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निगमित कराधान :
किसी कंपनी के कराधान से संबंधित प्रावधान
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भारत में भारतीय कंप‍नियां, उसके स्रोत व मूल स्‍थल पर ध्‍यान दिए बिना, उनकी विश्‍वव्‍यापी आय पर कर योग्‍य होती है। विदेशी कंपनियों पर भारत में कार्यान्वित किए गए प्रचालन कार्यों से उत्‍पन्‍न आय पर अथवा कुछ मामलों में आय,‍ जिसे भारत में उत्‍पन्‍न माना जाता है, के अनुसार ही कर लगाया जाता है। बाद वाली कंपनियों में रायल्‍टी, तकनीकी सेवाओं के लिए शुल्‍क, भारत में स्थित पूंजी परिसंपत्तियों की बिक्री से प्राप्‍त लाभ (जिसमें भारतीय कंपनी में शेयरों की बिक्री से प्राप्‍त लाभ शामिल है) तथा भारतीय कंपनियों से प्राप्‍त लाभांश शामिल है। इस प्रकार, किसी कंपनी की आय पर कर देयता कंपनी की आवासीय स्थिति पर निर्भर करती है।
  • किसी संबद्ध पूर्व वर्ष के दौरान, कंपनी को भारत में आवासी होना कहा जाता है यदि:-
    (i) वह एक भारतीय कंपनी है अथवा
    (ii) उसके कार्यों का नियंत्रण व प्रबंधन पूरी तरह से भारत में होता है। आवासी कंपनियों की स्थिति में, कर के लिए दायी कुल आय में निम्‍नलिखित शामिल है [धारा 5 (1)]:-

    • कोई आय, जो ऐसी कंपनी के द्वारा अथवा उसकी ओर से संबद्ध पूर्व वर्ष में भारत में प्राप्‍त की जाती है अथवा प्राप्‍त की गई मानी जाती है
    • कोई आय, जो संबद्ध पूर्व वर्ष के दौरान भारत में प्रोद्भूत अथवा उत्‍पन्‍न होती है अथवा प्रोद्भूत अथवा उत्‍पन्‍न हुई मानी जाती है।
    • कोई आय, जो संबद्ध पूर्व वर्ष के दौरान भारत के बाहर प्रोद्भूत अथवा उपन्‍न होती है।
  • इसी प्रकार किसी कंपनी को किसी संबद्ध पूर्व वर्ष के दौरान अनिवासी होना कहा जाता है यदि
    (i) वह भारतीय कंपनी नहीं है और
    (ii) उसके कार्यों का नियंत्रण और प्रंधन पूर्णतया/अंशतया भारत के बाहर है। अनिवासी कंपनियों की स्थिति में, कर के लिए दायी कुल आय में निम्‍न शामिल है [धारा 5 (2)]:-

    • कोई आय, जो ऐसी कंपनी के द्वारा अथवा उसकी ओर से संबद्ध पूर्व वर्ष में भारत में प्राप्‍त की जाती है अथवा प्राप्‍त की गई मानी जाती है
    • कोई आय, जो संबद्ध पूर्व वर्ष के दौरान भारत में प्रोद्भूत अथवा उत्‍पन्‍न होती है अथवा प्रोद्भूत अथवा उत्‍पन्‍न हुई मानी जाती है।

इसके परिणामस्‍वरूप, ऐसी स्थिति उत्‍पन्‍न हो सकती है, जहां ऐसी आय एक अथवा एक से अधिक देशों में सदृश कंपनी की ओर से कर योग्‍य बन जाती है जिसके कारण ''दुहरा कराधान'' होता है। दुहरने कराधान की समस्‍या निम्‍नलिखित किन्‍हीं कारणों से उत्‍पन्‍न होती है :-

  • कोई कंपनी (अथवा कोई व्‍यक्ति) एक देश का आवासी हो सकती है, परन्‍तु वह अन्‍य सुव्‍यवस्थित देश से आय प्राप्‍त करेगी, इस प्रकार वह दोनों देशों में कर योग्‍य बन जाता है।
  • किसी कंपनी/व्‍यक्ति के दो अथवा दो से अधिक देशों में उसकी विश्‍व व्‍यापी आय पर कर लगेगा, जिसे कर में समवर्ती पूरी देयता के रूप में जाना जाता है। एक देश कर दाता की राष्‍ट्रीयता के आधार पर कर लगा सकता है और दूसरे देश में रहने वाला कोई व्‍यक्ति अपनी विश्‍व व्‍यापी आय के संबंध में दोनों देशों में कर के लिए दायी बन जाता है।
  • कंपनी/व्‍यक्ति, जो दोनों देशों में अनियासी है, पर उनमें से एक से प्राप्‍त आय पर उनमें से एक से प्राप्‍त आय पर उनमें से प्रत्‍येक के अनुसार कर लगेगा। उदाहरण के लिए, एक अनिवासी व्‍यक्ति एक देश में एक स्‍थायी संस्‍था रखता है और उसके जरिए वह अन्‍य देश से आय प्राप्‍त करता है।

भारत में, दुहरे कराधान से राहत आयकर अधिनियम की धारा 90 और धारा 91 के तहत प्रदान की गई है।

  • आयकर अधिनियम की धारा 90 द्विपक्षीय राहत से संबंधित है। इसके अधीन, केंद्र सरकार ने भारत के बाहर किसी देश की सरकार से करार किया है। इन करारों को "दुहरे कराधान से बचने के लिए करार (डीटीएए' एस)" कहा जाता है जिसमें निम्‍नलिखित का प्रावधान है:-

