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आयकर अधिनियम के अधीन, आयकर प्रत्येक वर्ष वित्त अधिनियम के द्वारा नियत दारों पर प्रत्येक निर्धारिती द्वारा देय होता है। " निर्धारिती" से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है, जिससे कोई कर अथवा कोई अन्य राशि (अर्थात् – जुर्माना अथवा ब्याज) अधिनियम के अधीन देय होती है। इसमें निम्न शामिल है :-
- इसमें प्रत्येक ऐसा व्यक्ति शामिल है, जिसके संबंध में उसकी आय का निर्धारण करने अथवा कर –निर्धारण योग्य किसी अन्य व्यक्ति की आय कर निर्धारण करने अथवा उसके द्वारा अथवा ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा उठाई गई हानि के लिए अथवा उसको अथवा ऐसे अन्य व्यक्ति को देय वापिसी राशि के लिए इस अधिनियम के अधीन कोई कार्रवाई की गई है;
- ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसे इस अधिनियम के किसी प्रावधान के अधीन कर-निर्धारिती माना जाता है;
- ऐसा प्रत्येक शामिल है, जिसे इस अधिनियम के किसी प्रावधान के अधीन चूक करने वाला कोई निर्धारिती माना जाता है।
इस अधिनियम के अधीन "व्यक्ति" शब्दावली में निम्न शामिल है:-
एक व्यक्ति |
एक व्यक्ति शब्द से अभिप्राय केवल एक प्राकृतिक व्यक्ति अर्थात् मानव से है। विवेकाधीन ट्रस्ट के न्यासियों का निर्धारण व्यक्ति की स्थिति के अनुसार किया जाएगा, न कि व्यक्तियों के संघ की स्थिति के अनुसार किया जाएगा। एक व्यक्ति वेतन से प्राप्त आय, आवास किराया, व्यवसाय, कार्य व्यापार, ब्याज आदि पर आयकर कर भुगतान करेगा। वह लाभांश आय पर आयकर का भुगतान नहीं करेगा। आयकर के उद्देश्य से मालिकाना फर्म की आय को उसकी आय में शामिल किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति भागीदारी फर्म, जहां वह भागीदार है, से वेतन प्राप्त करता है तो उसकी आय कर ''व्यावसाय आय'' के रूप में माना जाता है, यद्यपि उस वेतन कहा जाता है।
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हिंदू अविभाजित परिवार (एच यू एफ) |
हिंदू अविभाजित परिवार को कर कानून के अधीन परिभाषित नहीं किया गया है। तथापि, हिंदू कानून के अनुसार इसका अभिप्राय ऐसे परिवार से है, जिसमें सामान्य पूर्वज्ञ से वंशागत उत्तराधिकार प्राप्त सभी व्यक्ति जिसमें उनकी उनकी पत्नियां व अविवाहित पुत्रियां भी सम्मिलित हैं, वे सभी शामिल होते हैं। संयुक्त हिंदू परिवार द्वारा प्राय लाभ निर्धारण यूनिट अथवा भिन्न सत्ता के अनुसार हिंदू अविभाजित परिवार की आय के रूप में कर में प्रभार्य है।
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कंपनी |
आय कर अधिनियम के अधीन कंपनी से अभिप्राय है:-
- कोई भारतीय कंपनी अथवा
- भारत के बाहर किसी देश के कानून के अधीन अथवा इसके द्वारा शामिल किया गया कोई निगमित निकाय
- कोई संस्था, एसोसिएशन (संघ) अथवा निकाय, जो भारतीय आय कर अधिनियम 1922 के अधीन किसी निर्धारण वर्ष के लिए कंपनी के रूप में कर- निर्धारण योग्य है अथवा कर-निर्धारण या अथवा जिसका कर निर्धारण किया गया अथवा इस अधिनियम के अधीन, जो 1 अप्रैल, 1970 को अपना इससे पहले शुरू होने वाले किसी निर्धारण वर्ष के लिए कंपनी के रूप में कर – निर्धारण योग्य है अथवा कर-निर्धारण था अथवा जिसका कर – निर्धारण किया गया अथवा
