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व्‍यापारी संगठन के स्‍वरूप का चयन:
सहकारी समितियां
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सहकारी संगठन एक समिति होती है जिसका उद्देश्‍य सहयोग के सिद्धांतों के अनुसार अपने सदस्‍यों के हितों का संवर्धन करना होता है। यह दस या अधिक सदस्‍यों का स्‍वैच्छिक संगठन है जो एक ही स्‍थान पर निवास करते या कार्य करते है, जो अपने आर्थिक या व्‍यापारी हित को पूरा करने के लिए समानता के आधार पर संयुक्‍त होते है। मूल विशेषता जो सहकारी समितियों को व्‍यापारी स्‍वामित्‍व के अन्‍य स्‍वरूपों से अलग करती हैं वह यह है कि इसका प्राथमिक लक्ष्‍य सदस्‍यों को सेवा देना न कि लाभ कमाना है।

विभिन्‍न प्रकार की सहकारिताएं हैं जैसे उपभोक्‍ता सहकारी समितियां, उत्‍पादक सहकारी समितियां, विपणन सहकारी समितियां, आवास सहकारी समितियां, ऋण सहकारी समितियां, कृषि सहकारी समितियां आदि। ऐसी सभी सहकारी समितियों को उद्देश्‍य अपने सदस्‍यों का कल्‍याण करना है। इसकी मुख्‍य विशेषताएं निम्‍नलिखित हैं :-

  • यह स्‍वैच्छिक संगठन है चूंकि सदस्‍य समिति छोड़ने के लिए स्‍वतंत्र है और वह सूचना देने के बाद अपनी पूंजी किसी भी समय वापस ले सकता है।

  • सदस्‍यों की कम से कम संख्‍या 10 होती है परन्‍तु सदस्‍यों की अधिकतम संख्‍या की कोई सीमा नहीं है। तथापि, सदस्‍यों को एक ही स्‍थान पर निवास या कार्य करना है।

  • सहकारी उद्यम का पंजीकरण अनिवार्य है। एक सहकारी समिति का पंजीकरण सहकारी समितियों के पंजीयक द्वारा पंजीकृत की जाएं।

  • सहकारी उद्यमों को पंजीकृत करने के पश्‍चात निकाय निगम अपने सदस्‍यों से स्‍वतंत्र हो जाती है अर्थात एक अलग कानूनी कम्‍पनी बन जाती है।

  • यह सहकारी समिति अधिनियम 1912 या राज्‍य सहकारी समिति अधिनियम के उपबंधों के अधीन होती है। इसे वार्षिक प्रतिवेदन और लेखा समिति पंजीयक को भेजना होता है।

  • प्रत्‍येक सदस्‍य की क्षमता सीमित होती है यह उसके पूंजी अंशदान की सीमा तक होती है।

  • सहकारी समिति के शेयरों को अंतरित नहीं किया जा सकता हैं परन्‍तु उन्‍हें समिति को वापस किया जा सकता है यदि सदस्‍य अपनी सदस्‍यता वापस लेना चाहता है।

  • एक अलग कानूनी कम्‍पनी होने की वजह से सहकारी समिति का अस्तित्‍व जारी रहता है जो सदस्‍यों की मृत्‍यु, दिवालियापन, सेवानिवृत्ति आदि से प्रभावित नहीं होती है।

फायदे

  • पूंजी की अधिक राशि
  • उचित कीमत, गुणवत्ता और बेहतर सेवा
  • कर्मचारियों के लिए सेवा की बेहतर स्थिति
  • अस्तित्‍व का जारी रहना
  • सीमित दायित्‍व

ख़ामियां

  • पर्याप्‍त पूंजी संग्रहण करने में अक्षमता
  • सक्षम प्रबंधकीय सेवाएं देने के लिए अक्षमता
  • संगठनात्‍मक सीमाएं।

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