प्रत्येक व्यापार सत्ता व्यापार गतिविधियों को कार्यान्वित करने के लिए व्यापार संगठन के कुछ रूपों को अपनाती है, क्योंकि व्यापार की सफलता व वृद्धि व्यापार संगठन के रूप का चयन करने के एक महत्वपूर्ण लेनदेन पर निर्भर करती है। इन निगमित कंपनियों के अलावा, व्यापार सत्ताओं के अन्य रूप होते हैं, जिन्हें सहकारी, संयुक्त उद्यम, लघु उद्योग और न्यास कहा जाता है। इन सभी फॉर्मों (रूपों) में व्यापार गतिविधियों को परिचालित व संगठित करने के अपने विशिष्ट क्षेत्र होते हैं। इस पर उसी तरीके से कर लगेगा जिस प्रकार आयकर अधिनियम, 1961 अथवा अन्य भारतीय कानून के अधीन निगमित कंपनियों पर लगता है, जैसा कि कराधान के उद्देश्य से उपयुक्त निर्धारित किया गया है। परन्तु, उनके संगठन के रूप में अंतर होने के कारण उनमें से प्रत्येक से संबंधित कर प्रावधानों में कुछ अंतर होते है। इसके अलावा, उनकी वृद्धि व विकास को बढ़ावा देने के लिए लघु उद्योगों को कुछ कटौतियां और छूट दी गई है। इसके साथ ही, जिस ट्रस्टों (न्यासों) को विभिन्न धर्मार्थ व धार्मिक उद्देश्यों से स्थापित किया गया है, उन्ह्रें आय कर अधिनियम के अधीन कुछ छूट भी दी गई है।
''न्यास'' ऐसी बाध्यता होती है, जो संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ी होती है और मालिक द्वारा स्वीकृत और उसके विश्वास से उत्पन्न होती है अथवा जिसकी अन्य अथवा अन्य के मालिक के लाभ के लिए उसके द्वारा घोषणा व स्वीकृति प्रदान की जाती है।
''संयुक्त उद्यम'' (जे वी) को संयुक्त नियंत्रण रखते हुए आर्थिक गतिविधियों को शुरू करने के लिए उनके इक्विटी शेयर का अंशदान करने वाली प्रत्येक पार्टी के साथ दो अथवा दो से अधिक पार्टियों के बीच किए गए अनुबंधात्मक करार के रूप में परिभाषित किया गया है।
''सहकारी संगठन'' एक ऐसी सोसायटी होती है जो सहयोग के सिद्धांतों के अनुसार अपने सदस्यों के हितों को बढ़ावा देने का उद्देश्य रखती है। यह एक स्वैच्छिक संघ होता है, जिसमें दस अथवा दस से अधिक सदस्य होते है, जो उसी मौहल्ले में रहते अथवा कार्य करते हैं, जो उनके आर्थिक अथवा व्यापार हितों को पूरा करने के लिए समानता के आधार पर एक साथ कार्य करते है। इसकी मूल विशेषता, जो व्यापार स्वामित्व के अन्य रूपों से सहकारी संस्था को अलग करती है, यह है कि इसका मुख्य उद्देश्य लाभ प्रदान करने के के अलावा सदस्यों को सेवा प्रदान करना है।
''लघु उद्योग'' वे यूनिटें होती है, जिसमें संयंत्र व मशीनरी, चाहे उसे स्वामित्व की शर्तों के अनुसार लीज्ड अथवा किराया खरीद के आधार पर धारित किया गया है, में चल संपत्तियों में किया गया
निवेश 1 करोड़ रुपए से अधिक नहीं होता है।