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कारोबारी करारनामे
भारत में कारोबारी उदारीकरण के समग्र उद्देश्‍य की दिशा में क्षेत्रीय कारोबारी व्‍यवस्‍थाओं (आईटीए) को ''निर्माण खण्‍ड'' के रूप में लिया जाता है। अत:, यह अनेक आरटीए में भाग लेता है, जिसमें मुक्‍त कारोबार करारनामे (एफटीए); अधिमानी कारोबार करारनामे (पीटीए); विस्‍तृत आर्थिक सहयोग करारनामे (सीईसीए) आदि। ये करारनामे द्विपक्षीय या क्षेत्रीय समूह में किए जाते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं :-

दक्षिणी एशिया मुक्‍त कारोबार क्षेत्र (साफ्टा) पर करारनामे

दक्षिणी एशिया मुक्‍त कारोबार क्षेत्र (साफ्टा) पर करारनामे पर इस्‍लामाबाद में 4-6 जनवरी को आयोजित बारहवें दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) सम्‍मेलन के दौरान सार्क के सभी सदस्‍य देशों ने हस्‍ताक्षर किए। इसके फलस्‍वरूप साफ्टा 1 जनवरी 2006 से प्रभावी हुआ।

सार्क की स्‍थापना 7-8 दिसंबर, 1985 को ढाका में अग्रलिखित उद्देश्‍यों के साथ की गई थी :- दक्षिणी एशिया के निवासियों के कल्‍याण को प्रोत्‍साहन देना; आर्थिक वृद्धि और सामाजिक प्रगति में तेजी लाना; आर्थिक वृद्धि और सामाजिक प्रगति में सक्रिय सहयोग को प्रोत्‍साहन देना; आर्थिक, सामाजिक, सांस्‍कृतिक, तकनीकी तथा वैज्ञानिक क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग को प्रोत्‍साहन देना; आपसी हित के मामलों पर अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर सहयोग देना तथा समान लक्ष्‍यों और उद्देश्‍यों के साथ अंतरराष्‍ट्रीय तथा क्षेत्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना। इसके सदस्‍य देशों में शामिल हैं बंगलादेश, भूटान, भारत, मालदीव्‍स, नेपाल, पाकिस्‍तान और श्रीलंका।

साफ्टा के उद्देश्‍य निम्‍नलिखित के साथ ''सहयोग देशों'' के बीच आपसी कारोबार और आर्थिक सहयोग को प्रोत्‍साहन देना और इसमें वृद्धि करना है:-

  • कारोबार की बाधाओं को हटाना और सहयोगी देशों की सीमाओं के बीच वस्‍तुओं की सीमापर की आवाजाही की सुविधा प्रदान करना;
  • मुक्‍त कारोबार क्षेत्र में स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्द्धा की प्रवर्तन शर्तें और सभी सहयोगी देशों को समान लाभ प्रदान करना, राज्‍यों के स्‍तरों और आर्थिक विकास के पैटर्न को विचार में लेना;
  • इस करारनामे के कार्यान्‍वयन और आवेदन की प्रभावी प्रक्रिया तैयार करना और इसका संयुक्‍त प्रशासन करना एवं विवादों को सुलझाना; और
  • इस करारनामे के आपसी लाभों के विस्‍तार और वृद्धि के लिए क्षेत्रीय सहयोग की रूपरेखा स्‍थापित करना।

करारनामे के अनुसार, साफ्टा को निम्‍नलिखित उपायों के माध्‍यम से कार्यान्वित किया जाएगा :-

  • कारोबार में उदारीकरण कार्यक्रम
  • उद्भव के नियम
  • संस्‍थागत व्‍यवस्‍थाएं
  • परामर्श और विवाद निपटान क्रिया विधियां
  • सुरक्षा उपाय
  • अन्‍य कोई उपाय जिन पर आपसी सहमति हो।
एशिया प्रशांत कारोबार करारनामा (एपीटीए)

एशिया - प्रशांत व्‍यापार करार (एपीटीए), जिसे पहले बैंकाक करार के नाम से जाना जाता था, इस पर 31 जुलाई 1975 को हस्‍ताक्षर किए गए, यह यूनाइटेड नेशन्‍स इकोनॉमिक एण्‍ड सोशल कमीशन फॉर एशिया एण्‍ड द पेसिफिक (एस्‍केप) की एक पहल है।

