साझेदारी की परिभाषा दो या अधिक व्यक्तियों के बीच संबंध के रूप में दी जाती है जो सबके द्वारा किए गए व्यापार के लाभों का बंटवारा करने के लिए सहमत होते हैं, या यह व्यापार सबकी ओर से किसी एक व्यक्ति के द्वारा भी किया जाता है। साझेदारी कारोबार के स्वामी व्यष्टि रूप में साझेदार के रूप में जाने जाते हैं और सामूहिक रूप से फर्म (कम्पनी) के रूप में। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है :-
- साझेदारी आसानी से बनाई जा सकती है चूंकि इसके लिए जटिल कानूनी औपचारिकताएं शामिल नहीं है। इसका पंजीकरण भी अनिवार्य नहीं होता है। तथापि, यदि फर्म पंजीकृत न हो तो यह कुछ कानूनी फायदों से वंचित रह जाएगा। फर्म रजिस्ट्रार साझेदारी फर्मों के पंजीकरण के लिए जिम्मेदार होता है।
- साझेदारों की कम से कम संख्या दो हो, जबकि बैंकिंग कारोबार के मामले में अधिक से अधिक 10 सदस्य और अन्य प्रकार के सभी व्यापार में 20 हों।
- फर्म का अपने आप में कोई अस्तित्व नहीं है अर्थात कानून की दृष्टि में फर्म ही साझेदार होते हैं।
- इसके विपरीत किसी समझौते के अभाव में सभी साझेदारों को व्यापार के कार्यकलापों में सहभागी होने का अधिकार होता है।
- सम्पत्ति का स्वामित्व साधारणत: प्रबंधन का अधिकार भी देता है। इसलिए व्यापार फर्म के प्रबंधन में भाग लेने का अधिकार रखता है।
- साझेदारों का दायित्व असीमित होता है। कानूनी रूप से साझेदार संयुक्त होते है और फर्म के दायित्वों के लिए उनकी उनकी जवाबदेही होती है। इसका आशय यहां है कि यदि फर्म की परिसम्पत्ति और सम्पत्ति फर्म के ऋणों को पूरा करने हेतु अपर्याप्त होती हैं तो ऋणदाता व्यष्टि साझेदारों की वैयक्तिक सम्पत्ति से अपने ऋणों की वसूली कर सकते हैं।
- हितों के अंतरण पर प्रतिबंध होता है अर्थात कोई भी साझेदार फर्म में अपने हित सभी साझेदारों की सर्वसम्पत्ति के बिना किसी व्यक्ति को अंतरित नहीं कर सकता है (विद्यमान साझेदार को छोड़कर)।
- फर्म की जीवक्षम सीमित है अर्थात कानूनी रूप से फर्म के किसी एक साझेदार की सेवानिवृत्ति, पागलपन, दिवालिया या मृत्यु हो जाने पर फर्म भंग हो जाती है।
साझेदारी समझौते के द्वारा की जाती है, जो लिखित या मौखिक हो सकता है। जब लिखित करार विधिवत रूप से मुहरबंद होते या पंजीकृत होते हैं तो इसे ''साझेदारी डीड'' के नाम से जाना जाता हैद्य साधारणत: साझेदारों के अधिकार, कर्तव्य और दायित्व भारतीय साझेदारी अधिनियम, 1932 के उपबंध लागू होंगे। डीड में साधारणत: निम्नलिखित विवरण होते हैं:
- फर्म का नाम
- किए जाने वाले व्यापार की प्रकृति
- साझेदारों के नाम
- जहां व्यापार किया जाना है उस नगर या स्थान का नाम
- प्रत्येक साझेदार द्वारा अंशदान पूंजी की राशि
- साझेदारों द्वारा ऋण एवं अग्रिम और ऊपर भुगतान योग्य ब्याज।
- प्रत्येक साझेदार द्वारा आहरण की राशि और उन पर अनुमत ब्याज दर।
- प्रत्येक साझेदार के कर्त्तव्य और अधिकार।
फायदे
- गठन की सरलता
- अधिक पूंजी और ऋण संसाधन
- बेहतर निर्णय और अधिक प्रबंधकीय क्षमता
ख़ामियां
- स्वाभाविक प्राधिकार का अभाव
- अन्य साझेदार के कार्यों के लिए दायित्व
- सीमित जीवन
- असीमित दायित्व
मध्यम आकार के व्यापार के लिए साझेदारी एक उपयुक्त स्वामित्व का रूप है जिसमें सीमित पूंजी निहित होती है। इसमें लघु उद्योग थोक बिक्री और खुदरा व्यापार, लघु सेवा प्रतिष्ठान जैसे ट्रांसपोर्ट एजेंसियां, अचल सम्पदा ब्रोकर, व्यवसायिक फर्म जैसे सनदी लेखाकार, डाक्टरों के क्लिनिक, एटॉर्नी या विधि फर्म शामिल होते हैं। |