अधिक से अधिक निवेश के अवसर और सुविधाएं आदि देने के लिए कई कदम उठाए जाते हैं। भारत में विदेशी भारतीयों के मामलों से निपटने के लिए, जिसमें भारतीय मूल के व्यक्ति और अनिवासी भारतीय शामिल है, 'विदेशी भारतीय कार्य मंत्रालय' है। मंत्रालय द्वारा 'विदेशी भारतीय सुविधा केन्द्र (ओआईएफसी)' का गठन भी मंत्रालय द्वारा भारतीय उद्योग संघ (सीआईआई) के साथ सार्वजनिक - निजी भागीदारी में किया गया है। यह केन्द्र विदेश में रहने वाले भारतीयों के हितों की रक्षा के लिए 'एकल बिंदु' के तौर पर कार्य करता है। इसके अलावा वित्त मंत्रालय विदेशी भारतीयों से संबंधित वित्तीय पक्षों के साथ कार्य करता है। भारतीय निवेश केन्द्र एक स्वायत्त निकाय है जो वित्त मंत्रालय के अधीन कार्य करता है, विदेशी निजी निवेश को प्रोत्साहन देने के साथ अनिवासी भारतीयों, भारतीय मूल के व्यक्तियों तथा विदेशी नैगम निकायों द्वारा किए गए निवेश से संबंधित कार्य करता है।
भारत में विदेशी मुद्रा के सभी लेन देन सहित विदेश में किए गए निवेश को विनियमित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कानून विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) 1999 है। एक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) नीति है जो भारत में विदेशी निवेश के विभिन्न पक्षों का नियंत्रण करती है। इस नीति का लक्ष्य भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी अनुमत क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करना है जो विदेशी तथा विदेश में रहने वाले निवेशकों द्वारा किए जाते हैं। विदेशी निवेश के लिए दो अनुमत मुख्य मार्ग हैं, उदाहरण के लिए स्वचालित मार्ग और शासकीय मार्ग। अनिवासी भारतीयों और भारतीय मूल के व्यक्तियों को विदेश से वापस भेजे गए धन, विदेश से लाई गई विदेशी मुद्रा या भारत में उन्हें कानूनी रूप से देय धन राशि से बैंक खाता खोलने की अनुमति भी है।
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