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व्‍यापार आरंभ करने हेतु वित्तपोषण:
पूंजी जुटाने की प्रविधियां
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कम्‍पनी विभिन्‍न प्रयोजनों के लिए निधियां जुटाती है जो समय अवधि पर निर्भर करता है जिसकी अवधि बहुत छोटी से बहुत लम्‍बी तक होती है। कम्‍पनी की वित्तीय आवश्‍यकताओं की कुल राशि व्‍यापार की प्रकृति और आकार पर निर्भर करती है। निधि जुटाने की संभावना उन स्रोतों पर निर्भर है जहां से निधि उपलब्‍ध होती है। एकल स्‍वामित्‍व और साझेदारी स्‍वरूप के व्‍यापार के पास निधियां जुटाने के सीमित अवसर होते हैं। वे निम्‍न साधनों द्वारा अपने व्‍यापार का वित्त पोषण कर सकते हैं :-

  • अपनी स्‍वयं की बचतों का निवेश
  • मित्रों और रिश्‍तेदारों से ऋण
  • वाणिज्यिक बैंकों से अग्रिम की व्‍यवस्‍था करना
  • वित्त कम्‍पनियों से उधार

कम्‍पनी असंख्‍य तरीके से वित्त जुटा सकती है। दीर्घावधिक और मध्‍यावधिक पूंजी जुटाने के बारे उनके पास निम्‍नलिखित विकल्‍प हैं :-

शेयर निर्गम करना

यह अति महत्‍वपूर्ण प्रविधि है। शेयरधारकों का दायित्‍व शेयरों के अंकित मूल्‍य तक सीमित होता है और वे आसानी से अंतरित किए जा सकते हैं। निजी कम्‍पनी जनता को अपनी शेयर पूंजी खरीदने के लिए आमंत्रित नहीं कर सकती है और शेयरों का अंतरण स्‍वतंत्र रूप से नहीं किया जा सकता है। परन्‍तु सार्वजनिक लिमिटेड कम्‍पनियों के लिए ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। शेयर दो प्रकार के है :-

  • इक्विटी शेयर – इन शेयरों पर लाभांश की दर उपलब्‍ध लाभ और निदेशन के विवेक पर निर्भर करती है। इसलिए कम्‍पनी पर कोई नियत भार नहीं होता है। प्रत्‍येक शेयर पर एक वोट होता है।

  • अधिमान शेयर : इन शेयरों पर लाभांश नियत दर पर भुगतान किया जाता है और लाभ होने की दशा में ही देय है। इसलिए कम्‍पनी के वित्त पर कोई अनिवार्य भार नहीं होता है। ऐसे शेयरों के लिए मताधिकार नहीं दिया जाता है।

डिबेन्‍चरों का निर्गम

साधारणत: कम्‍पनियों के पास उधार लेने और डिबेन्चर जारी करके ऋण जुटाने का अधिकार है। डिबेन्चरों पर देय ब्‍याज दर निर्गम के समय नियत होती है और कम्‍पनी की सम्‍पत्ति या परिसम्‍पत्ति पर प्रभार के द्वारा वसूल किया जाता हैं जो भुगतान के लिए आवश्‍यक जमानत प्रदान करती है। कम्‍पनी लाभ न होने की स्थिति में भी ब्‍याज अदा करती है। डिबेन्‍चर अधिकांश कारोबार का दीर्घावधिक आवश्‍यकताओं का वित्तपोषण करने के लिए जारी किए जाने हैं और इसके लिए मताधिकार नहीं मिलता है।

वित्तीय संस्‍थाओं से ऋण

दीर्घा‍वधिक और मध्‍यावधिक ऋण कम्‍पनियों द्वारा वित्तीय संस्‍थाओं से प्राप्‍त किया जा सकता है, जैसे भारतीय औद्योगिक वित्त निगम, भारतीय औद्योगिक ऋण और निवेश निगम (आईसीआईसीआई) , राज्‍य स्‍तरीय औद्योगिक विकास निगम आदि। ये वित्तीय संस्‍थाएं अनुमोदित योजनाओं या परियोजनाओं के लिए अधिकतम 25 वर्ष की अवधि के लिए ऋण देती हैं स्‍वीकृति हेतु सहमत ऋण, की पूर्ति कम्‍पनी की सम्‍पत्तियों या स्‍टॉकों शेयरों, स्‍वर्ण आदि को रेहन रखने के ज़रिए जमानत द्वारा की जाती है।

