अच्छा पर्यावरण भारतीय नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। पर्यावरणीय रक्षा को संवैधानिक दर्जा दिया गया है। राज्य के नीति निदेशक तत्व ध्यान रखते हैं कि ''पर्यावरण की रक्षा और उसमें सुधार करना और वनों एवं देश के वन्य जीवन की रक्षा करना राज्य का कर्त्तव्य है। यह प्रत्येक नागरिक में मौलिक कर्त्तव्य अभिरोपित करता है कि वन झील, नदियां और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना है।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय , पर्यावरण को विनियमित करने वाली नोडल एजेंसी है। देश में पर्यावरणीय नीति ढांचा तैयार करने का कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी है। यह जीव जन्तु पौधे जंगल और वन्य जीवन का संरक्षण और सर्वेक्षण करता है; प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण, डिग्रेडेड क्षेत्रों का वनरोपण एवं पुनसर्जन करता है।.
केन्द्रीय सरकार ने पर्यावरणीय विनियमन से संबंधित अनेकानेक कानूनों का अधिनियमन किया है, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं :-
पर्यावरण (रक्षा) अधिनियम 1986
यह एक व्यापक विधान है इसकी रूप रेखा केन्द्रीय सरकार के विभिन्न केन्द्रीय और राज्य प्राधिकरणों के क्रियाकलापों के समन्वयन के लिए तैयार किया गया है जिनकी स्थापना पिछले कानूनों के तहत की गई है जैसाकि जल अधिनियम और वायु अधिनियम। मानव पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने एवं पेड़-पौधे और सम्पत्ति का छोड़कर मानव जाति को आपदा से बचाने के लिए ईपीए पारित किया गया, यह केन्द्र सरकार का पर्यावरणीय गुणवत्ता की रक्षा करने और सुधारने, सभी स्रोतों से प्रदूषण नियंत्रण का नियंत्रण और कम करने और पर्यावरणीय आधार पर किसी औद्योगिक सुविधा की स्थापना करना/संचालन करना निषेध या प्रतिबंधित करने का अधिकार देता है।
ईपीए की संभावना व्यापक है पर्यावरण की परिभाषा में जल, वायु, भूमि और जल, वायु, भूमि और मानव जाति के और अन्य जीवित जीव-जन्तु वनस्पति, सूक्ष्म जीव एवं सम्पत्ति के बीच मौजूद परस्पर संबंध शामिल है। कानून आपदा जनक अपशिष्ट आपदाजनक अपशिष्ट प्रबंधन और प्रचालनों संबंधी भी नियम लागू करता है। अधिनियम में संचालकों, प्राधिकृत करने की परिस्थितियां, निपटान स्थलों की स्थितियां, आपदाजनक अपशिष्ट आयात करने के नियमों, दुर्घटनाओं की सूचना देना, पैकेजिंग और लेबलिंग अपेक्षाएं और संभावित संचालकों के लिए अपील करने की प्रक्रिया जिन्हें प्राधिकृत नहीं किया गया है, को भी पारिभाषित किया गया है। नियमों के विनिर्माण आपदाजनक और नशीले रसायनों का भण्डारण और आयात सूक्ष्म जीवों, प्रजनन रूप से इंजीनियरिंग जीवों या सेलों पर लागू किया गया है।
सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम और नियम तथा संशोधन, 1992
यह अधिनियम, किसी आपदाजनक तत्वों का संचालन करते समय होने वाली दुर्घटना द्वारा पीड़ित व्यक्तियों को राहत पहुंचाने के प्रयोजन से सार्वजनिक दायित्व बीमा प्रदान करने हेतु पारित किया गया है।
