उदारीकरण के बाद आरंभ हुए कर संबंधी सुधारों का एक महत्वपूर्ण घटक है मूल्य वर्धित कर (वैट)। वैट एक बहु-बिंदु गंतव्य आधारित कराधान है, जिसमें उत्पादन/वितरण श्रृंखला के लेन-देन के प्रत्येक चरण पर मूल्यवर्धन पर लिया जाने वाला कर है। पद ‘’मूल्यवर्धन’’ का अर्थ है वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन और अंतरण के प्रत्येक चरण पर वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में वृद्धि। वैट वस्तुओं या सेवाओं की अंतिम खपत पर लगने वाला कर है और इसे अंतत: उपभोक्ता वहन करता है। यह बहु-चरण कर है, जिसके साथ एक आरंभिक अवस्था पर निवेश कर क्रेडिट (आईटीसी) की अनुमति का प्रावधान है, जिसे परिणाम स्वरूप हुई बिक्री पर वैट देयता की तुलना में पुनर्विनियोजित किया जा सकता है। किसी अवधि में इस निवेश कर क्रेडिट का अर्थ है किसी व्यक्ति द्वारा निवेश कर की राशि के समायोजन में उसके आउटपुट कर की राशि की तुलना में एक पंजीकृत डीलर द्वारा निवेश की गई कर की राशि। यह बिक्री के लिए निवेश/आपूर्तियों की खरीद के लिए सभी विनिर्माताओं और व्यापरियों को दिया जाता है, यह चाहे कभी भी उपयोग किया/बेचा गया हो। डीलर/विनिर्माता की वैट देयता की गणता भुगतान अवधि (उदाहरण के लिए एक माह) के दौरान बिक्री पर जमा किए गए कर में से निवेश कर क्रेडिट को घटाकर की जाती है। यदि कर का क्रेडिट एक माह में हुई बिक्री पर देय कर से अधिक हो जाता है तो अतिरिक्त क्रेडिट अगले वित्तीय वर्ष के अंत में काई अतिरिक्त गैर-समायोजित निवेश कर क्रेडिट है तो इसकी वापसी की पात्रता होगी।
वैट मूलत: राज्य का विषय है, जो राज्य की सूची से व्युत्पन्न हुआ है, जिसके लिए निर्णय हेतु राज्य के पास संप्रभुता है। कराधान विभागों के राध्यम से राज्य सरकारें अपने-अपने राज्यों में वसूली और वैट संग्रह का दायित्व उठाते हैं। केंद्रीय सरकार द्वारा वैट के सफल कार्यान्वयन में सुविधा प्रदानकर्ता की भूमिका निभाई जाती है। वित्त मंत्रालय केंद्र और राज्य स्तरों पर वैट की वसूली और कार्यान्वयन का मुख्य अभिकरण हैं।
वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग अपने दो सांविधिक बोर्डों नामत: केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) तथा केन्द्रीय सीमाशुल्क तथा केन्द्रीय उत्पाद शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) के माध्यम से सभी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष करों से जुड़े मामलों के संबंध में नियंत्रण का प्रयोग करता है। राजस्व विभाग का बिक्री कर प्रभाग केन्द्रीय बिक्री कर अधिनियम के अधिनियमन तथा संशोधन, अंतर राज्य व्यापार अथवा वाणिज्य के दौरान बिक्री पर कर के उद्ग्रहण, वैट के उद्ग्रहण, इत्यादि संबंधी कार्य करता है। केन्द्रीय उत्पाद शुल्क तथा सीमाशुल्क बोर्ड सीमाशुल्क तथा केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के उद्ग्रहण तथा संग्रहण, केन्द्रीय मूल्य वर्द्धित कर (सेनवेट) क्रेडिट की अनुमति देने, इत्यादि से संबंधित नीति के निरूपण संबंधी कार्य करता है। हालांकि, राज्य स्तरीय 2004 को आयोजित राज्य वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति की बैठक में लिया गया था जहां सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों (यू.टी) में वैट की शुरूआत करने के लिए व्यापक सर्व सम्मति हुई थी।