यूनाइटेड नेशन्‍स इकोनॉमिक एण्‍ड सोशल कमीशन फॉर एशिया एण्‍ड द पेसिफिक (एस्‍केप) एशिया प्रशांत क्षेत्र के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र की क्षेत्रीय विकास भुजा है। यह उन मुद्दों पर केन्द्रित है जिन्‍हें क्षेत्रीय सहयोग के माध्‍यम से सर्वाधिक प्रभावी रूप से संबोधित किया जाता है और इसमें शामिल हैं :-

  • ऐसे मुद्दे जिसका सामना इस क्षेत्र में सभी देश या देशों का एक समूह करता है, जिसके लिए आपस में एक दूसरे से सीखना अनिवार्य है;
  • ऐसे मुद्दे जिनमें क्षेत्रीय या बहु-देशीय संलग्‍नता से लाभ मिलता है;
  • ऐसे मुद्दे जो स्‍वभाव में सीमा से परे हैं, या जिनमें सहयोगात्‍मक अंतर देशीय मार्गों से लाभ होगा;
  • ऐसे मुद्दे जो संवेदनशील या उभरते प्रकार के हैं और जिनमें पुन: समर्थन और बातचीत की आवश्‍यकता है।

एपीटीए/बैंकाक करारनामा एस्‍केप के विकासशील सदस्‍य देशों के बीच कारोबारी बातचीत पर ''पहला करारनामा'' है। यह अधिमानी प्रशुल्‍क व्‍यवस्‍था है जो एस्‍केप क्षेत्र के सदस्‍य देशों (विकासशील देशों द्वारा आपसी सहमति की रियायतों के‍ विनिमय के माध्‍यम से अंतराक्षेत्रीय कारोबार को प्रोत्‍साहन देने पर लक्षित है। बैंकाक करारनामा अनिवार्य रूप से उक्‍त उपायों के माध्‍यम से एस्‍केप क्षेत्र में उदारीकरण और कारोबार को प्रगामी रूप से विस्‍तारित करने के लिए डिजाइन की गई एक अधिमानी कारोबारी व्‍यवस्‍था है, जैसे प्रशुल्‍क में छूट और गैर प्रशुल्‍क बाधाएं और कारोबार संबंधी आर्थिक सहयोग। विकासशील देश और एस्‍केप के संबद्ध सहयोग इस करारनामे को अपनाने के पात्र हैं।

करारनामे के मूल हस्‍ताक्षरकर्ता थे, भारत, बंगला देश, लाओं पीपुल्‍स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक, कोरिया गणतंत्र और श्रीलंका। लाओं डीपीआर ने प्रदान की गई प्रशुल्‍क रियायतों पर सीमा शुल्‍क अधिसूचना जारी नहीं की है और इस सीमा तक यह एक प्रभावी भागीदार सदस्‍य नहीं है। करारनामे में चीन का जुड़ाव अप्रैल 2000 में बैंकाक करारनामे की स्‍थायी समिति के सोलहवें सत्र में स्‍वीकार किया गया था।

इस करारनामे का उद्देश्‍य एस्‍केप के विकासशील सदस्‍य देशों के बीच कारोगार विस्‍तार की एक निरंतर प्रक्रिया के माध्‍यम से आर्थिक प्रोत्‍साहन को प्रोत्‍साहन देना और उनके वर्तमान तथा भावी विकास तथा कारोबारी जरूरतों के साथ आपसी लाभ के कारोबार उदादीकरण उपायों को अपनाना तथा तीसरी दुनिया के देशों के कारोबारी हितों को विचार में लेना है।

इस करारनामे का शासन निम्‍नलिखित सामान्‍य सिद्धांतों के तहत किया जाता है :-

  • यह करारनाम समग्र व्‍युत्‍क्रमणीयता और लाभों की आपसी सहमति के अधार पर होगा, ताकि सभी प्रतिभागी राज्यों को समान प्रकार से लाभ मिल सके;
  • पारदर्शिता, राष्‍ट्रीय उपचार और सर्वाधिक लोकप्रिय उपचार के सिद्धांत प्रतिभागी राज्‍यों के बीच कारोबारी संबंधों पर लागू होंगे;
  • अल्‍पतम विकसित देश प्रतिभागी राजयों की विशेष आवश्‍यकताओं को स्‍पष्‍ट रूप से मान्‍यता दी जाएगी और इनके पक्ष में ठोस अधिमानी उपायों पर सहमति दी जाएगी।
बिम्‍सटेक (वे ऑफ बेंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्‍टी सेक्‍टोरल टेक्निकल एण्‍ड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन)