    • निम्‍नलिखित के संबंध में राहत प्रदान करना:-

      • आय, जिस पर भारत में और उस देश दोनों में आयकर का भुगतान किया गया है अथवा
      • पारस्‍परिक आर्थिक संबंधों, व्‍यापार और निवेश को बढ़ावा देने के लिए उस देश में लागू तदनुरूपी कानून के अधीन और भारत में प्रभार्य आयकर अथवा


    • आय का प्रकार, जो किसी भी देश में कर के लिए प्रभार्य होगा, ताकि उस देश में लागू तदनुरूपी कानून के अधीन और इस अधिनियम के अधीन आय के दुहरे कराधान से बचा जा सकें।

    इसके अतिरिक्‍त, केंद्र सरकार निम्‍नलिखित प्रावधान हेतु करार करेंगी:-

    • इस अधिनियम के अधीन अथवा उस देश में लागू तदनुरूपी कानून के अधीन प्रभार्य आयकर से बचने अथवा कर वंचन को रोकने के लिए अथवा ऐसे कर वंचन अथवा उससे बचने के मामलों की जांच पड़ताल करने के लिए सूचना का आदान – प्रदान करने हेतु अथवा
    • इस अधिनियम के अधीन और उस देश में लागू तदनुरूपी कानून के अधीन आयकर की वसूली करने के लिए।

    भारत में 65 देशों के साथ डीटीए करार किया है, उन देशों में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ, यू के, जापान, फ्रांस, जर्मनी आदि जैसे देश शामिल है। उन देशों की स्थिति में जिनके साथ भारत ने दुहरे कराधान से बचने के लिए करार किया है, ऐसे करारों के द्वारा कर की दरों का निर्धारण किया जाता है।

    उस धारा के अधीन, निर्धारिती को विशेष तरीके से क्रेडिट/वापिसी द्वारा राहत दी जाती है यद्यपि उस पर दोनों देशों में कर लगाया जाता है। अन्‍य देश में देय कर के लिए क्रेडिट के रूप में अथवा निम्‍नतमत दर पर कर की वसूली करके राहत दी जाएगी। ऐसी द्विपक्षीय राहत प्रदान करने में शामिल उपाय इस प्रकार है: (क) आयकर अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार भारत में कर अदा करने के लिए दायी व्‍यक्ति की कुल आय की परिकलना करना। (ख) अन्‍य संविदा करने वाली कंपनी से की गई कर संधि की शर्त के अनुसार राहत प्रदान करना, जहां कराधान से दुहरे कराधान को हानि पहुंची है।

    आयकर अधिनियम के अधीन उत्‍पन्‍न कर के लिए देयता भारत और विदेशों के बीच दुहरे कराधान से बचने के करारों के प्रावधानों के अनुसार होती है। इस प्रकार संधि प्रावधान आयकर प्रावधानों पर लागू होंगे।

    डीटीएए के अधीन करारों के प्रकारों को मुख्‍य रूप से निम्‍न रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है:-

    • व्‍यापक करार :- ये विस्‍तृत दस्‍तावेज होते है, जिन्‍हें विस्‍तार के अग्रेषित किया वाला है कि कैसे‍ विभिन्‍न शीर्षों के अधीन आय पर कार्रवाई की जाएगी।
    • सीमित करार :- इसे विमान, जहाज प्रचालन, जहानी माल (कार्गों) की दुलाई व भाड़ा से प्राप्‍त आय के संबंध में दुहरे कराधान से बचने के लिए किया जाता है।
    • अन्‍य करार :- जिसमें दुहरे कराधान से राहत हेतु नियम शामिल है।

  • आयकर अधिनियम की धारा 91 एकपक्षीय राहत से संबंधित है। उसके अधीन, यदि कोई व्‍यक्ति/कंपनी किसी पूर्व वर्ष में भारत में आवासी है और उसने भारत में उसको प्रोद्भूत आय का किसी ऐसे देश को भुगतान किया है, जिसके साथ दुहरे कराधान से राहत हेतु कोई करार नहीं किया गया है (धारा 90 के अधीन) तो वह उक्‍त देश की औसत कर दर अथवा औसत भारतीय कर दर पर जो भी कम हो, अथवा भारतीय कर दर पर यदि दोनों दरें समकक्ष है ऐसी दुहरी कर लगाई गई आय पर गणना की गई राशि की उसके द्वारा देय भारतीय आयकर से कटौती करने का पात्र होगा।

इस धारा के अधीन, राहत की गणना करते हुए उसमें शामिल उपाय इस प्रकार है:- (क) कुल आय, (जिसमें विदेशी आय की शामिल है) पर कर की गणना करना और उस पर लागू राहत का दावा करना (ख) धारा 88 ङ के अधीन छूट का दावा करने के पश्‍चात् अधिभार और शिक्षा उपकर को जोड़ना (ग) कुल आय से पूर्व उपाय में परिकलित कर को भाग देकर औसत कर दर की परिकलना करना (घ) सभी देय राहत की कटौती करने के पश्‍चात् उक्‍त देश में वास्‍तव में प्रदत्त आयकर को भाग देकर विदेशों की औसत कर दर की गणना करना (ङ) इस आधार पर पूर्व दो उपायों में परिकलित दर पर, जो भी कम हो, भारत में देय कर से राहत का दावा करना।

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