राष्ट्रीय पर्यावरणीय न्ययाधिकरण अधिनियम, 1995
इसका सृजन आपदाजनक तत्वों के किसी क्रियाकलाप से व्यक्तियों सम्पत्तियों और पर्यावरण को होने वाली हानियों के लिए प्रतिपूर्ति देने हेतु किया गया है।
राष्ट्रीय पर्यावरणीय अपीलीय प्राधिकरण अधिनियम, 1997
इसका सृजन क्षेत्रों के संबंध में जहां कई श्रेणियों के उद्योग आदि चलाए जाते हैं या ईपीए के अधीन कुछ सुरक्षा के निर्धारित विषयों के संबंध में अपीलों की सुनवाई करने के लिए किया गया है।
वायु
वायु प्रदूषण संबंधित अधिनियमों का लक्ष्य वायु प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और उपशमन करना है।
- वायु (रोकथाम एवं प्रदूषण नियंत्रण) अधिनियम, 1987
- वायु (प्रदूषण की रोकथाम और इसका नियंत्रण) संशोधन अधिनियम 1987, केन्द्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को वायु प्रदूषण संबंधी गम्भीर आकस्मिकताओं से निपटने के लिए प्राधिकृत करना है।
- वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 वायु प्रदूषण के नियंत्रण एवं उपशमन की व्यवस्था करता है। यह इस अधिनियम को लागू करने का अधिकार सीपीसीबी को सौंपता है।
- वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) नियमावली, 1982, बोर्ड की बैठकों और उनको सौंपी गई शक्तियों की प्रक्रिया पारिभाषित करता है।
शोर
इस नियम का उद्देश्य विभिन्न स्रोतों से अन्य बातों के साथ-साथ औद्योगिक क्रियाकलाप, निर्माण कार्यकलाप, जेनरेटर सैट, लाउडस्पीकर जन सम्बोधन प्रणाली, म्यूजिक सिस्टमों, वाहनों के हॉर्न और अन्य यांत्रिकीय उपकरणों जिनका अवैद्युतीय प्रभाव मानव स्वास्थ्य और मनोवैज्ञानिक खुशहाली पर है से सार्वजनिक स्थलों में ध्वनि स्तर पर नियंत्रण करना है।
- ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) (संशोधन) नियमावली, 2002
वन
वन संरक्षण अधिनियम सार्वजनिक और निजी वनों पर राज्य का क्षेत्राधिकार देते हैं और लाभ के लिए इमारती लकड़ी के निष्कर्षण को सुकर बनाता है। ये वन संरक्षण अधिनियम वन भूमि या वन उत्पादों के विधिक मान्यताप्राप्त व्यष्टि या सामुदायिक अधिकारों की प्रतिरक्षा और प्रतिपूर्ति की व्यवस्था करता है।
- वन सरंक्षण अधिनियम, 1980
- भारतीय वन अधिनियम और संशोधन, 1984 अनेक उत्तरजीवी उपनिवेशिक स्थिति में एक है। इसका अधिनियमन वन, वन उत्पाद का प्रेषण, और इमारती लकड़ियों एवं अन्य वन्य उत्पाद पर लगाए जाने वाले शुल्क के संबंध में कानून समेकित करने के लिए किया गया।
- वन (संरक्षण) अधिनियम और नियमावली, 1981 वन की रक्षा और संरक्षण की व्यवस्था करत हैं।
जोखिमपूर्ण पदार्थ
जोखिमपूर्ण पदार्थ तत्वों में ज्वलनशील पदार्थ, विस्फोटक, भारी धातुएं जैसाकि सीसा, संखिया और पारा, नाभिकीय और पेट्रोलियम ईंधन के उत्पाद, खतरनाक सूक्ष्म जैव और अनेकों सिन्थेटिक रसायन उत्पाद जैसे डीडीटी और टॉक्सिन शामिल हैं। नशीली पदार्थों के सम्पर्क में आने से बहुत अधिक या क्रोनिक स्वास्थ्य प्रभाव पड़ता है। नशीले पदार्थ व्यापक रूप से भारत में विनियमित होते हैं। नशीले तत्वों की समस्या से निपटने के लिए प्रथम व्यापक नियमावली अर्थात जोखिमपूर्ण पदार्थ अपशिष्ट, केन्द्र सरकार द्वारा जुलाई 1989 में जारी की गई। रेडियो एक्टिव अपशिष्ट को परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के अंतर्गत रखा गया और जहाजों से उत्सर्ज अपशिष्टों को 1958 मार्चेन्ट शिपिंग अधिनियम के अधीन रखा गया, इनको स्पष्ट रूप से जोखिमपूर्ण पदार्थ अपशिष्ट नियमों से अलग रखा गया।