बिम्‍सटेक (बंगला देश इंडिया म्‍यांमार श्रीलंका एण्‍ड थाइलैंड टेक्निकल एण्‍ड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन), एक उप-क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग समूह जनवरी 1997 में बैंकाक में बनाया गया था। म्‍यांमार ने दिसंबर 1997 में बाद में समूह में स्‍थान पाया। भूटान और नेपाल भी फरवरी 2004 में इसमें शामिल हो गए। इसकी सदस्‍यता में सार्क (भारत, बंगलादेश, भूटान, नेपाल और श्रीलंका) के 5 सदस्‍य शामिल हैं और आसियान के दो सदस्‍य (थाइलैंड, म्‍यांमार) हैं। इस प्रकार इसे दो प्रमुख क्षेत्रीय समूहों अर्थात आसियाना और सार्क के बीच ''सेतु संबध'' के रूप में देखा जाता है। बिम्‍सटेक की अध्‍यक्षता वर्ण क्रम के अनुसार सदस्‍य देशों के बीच घूमती रहती है। समूह की तत्‍काल प्राथमिकता इसकी गतिविधि के समेकन और आर्थिक सहयोग के लिए आकर्षक बनाना है।

बैंकाक में 31 जुलाई, 2004 को आयोजित इसके पहले सम्‍मेलन मे बिमसेक को एक नया नाम ''बे ऑफ बेंगाल इनीशिएटिव फॉर मल्‍टी सैक्‍टोरल टेकिनकल एण्‍ड इकोनॉमिक को-ऑपरेशन'' दिया गया।

आरंभ में 6 क्षेत्रों में सहयोग का प्रस्‍ताव था, परन्‍तु नई दिल्‍ली में अगस्‍त 2006 के दौरान 11वीं वरिष्‍ठ अधिकारियों की बैठक में इस बात पर सहमति हुई की सहयोग के क्षेत्र अब 13 क्षेत्रों तक विस्‍तारित किए जाएं और प्रत्‍येक क्षेत्र का नेतृत्‍व एक स्‍वैच्छिक रूप में सदस्‍यों द्वारा किया जाए। इसमें शामिल हैं :

  • व्‍यापार और निवेश (बंगलादेश);
  • प्रौद्योगिकी (श्री लंका);
  • ऊर्जा (म्‍यांमार);
  • परिवहन और संचार (भारत);
  • पर्यटन (भारत);
  • मत्‍स्‍य (थाइलैंड);
  • कृषि (म्‍यांमार);
  • सांस्‍कृतिक सहयोग (भूटान);
  • पर्यावरण और आपदा प्रबंधन (भारत);
  • सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य (थाइलैंड);
  • लोगों से लोगों का संपर्क (थाइलैंड);
  • निर्धनता उन्‍मूलन (नेपाल);
  • आतंकवाद और पारदेशी अपराध का विरोध (भारत);

बिम्‍सटेक के सदस्‍य देश बिम्‍सटेक फ्री ट्रेड एरिया फ्रेमवर्क करारामे की स्‍थापना के लिए सहमत हैं ताकि पक्षों में व्‍यापार और निवेश को उद्दीपित किया जा सके तथा एक उच्‍च स्‍तर पर बिम्‍सटेक के साथ और इसमें निवेश सहित बाहरी लोगों को व्‍यापार के लिए आकर्षित किया जा सके। बिम्‍सटेक एफटीए पर रूपरेखा करार पर फूकेट, थाईलैंड में 8 फरवरी 2004 को हस्‍ताक्षर किए गए। रूपरेखा करार में वस्‍तुओं, सेवाओं तथा निवेश में एफटीए पर विचार विमर्श के लिए प्रावधान शामिल हैं। बातचीतों के कार्यक्रम को आगे ले जाने के लिए एक व्‍यापार बातचीत समिति (टीएनसी) का गठन किया गया है। इस टीएनसी की प्रथम बैठक 7-8 सितम्‍बर 2004 को बैंकॉक में आयोजित की गई थी। टीएनसी के विचारा विमर्श क्षेत्र में वस्‍तुओं तथा सेवाओं में व्‍यापार, निवेश, आर्थिक सहयोग और साथ ही व्‍यापार की सुविधा एवं बिम्‍सटेक में एलडीसी के लिए तकनीकी सहायता भी शामिल है। इस बात पर सहमति हुई थी कि एक बार वस्‍तुओं में व्‍यापार पर बातचीत पूरी हो जाने पर टीएनसी सेवाओं तथा निवेश में व्‍यापार पर बातचीत को आगे बढ़ाएगी।

भरत और एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्‍ट एशियन नेशन्‍स के बीच व्‍यापक आर्थिक सहयोग पर रूपरेखात्‍मक करारनामा