वाणिज्यिक बैंकों से ऋण

मध्‍यावधिक ऋण कम्‍पनियों द्वारा वाणिज्यिक बैंकों से सम्‍पत्ति और परिसम्‍पत्तियों की जमानत पर लिया जा सकता है। परिसम्‍पत्तियों के आधुनि‍कीकरण और पुनरूद्धार के लिए अपेक्षित निधियां बैंको से उधार ली जा सकती है। वित्त पोषण की यह प्रविधि के लिए परिसम्‍पत्ति पर रेहन सृजन के अलावा किसी प्रकार की कानूनी औपचारिकता की आवश्‍यकता नहीं होती है।

वित्त के स्रोत 'उप खंड' में अधिक ब्‍यौरा सन्निहित होगा।

सार्वजनिक जमा

कम्‍पनी बहुधा अपने शेयरधारकों, कर्मचारियों और आम जनता को कम्‍पनी में अपनी बचतें जमा करने के लिए आमंत्रित करके निधियां जुटाती है। कम्‍पनी अधिनियम एक बार में 3 वर्ष की अवधि के लिए प्राप्‍त किए जाने वाली ऐसी जमाओं को अनुमत करता है। सार्वजनिक जमाएं अपनी मध्‍यावधिक तथा अल्‍पावधिक वित्तीय आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए कम्‍पनी द्वारा जुटाई जाती है। निम्‍नलिखित कारणों से सार्वजनिक जमा की लोकप्रियता बढ़ रही है :

  • बैक – ऋण की अपेक्षा उनके लिए कम्‍पनी को देय ब्‍याज दर कम है।
  • ये बैंकों की अपेक्षा निधियां जुटाने को सरलतम प्रविधियां हैं विशेषकर ऋण के अभाव की अवधियों में
  • वे असुरक्षित हैं।
  • वाणिज्यिक बैंकों के विपरीत ऋण प्राप्‍त करने के लिए कम्‍पनी को ऋण क्षमता संतुष्‍ट करने की आवश्‍यकता नहीं होती है।

लाभों का पुनर्निवेशन

लाभार्जक कम्‍पनियां लाभांश के रूप में लाभ की सम्‍पूर्ण राशि का वितरण नहीं करती हैं परन्‍तु कुछ अंश प्रारक्षित में अंतरिक्ष कर देती हैं। इन्‍हें लाभों का पुनर्निवेशन या लाभों को फिर से कार्य में लगाना समझा जाता है। चूंकि ये अपने पास रखे गए लाभ कम्‍पनी के शेयरधारकों के लिए होते हैं इन्‍हें स्‍वामित्‍व पूंजी के भाग के रूप में माना जाता है। लाभों को अपने पास रखना व्‍यापार के स्‍व वित्त पोषण का तरीका है। लाभों को पुन: कार्य में लगाकर वर्षों से अर्जित आरक्षित का उपयोग कम्‍पनी द्वारा निम्‍नलिखित प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है :

  • उपक्रम का विस्‍तार
  • पुरानी बेकार परिसम्‍पत्ति का स्‍थानापन्‍न और आधुनिकीकरण
  • स्‍थायी या विशेष कार्यशील पूंजी की आवश्‍यकता पूरा करना
  • पुराने ऋणों का मोचन
कम्‍पनी के लिए इस वित्त के लाभ निम्‍नलिखित है :-
  • इससे‍ वित्त पोषण के बाह्य स्रोतों पर निर्भरता कम होती है।
  • इससे कम्‍पनी की ऋण क्षमता बढ़ती है।
  • यह कम्‍पनी को विकट परिस्थिति में अडिग रहने में समर्थ बनाता है।
  • यह कम्‍पनी को स्थिर लाभांश नीति अपनाने में समर्थ बनाता है।

