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व्‍यापार आरंभ करने हेतु वित्तपोषण:
वित्त स्रोत
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दीर्घावधिक वित्त कम्‍पनियों द्वारा निम्‍नलिखित स्रोतों से जुटाया जा सकता है :-

पूंजी बाजार

पूंजी बाजार का अभिप्राय एक व्‍यवस्‍था से है जिसके द्वारा दीर्घावधिक निधियों की अधिप्राप्ति और आपूर्ति का लेनदेन व्‍यष्टियों और संगठनों के बीच किया जाता है। पूंजी बाजार में कम्‍पनियां विभिन्‍न प्रकार के शेयर और डिबेन्‍चर जारी करके निधियां जुटाती है। जब आरंभ में नई कम्‍पनियों द्वारा या मौजूदा कम्‍पनियों द्वारा अतिरिक्‍त शेयर एवं डिबेन्‍चर जारी करके दीर्घावधिक पूंजी जुटाई जाती है तो लेन देन बाजार में नई पूंजी के लिए किया जाता है जिसे नया निर्गम बाजार कहते है। परन्‍तु शेयर और डिबेन्‍चरों की खरीद और बिक्री जो पहले ही कम्‍पनियों द्वारा जारी की गई है, वह इस प्रकार के बाजार में होती है जो स्‍टॉक बाजार कहलाता है।

व्‍‍यष्टियां और संस्‍थाएं जो कम्‍पनी की शेयर पूंजी के लिए अंशदान करते हैं, इसके शेयर धारक बन जाते हैं। उन्‍हें कम्‍पनी के सदस्‍यों के रूप में भी जाना जाता है। शेयरों के निर्गमित होने के पहले कम्‍पनी के निदेशकों को निम्‍नलिखित विषयों पर निर्णय लेना है :-

  • शेयरों के निर्गम से जुटाई जाने वाली पूंजी की राशि।
  • जारी किए जाने वाले शेयरों के प्रकार
  • शेयर निर्गमित करने का समय

जब कम्‍पनी अपने गठन के या शेयरों के प्रथम आबंटन के एक वर्ष बाद पश्‍चात किसी भी समय अतिरिक्‍त ऐसे शेयरों की पेशकश सबसे पहले कम्‍पनी के विद्यमान शेयर धारकों के लिए की जाए। यदि मौजूदा शेयर धारक इस पेशकश को नकारते हैं तब केवल इन शेयरों की पेशकश आम जनता के लिए की जा सकती है। ऐसे निर्गम ''अधिकार निर्गम'' कहलाता है और ऐसे शेयरों को राइट शेयर के रूप में जाना जाता है। शेयरों के निगम को और डिबेन्‍चरों को सरकार नियंत्रित करती है पूंजी निर्गम (नियंत्रण) अधिनियम, 1947 के अध्‍याधीन सरकार नियंत्रित करती है।.

विशेष वित्तीय संस्‍थाएं

औद्योगिक उद्यमों को दीर्घावधिक वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए भारत में बड़ी संख्‍या में वित्तीय संस्‍थाएं स्‍थापित की गई हैं। बहुत से अखिल भारतीय संस्‍थाएं हैं जैसे भारतीय औद्योगिक वित्त निगम (आईएफसीआई) ; भारतीय ऋण और निवेश निगम (आईसीआईसीआई) ; भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (आईडीबीआई) आदि। राज्‍य स्‍तर पर राज्‍य वित्त निगम (एसएफसी) और राज्‍य औद्योगिक विकास निगम (एसआईडीसी) हैं। इन राष्‍ट्रीय और राज्‍य स्‍तरीय संस्‍थाओं को विकास बैंकों के रूप में जाना जाता है। विकास बैंकों के अतिरिक्‍त अनेकानेक संस्‍थाएं हैं जिन्‍हें निवेश कम्‍पनियां या निवेश न्‍यास कहा जाता है जो कम्‍पनियों द्वारा जनता के लिए पेशकश किए गए शेयर और डिबेन्‍चर खरीदती हैं। इनमें भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी); भारतीय साधारण बीमा निगम (जीआईसी) ; यूनिट ट्रस्‍ट ऑफ इंडिया (यूटीआई),आदि शामिल है।

