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संयुक्त हिन्दू परिवार का व्यापार एक विशिष्ट प्रकार का संगठन है जो भारत में अद्वितीय है। यहां तक कि भारत के भीतर इसका अस्तित्व केवल कुछ ही भागों तक सीमित है। इस स्वरूप के व्यापारी स्वामित्व में हिन्दू अविभाजित परिवार के सभी सदस्य, परिवार के मुखिया के नियंत्रणाधीन संयुक्त रूप से रूप कार्य करते हैं। इस प्रकार से संयुक्त हिन्दू परिवार का फर्म व्यापार के स्वामी हिन्दू अविभाजित सम्पदा के सह-परसेनर्स होते हैं। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं :-
- यह हिन्दू विधि के कार्यचालन से अस्तित्व में आता है और संविदा के फलस्वरूप नहीं। सहभागी के अधिकार और दायित्व हिन्दू विधि के सामान्य नियमों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।
- इस प्रकार के कारोबार की सदस्यता परिवार से जन्म की स्थिति के कारण होती हैं और इसकी वैधता अवयस्कता से प्रभावित नहीं होती है। मूलत: पुरूषों में केवल तीन अनुवर्ती पीढ़ियां (दादा, पिता और पुत्र) इस संगठन के सदस्य होते थे। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम द्वारा दिवंगत सदस्य की महिला रिश्तेदार और ऐसी महिला सदस्य के पुरूष सदस्य को संबंधित सदस्य के हित में भागीदार का पात्र बनाया जाता था (जो सहभागी कहलाता है) उसकी मृत्यु के समय पर। सदस्यों के अधिकतम सदस्यों की संख्या के लिए कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है।
- पंजीकरण अनावश्यक, परन्तु ऋण बकाया के लिए तृतीय पक्ष पर अभियोग लगाने का सदस्यों का अधिकार प्रभावित नहीं होता है।
- यह कर्ता के द्वारा साधारणत: प्रबंध किया जाता है। उसे परिवार की सम्पत्ति के एवज में या अन्य किसी साधनों के द्वारा ऋण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। अन्य सदस्यों को प्रबंधकीय अधिकार प्राप्त नहीं है न ही संयुक्त परिवार की सम्पत्ति को बंधक रखकर ऋण संविदा करने का अधिकार है।
- सभी नीतियों के निर्माण और उनके निष्पादन में प्रबंधक या कर्ता का निर्णय अंतिम होता है। परिवार के कारोबार के प्रचालन में उससे प्रश्न नहीं किया जा सकता है।
- कर्ता का दायित्व असीमित होता है जबकि अन्य सदस्यों का दायित्व संयुक्त परिवार में उनके व्यष्टि हित के मूल्य तक सीमित होता है।
- फर्म का अस्तित्व जारी रहता है चूंकि यह सहभागी या कर्ता की मृत्यु या दिवालियापन से प्रभावित नहीं होता है। इस प्रकार सार्वजनिक लिमिटेड कम्पनी की तरह ही इसका जीवन सतत है।
फायदे
- संगठन की सुविधा
- कार्यचालन की सततता
ख़ामियां
- यह संयुक्त हिन्दू परिवार तक सीमित है।
- अपेक्षाकृत सीमित पूंजी
- सीमित प्रबंधकीय क्षमता
- कर्ता का असीमित दायित्व
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^ ऊपर
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