सार्वजनिक न्यास को सामान्यतया धर्मार्थ अथवा धार्मिक उद्देश्यों के लिए निर्मित किया जाता है और उसे वाणिज्यिक गतिविधियां करने के लिए निर्दिष्ट नहीं किया गया है। सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास एक ऐसा न्यास है, जो कुल मिलाकर जनता अथवा उसके कुछ महत्वपूर्ण भाग को लाभ पहुंचाता हैं। जबकि प्राइवेट न्यासों से प्राप्त आय विशिष्ट लाभार्थियों को उपलब्ध होती है, न कि कुल मिलाकर जनता को उपलब्ध होती है।
धर्मार्थ न्यास को सामान्य जनोनापयोगी सेवाओं के किसी अन्य उद्देश्य को बढ़ावा देने और गरीबों हेतु राहत, शिक्षा, चिकित्सा राहत को शामिल करने के लिए परिभाषित किया गया है। धर्मार्थ उद्देश्य से खेल व खेलकूद को बढ़ावा देने की गतिविधियों पर विचार किया गया है।
सार्वजनिक अथवा निजी न्यास, उनके सृजन की प्रक्रिया से भिन्न होता है। धर्मार्थ अथवा धार्मिक न्यास सृजित करते हुए, यद्यपि उसमें अचल संपत्ति शामिल होती है, फिर भी इसमें औपचारिक विलेख अथवा किसी अन्य लिखित दस्तावेज की जरूरत नहीं होती है। इसे इन शब्दों में प्रस्तुत किया जाएगा कि आवश्यक तथ्य यह है कि इसे कर्ता अथवा न्यास के अवस्थापक की ओर से संपत्ति से वंचित किया जाएगा और उसे तीसरे व्यक्ति के रूप में न्यासी में निहित किया जाएगा।
सार्वजनिक न्यासों को भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के प्रावधानों के द्वारा सृजित व शासित किया जाता है, जबकि धर्मार्थ न्यास इस अधिनियम से परे होता है। यह अधिनियम इस स्थिति को छोड़कर जब इसमें किसी राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से संशोधन किया जाए, सम्पूर्ण भारत पर लागू होता है।
न्यास, चाहे वह सार्वजनिक अथवा निजी हो, पर आयकर अधिनियम, 1961 के अधीन कर लगेगा। यह आयकर से संबंधित सभी मामलों के लिए अम्ब्रेला अधिनियम है और यह इस अभिनियम के प्रावधानों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बनाने (आयकर नियमावली, 1962) हेतु केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को शक्तियां प्रदत्त करता है। सीबीडीटी वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग का एक भाग है। इसे भारत में विभिन्न प्रत्यक्ष करों से संबंधित सभी मामलों का कार्य भार दिया गया है और यह आयकर विभाग के जरिए प्रत्यक्ष कर कानून के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है। आयकर अधिनियम को वित्त अधिनियम के द्वारा वार्षिक संशोधन करने के लिए प्रस्तुत किया गया है जिसमें तदनुरूपी वर्ष के लिए आयकर और अन्य करों की दरों का उल्लेख होता है। |