पट्टे की कम्‍पनियां

विनिर्माण कम्‍पनियां पट्टे की कम्‍पनियों से दीर्घावधिक ऋण प्राप्‍त कर सकती हैं। इसके लिए कए पट्टा करार किया जाता है जिसके माध्‍यम से पट्टेदारी कम्‍पनियों द्वारा मशीनरी और अचल परिसम्‍पत्तियां खरीदी जा सकती है और वार्षिक किराया के भुगतान पर विशिष्‍ट अवधि तक विनिर्माण प्रतिष्‍ठान द्वारा उपयोग करना अनुमत होता है। अवधि की समाप्ति पर विनिर्माण कम्‍पनी के पास कम कीमत पर खरीद करने का विकल्‍प होता है। पट्टा किराया में पट्टेदार कम्‍पनी के खर्च और लाभों के अतिरिक्‍त ब्‍याज प्राप्‍त कर सकती है।

विदेशी स्रोत

निधियां विदेशी स्रोतों से भी जुलाई जा सकती हैं जिनमें साधारणत: निम्‍नलिखित सन्निहित होते हैं :-

  • विदेशी सहयोग : यदि भार सरकार द्वारा अनुमोदित हो भारतीय कम्‍पनियां अपनी शेयर पूंजी का विदेशी सहयोगियों द्वारा खरीदारी, तकनीकी जानकारी की आपूर्ति, पेटेन्‍ट, संरेखण और संयंत्र की डिजाइन या मशीनरी की आपूर्ति द्वारा विदेशों से पूंजी प्राप्‍त कर सकती हैं।
  • अंतरराष्‍ट्रीय वित्तीय संस्‍थाएं : जैसे विश्‍व बैंक और अंतरराष्‍ट्रीय वित्त निगम (आईएफसी) पूरे विश्‍व में औद्यौगिक विकास के लिए दीर्घा‍वधिक निधियां प्रदान करती हैं। विश्‍व बैंक केवल सदस्‍य देशों की सरकार को ऋण उपलब्‍ध कराता है या निजी उद्यमों को संबंधित सरकार की गारंटी पर ऋण देता है। आईएफसी की स्‍थापना सदस्‍य देशों की गारंटी के बिना निजी उपक्रमों की सहायता करने के लिए की गई है। यह उन्‍हें जोखिम पूंजी भी प्रदान करती है।
  • अनिवासी भारतीय : भारतीय मूल और राष्‍ट्रीयता के व्‍यक्ति जो विदेशों में रहते हैं, भी भारत में कम्‍पनियों द्वारा निर्गमित शेयर और डिबेन्‍चर खरीदने के लिए अनुमत होते हैं।

लाभों को अपने पास रखना या लाभों का पुनर्निवेशन

सतत रूप से चालू कम्‍पनियों के लिए दीर्घावधिक वित्त का महत्‍वपूर्ण स्रोत लाभ की राशि है जिसे वर्षनुवर्ष सामान्‍य आरक्षित के रूप में जमा किया जाता है। शेयरधारकों को पूरी तरह लाभांश के रूप में लाभों का वितरण नहीं किया जाता, अपने पास रखी हुई राशि को कारोबारी क्रियाकलापों के विस्‍तार या विविधिकरण के लिए निवेश किया जाता सकता है। अपने पास रखा गया लाभ वित्त का आंतरिक स्रोत है। इसलिए इसमें नकदी की गतिशीलता नहीं होती है जिसे बाह्य स्रोतों से वित्त जुटाने के लिए खर्च किया जाता है।

अल्‍पावधिक वित्त कम्‍पनियों द्वारा निम्‍नलिखित स्रोतों से जुटाए जाते हैं :-

व्‍यापार ऋण

यह एक प्रकार का ऋण है जिसे फर्म अपने आपूर्तिकताओं से प्राप्‍त करता है। यह नकद में निधि उपलब्‍ध नहीं कराता है परन्‍तु बिना तत्‍काल भुगतान के यह आपूर्ति खरीदना सुकर बनाता है। व्‍यापार ऋणों पर कोई ब्‍याज देय नहीं होता है। व्‍यापार ऋण की अवधि उत्‍पाद की प्रकृति, ग्राहक का स्‍थान, बाजार में प्रतिस्‍पर्धा की डिग्री, आपूर्तिकर्ताओं के वित्त संसाधन और अपने भण्‍डार बेचने की आपूर्तिकर्ता की उत्‍सुकता पर निर्भर करती है।