- जोखिमपूर्ण पदार्थ अपशिष्ट (प्रबंधन और संचालन) नियमावली, 1989, जोखिमपूर्ण पदार्थ अपशिष्ट के सृजन, संग्रहण, उपचार, आयात, भण्डारण और संचालन का नियंत्रण करने के लिए।
- जैव चिकित्सा अपशिष्ट (प्रबंधन और संचालन) नियमावली, 1998, स्वास्थ्य संबंधी संस्थाओं के लिए अस्पताल के अपशिष्ट के उचित संचालन की प्रक्रिया को दुरुस्त बनाने के लिए जैसे कि पृथक्करण, निपटान, संग्रहण और उपचार।
- नगर पालिका ठोस अपशिष्ट (प्रबंधन और संचालन) नियमावली, 2000 प्रत्येक नगर पालिका प्राधिकरण के लिए लागू होता है जो नगर पालिका ठोस अपशिष्ट के संग्रहण पृथक्करण, भण्डारण परिवहन, प्रक्रियान्वयन और निपटान के लिए जिम्मेदार है।
- बैटरीज (प्रबंधन और संचालन) नियमावली 2001 के नियम प्रत्येक विनिर्माता, आयातक, पुन: वातानुकूलक, संग्रहक, व्यापारी, नीलामी दाता, उपभोक्ता और भारी मात्रा में उपभोक्ता जो बैटरी या संघटकों के विनिर्माण, प्रक्रियान्वयन, बिक्री, खरीद और उपयोग में रत हैं, पर लागू होते हैं ताकि प्रयुक्त बैटरी का पर्यावरणीय सुरक्षा की दृष्टि से निपटान और सुनिश्चित किया जा सके।
- जोखिमपूर्ण पदार्थ वस्तुओं का विनिर्माण, भण्डारण और आयात नियमावली 1989 इस संदर्भ में दिए गए शब्दों को पारिभाषित करती है और वर्ष में एक बार जोखिमपूर्ण पदार्थ रसायनों और पृथक भण्डारण सुविधाओं से संबंधित औद्योगिक कार्यकलापों का निरीक्षण करने के प्राधिकरण की स्थापना करती है।
- विनिर्माता, उपयोग, आयात-निर्यात और भण्डारण जोखिमपूर्ण पदार्थ सूक्ष्म जैविक/जैविक इंजीनियर जैव या सेल नियमावली 1989 को पर्यावरण, प्राकृति और स्वास्थ्य को जीन प्रौद्योगिकी और माइक्रोऑरगानिज्म के अनुपयोग के संबंध में रक्षा करने के लिए पुन:स्थापित की गई।
- पर्यावरण (औद्योगिक परियोजना के लिए स्थल निर्धारण) नियमावली 1999 में औद्योगिक विकास परियोजनाओं के कार्यान्वयन के दौरान उद्योग के लिए स्थल निर्धारण करने में छोड़े जाने वाले क्षेत्रों, स्थल चयन में सावधानी के उपायों तथा पर्यावरणीय रक्षा की पहलुओं संबंधित प्रावधान शामिल किए गए हैं।
- भारतीय मत्स्यिकी अधिनियम, 1897 दो तरह से दांडिक अपराध विनिर्दिष्ट करता है, जिनके द्वारा सरकार किसी व्यक्ति पर अभियोग लगा सकती है जो डायनामाइट या अन्य विस्फोटक तत्व किसी भी तरह से (चाहे तटीय या अंतर्देशीय) किसी मछली को पकड़ने या नष्ट करने के लिए उसे मारने के लिए विष पदार्थ का उपयोग करता है।
- मार्चेन्ट शिपिंग अधिनियम, 1970 का उद्देश्य विनिर्दिष्ट परिधि के भीतर तटीय क्षेत्रों में जहाजों से निकलने वाले अपशिष्ट का निपटान करना है।