भारत का जुड़ाव वर्ष 1991 में 'पूर्व की नीति देखें'' सहित एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्‍ट एशियन नेशन्‍स (आसियान) के साथ आरंभ हुआ। इसके साथ भारत का फोकस इसकी सशक्‍त और बहु फलकीय संबंध के साथ अपेक्षाकृत बड़े एशिया प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक, राजनैतिक तथा कार्यनीतिक महत्‍व तथा कारोबार और निवेश में भारत के एक बड़े भागीदार बनने की संभाव्‍यता के परिणाम पर रहा है। अब यह इक्‍कीसवीं शताब्‍दी के बाजार को आकार देते हुए एशिया प्रशांत केन्द्रित क्रॉस करेंट (पारगामी) से जोड़ने के लिए भारत को एक भूमि सेतु भी प्रदान करता है। जबकि आसियान देश व्‍यावसायिक और तकनीकी शक्ति के लिए भारत में अभिगम्‍यता चाहते हैं। भारत और आसियान देशों ने अपने सुरक्षा परिदृश्‍यों में संकेंद्रण है।

आसियान की स्‍थापना 8 अगस्‍त 1967 को बैंकाक में 5 मूल सदस्‍यों देशों नामत: इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पिन, सिंगापुर और थाईलैंड द्वारा की गई थी। अब इसके सदस्‍यों की संख्‍या 10 है, जो है ब्रुनेई दारूसलाम, कंबोडिया, इं‍डोनेशिया, लाओ पीडीआर, मलेशिया, म्‍यामांर, फिलिप्पिन, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम। भारत आसियान के 4 सम्‍मेलन स्‍तरीय वार्ता भागीदारों में से एक है।

आसियान और भारत के बीच 8 अक्‍तूबर 2003 को विस्‍तृत आर्थिक सहयोग पर रूपरेखात्‍मक करारनामे पर हस्‍ताक्षर किए गए और यह कार्यक्रम बाली (इंडोनेशिया) में आयोजित किया गया है। करारनामे प्रमुख तत्‍वों में शामिल है: वस्‍तुओं, सेवाओं तथा निवेश के साथ आर्थिक सहयोग के क्षेत्रों में एफटीए। इस करारनामे में शीघ्र प्राप्ति कार्यक्रम (ईएचपी) भी प्रदान किया गया है जिसमें आर्थिक सहयोग के क्षेत्र और विश्‍वास निर्माण के उपायों के रूप में प्रशुल्‍क रियायतों के आदान-प्रदान हेतु वस्‍तुओं की एक सामान्‍य सूची शामिल है।

इस करारनामे के उद्देश्‍य इस प्रकार हैं :-

  • पक्षों के बीच आर्थिक, कारोबारी और निवेश संबंधी सहयोग सुदृढ़ बनाना और बढ़ाना;
  • वस्‍तुओं और सेवाओं में कारोबार को प्रगामी उदारीकरण और प्रोत्‍साहन देना तथा इसके साथ एक पार‍दर्शी, उदार और सुविधाजनक निवेश कार्यनीति का सृजन करना;
  • पक्षों के बीच नजदीकी आर्थिक सहयोग के लिए नए क्षेत्रों का अन्‍वेषण और उपयुक्‍त उपायों का विकास; और
  • नए आसियान सदस्‍य देशों के बीच अधिक प्रभावी आर्थिक समेकन की सुविधा देना और पक्षों के बीच विकास अंतराल को भरना।

आर्थिक सहयोग के क्षेत्र इस प्रकार हैं :-

  • जहां उपयुक्‍त हो वहां निम्‍नलिखित क्षेत्रों सहित, किंतु इन तक सीमित नहीं, सहयोग के सुदृढ़ीकरण के लिए पक्षों की सहमति:-

    • कारोबार की सुविधा
      • आपसी मान्‍यता करारनामे, समरूपता आकलन, प्रत्‍यायन प्रक्रियाविधियां और मानक तथा तकनीकी विनियमन;
      • गैर प्रशुल्क उपाय;
      • सीमा शुल्‍क सहयोग;
      • वित्तीय कारोबार; और
      • व्‍यापार वीसा और यात्रा की सुविधा