किस्‍त ऋण

फर्म उपस्‍कर आपूर्तिकताओं से ऋण ले सकती है। आपूर्तिकर्ता 12 माह या इससे अधिक की अवधि तक भुगतान करके उपस्‍कर की खरीद अनुमत कर सकते हैं। परिसम्‍पत्ति की लागत कीमत का कुछ भाग परिदाय के समय पर भुगतान किया जाता है और शेष कई किस्‍तों में चुकाया जाता है। आपूर्तिकर्ता किस्‍त ऋणों पर ब्‍याज प्रभारित करते हैं जो किस्‍त की राशि में शामिल होता है। उपस्‍कर का स्‍वामित्‍व आपूर्तिकर्ता के पास तब तक रहता है जब तक खरीदार द्वारा किस्‍तों का भुगतान न कर लिया जाता है।

लेनदारी खातों द्वारा वित्त पोषण

इसके तहत, व्‍यापारी प्रतिष्‍ठानों के खातों में प्राप्‍त, वित्त पोषक कम्‍पनियों द्वारा खरीदा जाता है या खातों में प्राप्‍य की जमानत पर अग्रिम राशि दी जाती है। वित्तपोषण कम्‍पनियां, खातों में प्राप्‍य मूल्‍यों का साधारणत: 60 प्रतिशत तक अग्रिम देती है। व्‍यापारी प्रतिष्‍ठान का ऋण दाता इसके लिए भुगतान करते हैं जो बदले में वित्तपोषण कम्‍पनी को अग्रेषित करता है।

ग्राहक अग्रिम

माल के विनिर्माता भुगतान का कुछ भाग अग्रिम अदा करने पर जोर दे सकते हैं, विशेषकर विशिष्‍ठ आदेशों या बड़े आदेशों के मामले में ग्राहक अग्रिम उत्‍पाद के मूल्‍य के अंश के द्योतक होता है जिनके लिए ग्राहक ने आदेश दिया है और उन्‍हें बाद की तारीख में दिया जाएगा।

बैंक ऋण

वाणिज्यिक बैंक व्‍यापारी प्रतिष्‍ठानों की अल्‍पावधिक आवश्‍यकताओं के वित्त पोषण करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वे निम्‍नलिखित तरीकों से वित्तपोषण करते हैं :

  • ऋण : जब बैंक एकमुश्‍त अग्रि देता है तब उधारकर्ता द्वारा सम्‍पूर्ण राशि का नकदी आहरण किया जाता है जो एक ही किस्‍त में पुनर्भुतान करने का वचन देता है, यह ऋण कहलाता है। उधारकर्ता सम्‍पूर्ण राशि पर ब्‍याज देता है।
  • नकदी ऋण : वाणिज्यिक बैंको द्वारा वित्तपोषण करने का यह अति लोकप्रिय तरीका है। जब उधारकर्ता मूर्त परिसम्‍पत्तियों या गारंटियों की जमानत पर निश्चित सीमा तक उधार लेने के लिए अनुमत होता है तो यह जमानती ऋण के रूप में जाना जाता है परन्‍तु नकद ऋण किसी जमानत द्वारा समर्थित नहीं होता है तो यह स्‍पष्‍ट रूप से नकदी ऋण के रूप में जाना जाता है। स्‍पष्‍ट नकदी ऋण के मामले में उधारकर्ता वचन पत्र देता है जो दो या अधिक जमानत दाता द्वारा हस्‍ताक्षरित होता है। उधार्रकर्ता को वास्‍तव में प्रयुक्‍त राशि पर ही ब्‍याज का भुगतान करना पड़ता है।
  • ओवरड्राफ्ट : इसके तहत वाणिज्यिक बैंक अपने ग्राहक को अपने चालू खाता ओवरड्रा करने के लिए अनुमत करता है ताकि यह डेबिट शेष दर्शा सके। ग्राहक पर वास्‍तविक ओवरड्रॉन खाते पर ब्‍याज प्रभारित किया जाता है न कि स्‍वीकृत सीमा पर।
  • हुण्डियों का बट्टा : वाणिज्यिक बैंक व्‍यापारी प्रतिष्‍ठानों को उनके ऋण लिखतों जैसे विनियम हुण्डियां, वचन पत्रों और हुण्डियों पर बट्टा देकर वित्तपोषण करते हैं। इन दस्‍तावेजों पर उनके अंकित से कम कीमत पर बैं‍क द्वारा बट्टा दिया जाता है।

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