- कोई संस्था, संघ अथवा निकाय, जिसे शामिल किया गया है अथवा नहीं और चाहे वे भारतीय अथवा गैर – भारतीय हो, जिसे केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के सामान्य अथवा विशेष आदेश द्वारा कंपनी घोषित किया गया है।
कंपनी को एक न्यायिक व्यक्ति के रूप में परिभाषित किया गया है, जो अपने शेयर धारकों से एक स्वतंत्र व अलग कानूनी सत्ता रखती है। कंपनी की आय की परिकलना की जाती है और कंपनी की ओर से उसका अलग से कर निर्धारण किया जाता है। कंपनी समतल दरों पर एक अदा करने के लिए दायी है।
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फर्म |
आयकर अधिनियम के अधीन, 'फर्म' 'भागीदार' व 'भागीदारी' को वही अर्थ दिया गया है, जो कि उसे भारतीय भागीदारी अधिनियम में निर्दिष्ट किया गया है। परन्तु 'भागीदारी' अभिव्यक्ति में किसी ऐसे व्यक्ति को शामिल करने के लिए विस्तार किया गया है, जो अवयस्क है और जिसे भागीदारी का लाभ उठाने के लिए स्वीकृति दी गई है। केवल ऐसे सदस्यों को भागीदार माना जाएगा, जिन्होंने भागीदारी की है। भागीदारी अधिनियम के अधीन, फर्म के अभिप्राय है जो ''व्यक्तियों, जिन्होंने सभी अथवा सभी के लिए कार्यरत उनमें से किसी व्यक्ति द्वारा कार्यान्वित किए गए व्यवसाय के लाभ को बांटने के लिए सहमति दी है, के बीच संबंध'' रखती है। आयकर कानून में, फर्म विशेष प्रावधानों के द्वारा निर्धारण यूनिट होती है, परन्तु जो पूरा व्यक्ति नहीं है। फर्म समान दरों पर कर का भुगतान करने के लिए दायी है।
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व्यक्तियों का संघ अथवा निजी निकाय, चाहे उसे शामिल किया गया है अथवा नहीं |
| व्यक्तियों का संघ (एओपी) आयकर अधिनियम के अधीन निर्धारण की यूनिट अथवा सत्ता होता है। व्यक्तियों के संघ्ज्ञ (एओपी) से ऐसे दो अथवा दो से अधिक व्यक्ति होते हैं, जो आय अर्जित करने की दृष्टि से एक सामान्य उद्देश्य से एक साथ कार्य करते हैं। व्यक्ति शब्दावली में कोई कंपनी अथवा संघ अथवा निजी निकाय, चाहे वह निगमित है या नहीं, शामिल होता है। संघ को संविदा के आधार पर निर्मित किए जाने की जरूरत नहीं होती है। अत:, यदि दो अथवा दो से अधिक व्यक्ति कार्य व्यापार करने के लिए संयुक्त रूप से कार्य करते हैं, तो अनका एओपी (व्यक्तियों के संघ) के रूप में निर्धारण किया जाएगा। परन्तु, व्यक्तियों के संघ (एओपी) से अभिप्राय किसी और प्रत्येक व्यक्तियों का सम्मिश्रण नहीं होता है। इसका अभिप्राय केवल यही है कि जब वे आय उत्पादित करने वाली गतिविधियों में स्वयं जुड़ जाते हैं तो वे व्यक्तियों का संघ बन जाते हैं।
निजी निकाय (बीओआई) से अभिप्राय निजी व्यक्तियों के समूह से है, जो कुछ आय अर्जित करने के उद्देश्य से कुछ गतिविधि को अंजाम देते है। इसमें केवल निजी व्यक्ति ही शामिल होंगे। कंपनियों अथवा फर्म जैसी सत्ता निजी निकाय के सदस्य नहीं हो सकते है। बीओआई से उसके द्वारा आय के भाग प्राप्ति और उस राशि, जिस पर ऐसे बीओआई द्वारा पहले ही से कर अदा किया गया है, के संबंध में किसी निर्धारिती द्वारा आयकर देय नहीं होगा।