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में कहा गया है कि सभी जोखिमपूर्ण पदार्थ अपशिष्टों को अच्छी तरह पैक किया जाए, लेबल लगाया जाए और उनको एक जगह से दूसरी जगह लाया या लिया जाए।
- परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1982, रेडियोएक्टिव अपशिष्ट से संबंधित है।
- रिवर बोर्ड अधिनियम, 1956
- तटीय क्षेत्र संबंधित अधिनियम
जैव वैज्ञानिक विविधता अधिनियम, 2002
यह अधिनियम जैव विविधता को संरक्षण, इसके संघटकों को स्थायी उपयोग, और जैव संसाधनों से उत्पन्न लाभों का एक समान और उचित बंटवारा और इससे संबंधित जानकारी प्रदान करने के लिए है।
जल
जल प्रदूषण संबंधी अधिनियम अपने विस्तार में व्यापक हैं जो झरने, अंतर्देशीय जल, उप-भूखंडीय जल और समुद्र या लहर जल के लिए लागू होते हैं। निस्सरण के निपटान के लिए मानक या प्राप्त होने वाले जल की गुणवत्ता अधिनियम में विनिर्दिष्ट नहीं है। इसके बजाए ये अधिनियम राज्य बोर्डों को इन मानकों को निर्धारित करने में समर्थ बनाते हैं। ये अधिनियम जल प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण के लिए अनुमति सिस्टम या सहमत प्रक्रिया भी मुहैया कराते हैं। ये अधिनियम साधारणत: नदियों, कुओं और जल मल निकासियों में प्रदूषण सामग्रियों का निपटान का निषेध करते हैं या भूमि पर भी राज्य बोर्डों द्वारा रखे गए मानकों से अधिक को प्रतिबंधित करते है। किसी उद्योग की स्थापना करने, प्रचालन या प्रक्रिया, किसी प्रकार का उपचार और निपटान सिस्टम या ऐसे सिस्टम में किसी विस्तार या जुड़ाव जिसके परिणामस्वरूप जल मल निकासी में निपटान या नदी, कुआं सिवर या भूमि पर निस्सरण के पहले व्यक्ति को राज्य बोर्ड से मंजूरी लेनी होती है।
औद्योगिक प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार कार्यापालक प्राथमिक रूप से केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा केन्द्रीय स्तर पर किया जाता है जो सांविधिक प्राधिकरण है जो एमओईएफ से संबद्ध है। राज्य पर्यावरण विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्राधिकृत एजेंसियां हैं ये राज्य स्तर पर कार्य करते हैं।
पर्यावरण संबंधी मानक
केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने जल (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम 1974 और वायु (प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के सांविधिक शक्ति के अधीन निस्सरण और उत्सर्ग के लिए राष्ट्रीय मानक विकसित किया है। इन मानकों को भारत सरकार द्वारा अनुमोदित और अधिसूचित किया गया है इन्हें पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत पर्यावरण (रक्षा) अधिनियम, 1986 की धारा 25 के अध्याधीन किया गया है। अब तक 37 वर्गों के उद्योगों के लिए निस्सरण मानक और 31 वर्गों के उद्योगों के लिए उत्सर्ग मानक विकसित और अधिसूचित किया गया है। इसके अतिरिक्त परिवेशी वायु गुणवत्ता, परिवेशी ध्वनि, ऑटोमोबाइल और ईंधन गुणवत्ता, पेट्रोल और डीजल के लिए विनिर्दिष्ट किए गए हैं। अस्पताल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए दिशानिर्देश अलग से विकसित किए गए हैं।