अल्‍पावधिक पूंजी वित्तपोषित करने के लिए कम्‍पनी निम्‍नलिखित प्रविधियों का उपयोग कर सकती है :-

व्‍यापार ऋण

कम्‍पनी कच्‍ची सामग्री, संघटक, भण्‍डार और कल पुर्जे ऋण पर विभिन्‍न आपूर्तिकर्त्ताओं से खरीदती है साधारणत: आपूर्तिकर्ता 3 से 6 माहों की अवधि के लिए ऋण प्रदान करते हैं और इस प्रकार से कम्‍पनी को अल्‍पावधिक वित्त पोषण करते हैं। इस प्रकार के वित्त की उपलब्‍धता व्‍यापार की मात्रा से सम्‍बद्ध है। जब उत्‍पादन और माल की बिक्री बढ़ती है तब खरीदों की मात्रा में स्‍वत: वृद्धि हो जाती है और अधिक व्‍यापार ऋण उपलब्‍ध होते हैं।

फैक्‍टरिंग

ग्राहकों से कम्‍पनी को देय राशि जो ऋण बिक्री के कारण होती है अनुमत ऋण अवधि में बकाया रहती है, जब तक कि देयताएं ऋणदाता से संग्रहित न किए जाते हैं। बहि ऋण बैंकों को सौंपे जा सकते हैं और बैंक से नकदी की अग्रिम वसूली की जाती है। इस प्रकार से ऋणदाता के शेष के संग्रहण की जिम्‍मेदारी कम्‍पनी द्वारा विनिर्दिष्‍ट प्रभार का भुगतान करने पर बैंक अपने ऊपर लेता है। अल्‍पावधिक पूंजी जुटाने की यह विधि फैक्‍टरिंग के रूप में जानी जाती है। बैंक द्वारा इस प्रयोजन हेतु लगाए गए प्रभार निधि जुटाने की लागत मानी जाती है।

विनियम की हुण्‍डी बट्टा

यह विधि अल्‍पावधिक वित्त जुटाने के लिए कम्‍पनियों द्वारा बहुतायत में उपयोग की जाती है। जब माल क्रेडिट पर बेचे जाते हैं तब विनियम हुण्डियां साधारणत: माल के खरीदारों द्वारा स्‍वीकार्य के लिए आहरित होते हैं। परिपक्‍वता की तारीख तक हुण्‍डी अपने पास रखने के बजाए बैंक बट्टा कहा जाने वाला प्रभार का भुगतान करके कम्‍पनियां वाणिज्यिक बैंकों को बट्टा देती हैं। बैंक द्वारा प्रभारित होने वाले बट्टे की दर समय –समय पर भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है। बट्टा देते समय बट्टे की राशि हुण्डियों के मूल्‍य से कम कर ली जाती है। इस विधि द्वारा निधि जुटाने की लागत बैंक द्वारा बट्टा प्रभार होती है।

बैंक ओवरड्राफ्ट और नकदी ऋण

अल्‍पावधिक वित्तीय आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए यह कम्‍पनी द्वारा अपनाई जाने वाली आम प्रविधि है। नकदी ऋण का अभिप्राय ऐसी व्‍यवस्‍था से है जिसमें वाणिज्यिक बैंक विनिर्दिष्‍ट सीमा के भीतर अग्रिम के रूप में रुपए आहरित करने की अनुमति देते हैं। यह सुविधा भण्‍डार में माल या द्वितीय हस्‍ताक्षर वाले प्रोमिसरी नोटों और सरकारी बांडों जैसे लिखतों, अन्‍य पण्‍यों की जमानत पर दी जाती है। ओवरड्राफ्ट बैंकों के साथ अस्‍थाई व्‍यव्‍स्‍था है जिससे कम्‍पनी को बैंक में इसके वर्तमान चालू जमा खाते से निश्चित सीमा तक अधिक आहरण करने की अनुमति देता है। ओवर ड्राफ्ट सुविधा भी जमानत पर दी जाती है। नकदी ऋण और ओवरड्राफ्ट पर प्रभावित ब्‍याज दर बैंक जमा की दर से अपेक्षाकृत बहुत अधिक होती है।

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