एओपी और बीओआई के बीच यही अंतर होता है:-
एओपी में गैर – निजी व्यक्ति शामिल हो सकते है, परन्तु बीओआई में केवल निजी व्यक्ति ही शामिल होंगे। यदि दो अथवा दो से अधिक व्यक्ति (जैसे फर्म, कंपनी, हिंदू अविभाजित फर्म, निजी व्यक्ति आदि) एक साथ कार्य करते हैं तो उन्हें एओपी कहा जाता है। परन्तु यदि केवल निजी व्यक्ति एक साथ कार्य करते हैं तो उन्हें बीओआई कहा जाता है।
एओपी से अभिप्राय आय उत्पादित करने वाली गतिविधि में शामिल होने के लिए सामान्य डिजाइन अथवा सम्मिश्रित इच्छा से एक – साथ स्वेच्छा से कार्य करना है, जबकि बीओआई में सामान्य डिजाइन अथवा इच्छा हो सकती है अथवा नहीं भी हो सकती है।
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स्थानीय प्राधिकरण |
स्थानीय प्राधिकरण निर्धारण की एक अलग यूनिट होता है। स्थानीय प्राधिकरण की अभिव्यक्ति से अभिप्राय है:-
- पंचायत
- नगरपालिका
- स्थानीय निधियों अथवा नगरपालिका के प्रबंधन या उसके नियंत्रण में सरकार द्वारा सौंपी गई अथवा उसके लिए कानूनी रूप से पात्र नगरपालिका समिति अथवा जिला बोर्ड अथवा
- छावनी बोर्ड, जैसा कि छावनी अधिनियम, 1924 में परिभाषित किया जाता है।
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कृत्रिम न्यायिक व्यक्ति |
| इसमें ऐसी सत्ता शामिल होती है जो कि प्राकृतिक व्यक्ति नहीं है, परन्तु जिनकी कानून की दृष्टि से अलग सत्ता होती है। यद्यपि वे न्यायालय में सीधे मुकदमा दायर नहीं कर सकते हैं, परन्तु वे उनको संचालित करने वाले व्यक्तियों के
माध्यम से मुकदमा दायर कर सकते हैं। अत:, भगवान, मूर्ति और देवता कृत्रिम व्यक्ति होते है। यद्यपि, वे
सीधे ही मुकदमा दायर नहीं कर सकते हैं, परन्तु वे मंदिर आदि की प्रबंधन समिति अथवा पुजारियों के माध्यम से कानूनी रूप से मुदकमा दायर कर सकते हैं। वे व्यक्तियों की श्रेणी में आते हैं और उनकी आय जैसे चढ़ावा
आदि कर योग्य होती है। तथापि, आयकर अधिनियम के अधीन उन्हें इनमें उल्लिखित कुछ शर्तें पूरा किए जाने
पर कर भुगतान से छूट दी जाती है।
इसी प्रकार, अन्य सभी कृत्रिम व्यक्ति जो एक न्यायिक व्यक्तित्व रखते हैं, भी इस श्रेणी में आते हैं; यदि वे व्यक्तियों की किसी पूर्ववर्ती श्रेणियों जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय श्रेणी में नहीं आते है तो वे कृत्रिम व्यक्ति होते हैं क्योंकि वे उपर्युक्त किसी भी श्रेणियों में नहीं आते है। अत: यह अवशिष्ट वर्गीकरण की श्रेणी में आते हैं और इसलिए इसमें वे व्यक्ति शामिल नहीं होते हैं, जो किसी भी पूर्ववर्ती वर्गीकरण में नहीं आते हैं।
आयकर अधिनियम के अधीन कर के लिए प्रभार्य व्यक्तियों की सात श्रेणियां होती है। ऊपर उल्लिखित श्रेणियों में न आने वाले किसी भी व्यक्ति को ''व्यक्ति'' शब्दावली के चार भागों में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है और वह कर अदा करने के लिए दायी होगा। |
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