एकल प्रोपराइटरशिप कारोबार का सबसे पुराना और साधारण रूप है। यह एक व्यक्ति का संगठन है जहां एक ही व्यक्ति स्वामी होता है और कारोबार का प्रबंधन और नियंत्रण करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित है :-
- सूचना की सरलता इसकी अति महत्वपूर्ण विशेषता है चूंकि इसके लिए विस्तृत कानूनी औपचारिकताओं की आवश्यकता नहीं होती है। कोई करार नहीं किया जाता और कम्पनी का पंजीकरण भी अनिवार्य नहीं हैं। तथापि, स्वामी को स्थानीय प्रशासन से व्यापार के समरूप विशिष्ट लाइसेंस लेने की आवश्यकता हो सकती है।
- संगठन द्वारा अपेक्षित पूंजी की पूर्ण रूप से स्वामी के द्वारा ही आपूर्ति की जाती है और वह अधिकांशत: अपनी स्वंय की बचतों और कम्पनी के लाभों पर निर्भर रहता है।
- स्वामी का कारोबार की सभी पहलुओं पर पूर्ण नियंत्रण होता है और वही सभी निर्णय लेता है यद्यपि दिनानुदिन है क्रियाकलापों को करने के लिए वह कुछ अन्यों की भी सेवाएं लेता है।
- केवल स्वामी ही कारोबार के लाभों और फायदों का उपभोग करता है और सिर्फ वहीं हानियां उठाता है।
- कम्पनी के स्वामी से अलग कोई कानूनी अस्तित्व नहीं होता है।
- प्रोपराइटर का दायित्व असीमित होता है अर्थात यह फर्म में पूंजी निवेश के अतिरिक्त होता है।
- सततता की कमी अर्थात एकल प्रोपराइटरशिप वाले कारोबार का अस्तित्व प्रोपराइटर के जीवन और बीमारी, मृत्यु आदि पर निर्भर करता है जिसके साथ ही व्यापार समाप्त हो जाता है। अत: व्यापार के कार्यचालन की सततता अनिश्चित होती है।
फायदे
- सूचना की सरलता
- कार्य के लिए अधिकतम प्रोत्साहन
- व्यापार की गोपनीयता
- त्वरित निर्णय और कार्यचालन में नम्यता।
ख़ामियां
- सीमित पूंजी
- सीमित प्रबंधकीय क्षमता
- सीमित जीवन
- असीमित दायित्व
इसलिए इस प्रकार का संगठन ऐसे व्यापार के लिए उपयुक्त है जिसमें कम जोखिम, अल्प वित्तीय संसाधन, पूंजी की आवश्यकता कम और सन्निहित जोखिम अधिक न हो जैसाकि ऑटोमोबाइल मरम्मत की दुकान, दर्जी आदि। भारत में यह सबसे बड़ा कारोबार है। ^ ऊपर |