निविष्टि कर क्रेडिट के साथ वैट का सम्पूर्ण अभिकल्पन महत्वपूर्ण रूप से कर बीजक, कैश मीमो या बिल के प्रलेखन पर आधारित है। प्रत्येक पंजीकृत डीलर जिसकी कुल कारोबार बिक्री विनिर्दिष्ट की गई राशि से अधिक है, द्वारा क्रेता को निर्धारित विवरणों के साथ क्रम संख्यांकित कर बीजक जारी किया जाना अपेक्षित है। यह कर बीजक जिसमें अपेक्षित ब्यौरे दिखाए गए हों, डीलर या उसके नियमित कर्मचारी द्वारा हस्ताक्षरित तथा दिनांकित किया जाना आवश्यक है। वैट के अंतर्गत डीलरों को अभिज्ञात करने/उनका पंजीकरण करने के लिए, कर दाता की पहचान संख्या (टिन) का प्रयोग किया जाता है। सम्पूर्ण देश में टिन में 11 अंकीय संख्या होती है। इसके प्रथम दो वर्ण राज्य कोड के द्योतक हैं तथा अगले नौ वर्णो का संघटन विभिन्न देशों में भिन्न भिन्न हो सकता है।
भारत की प्रवृत बिक्री कर संरचना में, वस्तुएं के दोहरे कराधान तथा करों की बहुलता की समस्याएं रही है जो प्रपाती कर भार में परिणामी हुई हैं। उदाहरणार्थ, इस संरचना में, किसी वस्तु के उत्पादन से पूर्व पहले निविष्टियों पर कर लगाया जाता है, तथा फिर वस्तु के निविष्टि कर भार के साथ उत्पादन के पश्चात उत्पाद पर पुन: कर लगाया जाता है। इस प्रकार प्रपाती प्रभाव के साथ इससे अनुचित दोहरा कराधान होता है। अत: इस प्रकार की बिक्री कर संरचना को प्रतिस्थापित करने के लिए वैट की शुरूआत की गई है।
इस के अतिरिक्त, इसमें केन्द्रीय बिक्री कर (सीएमटी) को चरणबद्ध रूप से समाप्त करने का अनुरोध किया गया है तथा इस संबंध में अनेक प्रयास किए जा रहे हैं।
वैट का मुख्य उद्देश्य समग्र कर भार का यौक्तिकीकरण करना तथा सामान्य मूल्य स्तर को कम करना है। इस प्रकार, इस का उद्देश्य आम लोगों, व्यापारियों, उद्योगपतियों के साथ-साथ सरकार की सहायता करना है। यह वस्तुत: कराधान प्रणाली में अधिक कुशलता, समान प्रतिस्पर्धा तथा औचित्य की दिशा में किया गया एक उपाय है। वैट के क्रियान्वयन के मुख्य लाभ है :-
- कर अपवंचन न्यूनतम होता है क्योंकि वैट इन्वायस/बिल के आधार पर प्रत्येक चरण पर लगाया जाता है जिससे प्रथम चरण पर अपवंचित कर अगले चरण में पकड़ में आ जाता है।;
- पूर्व क्रयों पर अदा किए गए कर तथा साथ ही निविष्टि कर पर प्रति संतुलन अनुमत किया जाता है;
- करों की बहुलता समाप्त होती है अर्थात कुल कारोबार कर जैसे कर बिक्री कर पर अधिभार, अतिरिक्त अधिभार इत्यादि को समाप्त किया जा रहा है;
- यह डीलरों तथा विनिर्माताओं द्वारा वैट देयता के अंत: निर्मित स्वनिर्धारण की प्रणाली द्वारा निरीक्षण की विद्यमान प्रणाली को प्रतिस्थापित करता है (कर क्रेडिट के प्रति संतुलन पर विवाणियों के प्रस्तुतीकरण के अर्थ में);
- कर संरचना अपेक्षाकृत सरल तथा अधिक पारदर्शी बन जाती है;
- कर अनुपालन में सुधार होता है;
- उच्चतर राजस्व वृद्धि का सृजन होता है;
- निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता, इत्यादि का संवर्धन होता है; आदि
