एक बार जब उद्यमी व्यापार आरंभ करने से संबंधित सभी महत्वपूर्ण निर्णय कर लिया होता है उसे मूल विनियामक अपेक्षाओं को ध्यान में रखना होता है जिनका संगठन की स्थापना करने के लिए अनुपालन किया जाना है। इसमें निम्नलिखित विनियामक, कम्पनी अधिनियम, 1956 है, जो कम्पनी के सभी कार्यों को विनियमित करता है। इसमें निम्नलिखित से संबंधित प्रावधान होते हैं :- कम्पनी का गठन, निदेशकों और प्रबंधकों की शक्ति और जिम्मेदारियां, पूंजी जुटाना, कम्पनी की बैठक आयोजित करना, कम्पनी के लेखों का अनुरक्षण और लेखा परीक्षा, कम्पनी कार्य के निरीक्षण और अन्वेषण संबंधी शक्तियां, कम्पनी का पुनर्गठन और सम्मेलन और यहां तक कि कम्पनी का बंद करना। अगला महत्वपूर्ण विनियमन पर्यावरण से संबंधित है। पर्यावरणीय विनियामक अपेक्षाओं में व्यापक विद्यायी ढांचे की कल्पना की जाती है जिसमें पर्यावरणीय रक्षा की प्रत्येक पहलू को शामिल किया जाता है। मोटे तौर पर इसमें वायु, ध्वनि, जल आदि के लिए उत्सर्जन मानक की स्थापना, खतरानाक अपशिष्ट के उत्सर्जन के लिए अलग कानून भी अधिनियमित किए गए हैं। 37 श्रेणी के उद्योगों के लिए निस्सारी मानक और 31 श्रेणी के उद्योगों के लिए उत्सर्जन मानक विकसित और अधिसूचित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त परिवेशी वायु की गुणवत्ता, परिवेशी ध्वनि, ऑटोमोबाइल और ईंधन गुणवत्ता विशिष्टीकरण पेट्रोल और डीजल के लिए रखे गए हैं। पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) प्रभाग की स्थापना स्थायी विकास सुनिश्चित करने के लिए की गई है। इसके अतिरिक्त कुछ श्रेणी के उद्योगों के लिए अनिवार्य रूप से पर्यावरणीय मंजूरी लेना पड़ता है। इसलिए पर्यावरणीय रक्षा के लिए प्रत्येक उद्योग इन दिशानिर्देशों और मानदंडों से बंधे हुए हैं चूंकि केवल इसके द्वारा ही स्थायी प्रगति और वृद्धि सुनिश्चित होगी।
^ ऊपर
|
|