साझेदारी भारत में बहुत ही सामान्य कारोबारी संगठन का रूप है। साझेदारी फर्मों का अभिशासन
भारतीय साझेदारी अधिनियम,1932 के प्रावधानों द्वारा होता है। यह अधिनियम साझेदारी का गठन, साझेदारों के अधिकार और कर्त्तव्य और साझेदारी भंग करने संबंधी नियम निर्धारित करता है। यह साझेदारी की परिभाषा व्यक्तियों के बीच संबंध के रूप में देता है जो सबकी ओर से एक या उनमें से किसी एक के द्वारा किए जाने वाले कारोबार के लाभों को आपस में बांटने के लिए सहमत हैं। इस परिभाषा में साझेदारी का गठन करने के लिए कम से कम तीन अपेक्षाएं दी जाती हैं :-
- व्यक्तियों द्वारा मौखिक या लिखित करार करना जो साझेदारी का गठन करना चाहते है।
- साझेदारी द्वारा किए जाने के लिए लक्षित कारोबार के लाभों का बांटवारा करार का उद्देश्य हो।
- कारोबार सभी साझेदारों द्वारा या सबके बदले कार्य करने वाला किसी एक के द्वारा किया जाए।
अधिनियम के तहत एक दूसरे के साथ साझेदारी का करार करने वाले व्यक्ति रूप से साझेदार कहलाते हैं और सामूहिक रूप से 'फर्म' और जिस नाम पर वे अपना कारोबार चलाते हैं वह 'फर्म का नाम' कहलाता है।