पर्यावरण संबंधी प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रभाग
पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआरए) एक ऐसा साधन है जो मुख्य कार्यकलाप (नीति, योजना, कार्यक्रम या परियोजना) से उत्पन्न होने वाले उन प्रभावों के मूल्यांकन के जरिए स्थायी विकास सुनिश्चित करना चाहता है जिनके महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रभाव पड़ने की संभावना है।
ईआईए के लिए परियोजना विषय
क्या ईआईए अपेक्षित है या नहीं, इस पर आधारित तीन श्रेणी की परियोजनाएं हैं जो मंजूरी के लिए जिम्मेदारी है।
श्रेणी 1 :- इसमें ऐसी परियोजनाएं शामिल हैं जहां ईआईए अनिवार्य है और इसके लिए केन्द्रीय सरकार से मंजूरी अपेक्षित है। 30 श्रेणी के उद्योग हैं जिन्हें मोटे तौर पर उद्योग के क्षेत्रकों, खनन, ताप विद्युत संयंत्र, नदी, घाटी, पत्तनों, बंदरगाहों और हवाई अड्डों, संचार, परमाणु ऊर्जा, परिवहन (रेल, सड़क, राजमार्ग) पर्यटन (जिसमें होटल, बीच रिसोर्ट्स शामिल हैं) वर्गों में बांटा जाता है।
श्रेणी 2:- केन्द्रीय सरकार ने अधिसूचित किया है (दिनांक 10 अप्रैल 1997, सं. एस. ओ. 319 ई) कि कुछ श्रेणी के ताप विद्युत संयंत्र अर्थात सभी क्षमता सह उत्पादन संयंत्र, कैप्टिव कोयला और गैस। नाफथा आधारित विद्युत संयंत्र 250 मेगावॉट तक, कोयला आधारित विद्युत संयंत्र 250 मेगावॉट तक जो पारम्परिक प्रौद्योगिकियों का उपयोग करते हैं, कोयला आधारित संयंत्र 500 मेगावॉट तक जो द्रवीकृत बेड प्रौद्योगिकी का उपयोग करत हैं और गैस/नाफथा आधारित संयंत्र 500 मेगावॉट तक के लिए राज्य सरकार से मंजूरी की आवश्यकता है।
श्रेणी 3 :- इन परियोजनाओं के लिए ईआईए अनिवार्य नहीं है।
परियोजना प्रस्तावकों के लिए ईआईए के दिशा निर्देश
परियोजना प्रस्तावकों को ईआईए तैयार करने में सहायता करने के लिए एमओईएफ ने पर्यावरणीय दिशानिर्देश तैयार किया है। पर्यावरणीय मंजूरी के लिए अपेक्षित पर्यावरण संबंधी विशिष्ट सूचना देने के लिए दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं। एजेंसियां, जो संबंधित क्षेत्रों के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार हैं, वे दिशानिर्देश तैयार करने में अच्छी तरह शामिल हैं। नदी घाटी परियोजनाएं, ताप विद्युत परियोजनाएं, खनन परियोजनाएं और उद्योग, पत्तन और बंदरगाह, बीचों का विकास राजमार्ग/रेल सड़क परियोजनाएं ऐसे क्षेत्रक हैं, जिनके लिए पहले ही दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं। इन दिशानिर्देशों में मूल रूप से विकास परियोजनाओं की योजना एवं क्रियान्वयन के संबंध में पहलुएं शामिल हैं। भारत में अधिकांश परियोजनाएं जिनके लिए ईआईए की आवश्यकता है, वे बड़े विकासात्मक परियोजनाएं हैं जैसे नाभिकीय विद्युत, नदी घाटी, ताप विद्युत संयंत्र आदि, जहां सरकार महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
पर्यावरण संबंधी विनियमों पर बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न |