    • सहयोग के क्षेत्र
      • कृषि, मछली पालन और वानिकी;
      • सेवाएं : मीडिया और मनोरंजन और स्‍वास्‍थ्‍य, वित्तीय, पर्यटन, निर्माण, व्‍यापार प्रक्रिया आउटसोर्सिंग, पर्यावरण संबंधी;
      • खनन और ऊर्जा - तेल और प्राकृतिक गैस, विद्युत उत्‍पादन और आपूर्ति;
      • विज्ञान और प्रौद्योगिकी - सूचना और संचार प्रौद्योगिकी, विद्युत - वाणिज्यिक, जैव प्रौद्योगिकी;
      • परिवहन और मूल संरचना:- परिवहन और संचार;
      • विनिर्माण:- ऑटोमोटिव, दवाएं और भैषजिक, वस्‍त्र उद्योग, पेट्रोरसायन, तैयार वस्‍त्र, खाद्य प्रक्रमण चमड़े की बनी वस्‍तुएं, हल्‍की इंजीनियरिंग वस्‍तुएं, रत्‍न, और आभूषण प्रक्रमण;
      • मानव संसाधन विकास :- क्षमता निर्माण, शिक्षा, प्रौद्योगिकी अंतरण; और
      • अन्‍य:-हस्‍तकला, छोटे और मध्‍यम उद्यम, प्रतिस्‍पर्द्धा नीति, मेंकोंग बेसिन विकास, बौ‍द्धिक सम्‍पदा अधिकार, सरकारी प्रापण।.

    • कारोबार और निवेश प्रवर्तन
      • मेले और प्रदर्शनी;
      • आसियान-भारत वेबलिंक्स; और
      • व्‍यापार क्षेत्र की वार्ताएं।

  • ये पक्ष क्षमता निर्माण कार्यक्रमों तथा तकनीकी सहायता को कार्यान्वित करने के‍ लिए सहमत हो, विशेष रूप से नए आसियान सदस्‍य देशों के‍ लिए ताकि उनकी आर्थिक संरचना को समायोजित किया जा सके और भारत के साथ उनके कारोबार और निवेश को विस्‍तारित किया जा सके।

  • ये पक्ष आवश्‍यकता अनुसार अनिवार्यता के आधार पर इस कारारनामे के तहत किसी प्रकार की आर्थिक सहयोगात्‍मक गतिविधियों का समन्‍वय और कार्यान्‍वयन कर सकें।
भारत-मर्कोसुर अधिमानी कारोबार करारनामा (पीटीए)

भारत और मर्कोसुर के बीच 17 जून 2003 को रूपरेखात्‍मक करारनामे पर हस्‍ताक्षर किए गए। इस रूपरेखात्‍मक करारनामे का लक्ष्‍य पहले चरण में आपसी प्रशुल्‍क वरीयता प्रदान करते हुए और दूसरे चरण में विश्‍व व्‍यापार संगठन के नियमों के अनुरूप दो पक्षों के बीच एक मुक्‍त कारोबारी क्षेत्र की बातचीत के लिए शर्तें और प्रक्रियाविधियों तय करना है। रूपरेखात्‍मक करारनामे का अनुवर्तन करते हुए नई दिल्‍ली में 25 जनवरी 2004 को अधिमानी कारोबार करारनामे (पीटीए) पर हस्‍ताक्षर किए गए। इस अधिमानी कारोबार करारनामे का लक्ष्‍य मर्कोसुर और भारत के बीच मौजूदा संबंधों का विस्‍तार करना और उन्‍हें सुदृढ़ बनाना और पक्षों के बीच एक मुक्‍त कारोबारी क्षेत्र बनाने के उद्देश्‍य से आपसे में तय की गई प्रशुल्‍क वरीयता प्रदान करके कारोबार के विस्‍तार को प्रोत्‍साहन देना है।

मर्कोसुर वर्ष 1991 में बनाया गया लातीनी अमेरिका का एक कारोबारी हिस्‍सा है और इसमें ब्राजील, अर्जेटाइना, ऊरूग्‍वे और पैराग्‍वे शामिल हैं। इसे चार सदस्‍य देशों के बीच वस्‍तुओं, सेवाओं, पूंजी और व्‍यक्तियों के स्‍वतंत्र आवागमन की सुविधा देने के उद्देश्‍य से बनाया गया था। यह यूरोपीय संघ (ईयू), उत्तरी अमेरिकी मुक्‍त कारोबार करारनामा (नाफ्टा) और आसियान के बाद चौथा सबसे बड़ा समेकित बाजार है।

अन्‍य करारनामों में शामिल हैं :-

^ ऊपर
वाणिज्‍य और उद्योग मंत्रालय
विदेश मंत्रालय
आरटीए में भारत के मौजूदा कार्य
दक्षिणी एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क)
सार्क प्रलेखन केन्‍द्र (एसडीसी)
यूनाइटेड नेशन्‍स इकोनॉमिक एण्‍ड सोशल कमीशन
बिम्‍सटेक
दक्षिणी एशियाई राष्‍ट्र संघ (आसियान)
मर्कोसुर
 
 
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