केन्द्रीय स्तर पर, केन्द्रीय मूल्य वद्धित कर (सेनवेट) भारत में केन्द्रीय उत्पाद शुल्क संरचना के योक्तिकीकरण से संबंधित है वर्तमान में अधिकांश निविष्टियों तथा अंतिम उत्पादों पर सैनवेट की 16 प्रतिशत की सक समान दर प्रभारित की जाती है। सेनवेट की शुरूआत उन सभी विवादों को समाप्त करने के लिए की गई है जो विभिन्न किस्मों की निविष्टियों के वर्गीकरण के करण उत्पन्न हो रहे थे क्योंकि विभिन्न किस्मों पर दरे भिन्न थी। तदनुसार, सेनवेट क्रेडिट नियमावली को अधिसूचित तथा समय-समय पर निम्न प्रकार संशोधित किया गया है:-
इन के अंतर्गत, अन्य उत्पाद के विनिर्माता या उत्पादक तथा आउटपुट सेवा के प्रदायक को अनुमति दी जाती है कि वह नियमावली में यथा उल्लिखित, विनिर्दिष्ट अन्त्य उत्पादों में अथवा अनके विनिर्माण के संबंध में प्रयुक्त विनिर्दिष्ट निविष्टियों तथा पूंजीगत वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क का क्रेडिट ले (जिसे सेनवेट क्रेडिट कहा जात है)। इस प्रकार अनुमत सेनवैट क्रेडिट को निम्न के भुगतान के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है:- (i) किसी अन्त्य उत्पाद पर कोई शुल्क या उत्पादशुल्क; अथवा (ii) निविष्टियों पर लिए गए सेनवैट क्रेडिट के समतुल्य राशि यदि ऐसी निविष्टियों को इस प्रकार या अंशत: प्रसंस्कृत करने के पश्चात हटा दिया जाता है; अथवा (iii) पूंजीगत वस्तुओं पर लिए गए सेनवैट क्रेडिट के समतुल्य राशि यदि ऐसी पूंजीगत वस्तुओं को इस प्रकार हटा दिया जाता है; अथावा (iv) किसी आउटपुट सेवा पर सेवा कर, जो नियमावली में निर्धारित शर्तों के अनुसार है। पिछले बजट में, विनिर्माण क्षेत्रक को बढ़ावा देने के लिए सभी वस्तुओं या सामान्य सेनवैट दर को 16 प्रतिशत से घटा कर 14 प्रतिशत करने तथा प्रस्ताव किया गया है।
राज्य स्तर पर, राज्य वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति ने सभी राज्यो/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा अपनाए जाने के लिए वैट के एक अभिकल्पन को अंतिम रूप दिया है। वैट के इस मूल अभिकल्पन में वैट की अनिवार्य विशिष्टताओं को प्रतिधारित रखा गया है तथा उन्हें सभी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के लिए एक समान रखा गया है जैसे विभिन्न वस्तुओं पर वैट की दरों को सभी के लिए एक समान रखा गया है। साथ ही इसमें राज्यों/संघराज्य क्षेत्रों को नम्यता का कुछ अंश प्रदान किया गया है ताकि वे अपनी स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हो सके।
वर्तमान में, वैट की दो आधारिक दरें है अर्थात 4 प्रतिशत और 12.5 प्रतिशत जिसके अलावा एक घूटप्राप्त श्रेणी है तथा कुछ चयनित मदों के लिए 1 प्रतिशत की विशेष दर है। मूलभूत आवश्यकता की मदों तथा स्थानीय महत्व की वस्तुओं (10 मदों तक) को शून्य दर ब्रैकेट में अर्थात छूट प्राप्त समय अनुसूची में रखा गया है। स्वर्ण, चांदी तथा बहुमूल्य रत्नों को 1 प्रतिशत की अनुसूची में रखा गया है। एक श्रेणी भी है जिसमें कर की 20 प्रतिशत की आधारिक दर है किन्तु इस अनुसूची में सूचीबद्ध वस्तुएं निविष्टि कर छूट/प्रतिसंतुलन के लिए पात्र नहीं है। इस श्रेणी में मोटर स्प्रिट (पैट्रोल डीज़ल तथा विमान टर्बाइन ईंधन), शराब, इत्यादि जैसी मदें शामिल हैं। राज्य में वैट की कुछ अन्य विशिष्टताएं (जैसाकि अधिकार प्राप्त समिति द्वारा अंतिम रूप दिया गया है) है :-
- करों की बहुलता को समाप्त करने के प्रावधान के अनुसार, वस्तुओं की खरीद अथवा बिक्री पर सभी राज्य कर (चुंगी कर के एवज में प्रविष्टि कर को छोड़कर) वैट में समाहित किए जाने या वैट योग्य बनाए जाने अपेक्षित है।
