| भागीदारी फर्म आयकर अधिनियम, 1961 के अंतर्गत कराधान के अध्यधीन है। यह आयकर से संबंधित सभी मामलों के लिए व्यापक अधिनियम, है तथा अधिनियम के प्रावधानों को क्रियान्वित करने के लिए नियम (आयकर नियम, 1962) बनाने के लिए केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को शक्तियां प्रदान करता है। केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग का एक भाग है, इसे भारत में विभिन्न प्रत्यक्ष करों से जुड़े सभी मामलों का प्रभार दिया गया है तथा यह आयकर विभाग के माध्यम से प्रत्यक्ष कर कानूनों के प्रशासन के लिए उत्तरदायी है। आयकर अधिनियम में वित्त अधिनियम द्वारा वार्षिक संशोधन किए जाते है जिसमें सदृश वर्ष के लिए आयकर तथा अन्य करों की दरों का उल्लेख किया जाता है।
आयकर अधिनियम के अंतर्गत, भागीदारी फर्म पर भागीदारों से सुभिन्न एक पृथक निकाय के रूप में कर लगाया जाता है। अधिनियम में, पंजीकृत तथा अपेक्षीकृत फर्मों को निर्धारण के बीच कोई अंतर नहीं है। तथापि, भागीदारी को भागीदारी विलेख द्वारा साक्ष्यीकृत किया जाना चाहिए। भागीदारी विलेख भागीदारों की पूंजी, लाभ साझेदारी अनुपात, आहरणों, पूंजी पर ब्याज, कमीशन, वेतन इत्यादि के संबंध में भागीदारों के अधिकारों तथा देयताओं, भागीदारी व्यापार के कार्यचालन, कार्यकरण तथा समाप्ति के संबंध में शर्तों तथा निबंधनों का ब्लूप्रिंट है।
अधिनियम के अंतर्गत, भागीदारी फर्म का निर्धारण भागीदारी फर्म के रूप में अथवा व्यक्तियों के संघ (एओपी) के रूप में किया जाता है। यदि फर्म निम्नलिखित शर्तों को पूरा करती है, तो उसका निर्धारण भागीदारी फर्म के रूप में किया जाएगा, अन्यथा इसका निर्धारण एओपी के रूप में किया जाएगा:-
- फर्म किसी लिखत द्वारा साक्ष्यीकृत है अर्थात भागीदारी का लिखित विलेख है।
- भागीदारों के व्यष्टि हिस्सों को विलेख में अत्यंत स्पष्टता से विनिर्दिष्ट किया गया है।
- भागीदारी विलेख की एक प्रमाणित प्रति फर्म की विगत वर्ष की आय विवरणी के साथ लगाई जानी चाहिए जब भागीदारी का निर्माण किया गया था।
- यदि विगत वर्ष के दौरान, फर्म के संघटन में अथवा भागीदारों के लाभ साझेदारी अनुपात में कोई परिवर्तन हुआ हो तो संशोधित भागीदारी विलेख की प्रमाणित प्रति प्रश्नाधीन विगत वर्षों की आय विवरणी के साथ संलग्न (प्रस्तुत) की जाएगी।
- फर्म के निर्धारण की पूर्ति के लिए आयकर अधिकारियों द्वार दी गई सूचनाओं का उत्तर देने/उन पर कार्रवाई करने में फर्म की ओर से कोई विफलता नहीं होनी चाहिए।
एओपी के रूप में निर्धारण किए जाने के बजाए भागीदारी फर्म के रूप में निर्धारण किया जाना अधिक लाभप्रद है क्योंकि एक भागीदारी फर्म निम्नलिखित अतिरिक्त कटौतियों के लिए दावा कर सकती है जिनका दावा एओपी नहीं कर सकती :-
- भागीदारों को अदा किया गया ब्याज बशर्तें कि ऐसा ब्याज भागीदारी विलेख द्वारा अधिकृत हो।
- भागीदार के किसी वेतन, बोनस, कमीशन या पारिश्रमिक (उसे कोई भी नाम दिया जाए) के कटौती के रूप में अनुमत किया जाएगा यदि यह किसी कार्यशील भागीदार को अदा किया जाना है जो एक व्यष्टि है। ऐसे भागीदार को अदा किया गया पारिश्रमिक भागीदारी विलेख द्वारा अधिकृत होना चाहिए तथा पारिश्रमिक की राशि दी गई सीमाओं से अधिक नहीं होनी चाहिए।
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