- ‘’निविष्टि कर क्रेडिट (आईटीसी)’’ अनुमान करने के लिए एक प्रावधान किया गया है जो वैट की बुनियादी विशिष्टता है। तथापि, चूंकि वैट का क्रियान्वयन केवल अंतर राज्य वैट में किया जा रहा है तथा इसमें अंत: राज्य बिक्री लेनदेन शामिल नहीं है तथा इसमें अंत: राज्य बिक्री लेनदेन शामिल नहीं है, आईटीसी अंतर राज्य क्रयों पर उपलब्ध नहीं है।
- निर्यात शून्य दर निर्धारित होंगे जिनमें ऐसे निर्यातों से जुड़ी निविष्टियों/क्रय पर सभी करों के लिए क्रेडिट दिया जाएगा।
- प्रणाली को अधिक व्यवसाय अनुकूल बनाने के प्रावधान किए गए है। उदाहरणार्थ, डीलरों द्वारा स्वनिर्धारण के लिए प्रावधान, 5 लाख रूपए के वार्षिक कारोबार के अर्थ में डीलरों के पंजीकरण के लिए आरम्भिक सीमा का प्रावधान, तथा 50 लाख रूपए की वार्षिक कारोबार सीमा तक कर देयता के संघटन के लिए प्रावधान।
- औद्योगिक प्रोत्साहनों के संबंध में, राज्यों को वैट श्रृंखला को तोड़े बिना विद्यमान प्रोत्साहनों को जारी करने की अनुमति दी गई है। इसके अतिरिक्त, कोई नए बिक्री कर/वैट आधारित प्रोत्साहन अनुमत नहीं किए गए है।
देश में मूल्य वर्द्धित कर (वैट) की शुरूआत करने वाला प्रथम राज्य हरियाणा था। वर्ष 2007 तक, वैट की शुरूआत 30 से अधिक राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों में की जा चुकी है जिनमें तमिलनाडु तथा पुडुचेरी का संघ शासित राज्य क्षेत्र) जिसने पहली अप्रैल 2007 से वैट को क्रियान्वित किया) शामिल है पहली जनवरी 2008 से, उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में वैट को प्रभावी कर दिया है। वैट को क्रियान्वित करने वाले कुछ अन्य राज्य/संघ शासित राज्य क्षेत्र है :-
विगत वर्षों में, भारत में वैट की क्रियान्वित करने का अनुभव काफी उत्साह वर्धक् रहा है जहां क्रियान्वयन की प्रगति की सतत् समीक्षा अधिकार प्राप्त समिति करती रहती है। वैट क्रियान्वयनकारी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों का राजस्व निष्पादन भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। वर्ष 2006-07 के दौरान, 31 वैट राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के कर राजस्व में 2006-07 के कर राजस्व की तुलना में सामूहिक तौर पर लगभग 21 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई है। वर्ष 2007-08 के दौरान, 32 वैट राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों ने 2007-08 के प्रथम छ: महीनों के दौरान विगत वर्ष की सदृश अवधि की तुलना में 14.6 प्रतिशत की आगे और वृद्धि दर्शाई।
इसके अतिरक्त, केन्द्र सरकार ने एक क्षतिपूर्ति पैकेज की घोषणा की थी जिसके तहत राज्यों को वैट की शुरूआत के कारण हुई किसी भी प्रकार की राजस्व हानि कके लिए 2005-06 के दौरान राजस्व हानि के 100 प्रतिशत की दर से 2006-07 के दौरान 75 प्रतिशत की दर से तथा 2007-08 के दौरान 50 प्रतिशत की दर से क्षतिपूर्ति दी जाती है। इस के अतिरिक्त राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को वैट कम्प्यूटरीकरण, प्रचार तथा जागरूकता और अन्य संबंधित पहलुओं के लिए तकनीकी तथा वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।